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प्रिय मित्रो,

सभी पाठकों को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई! हालाँकि इस समय देश अनेक विपदाओं से संघर्षरत है फिर भी मानव उत्सवधर्मी है और संकट को कुछ समय के लिए आँखों से परे करने के लिए कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लेता है। जो संकट इस समय देश पर हैं वह सामूहिक संकल्प और संघर्ष से टल सकते हैं। एक ओर कोविड-१९ के बादल छाए हैं और दूसरी ओर उत्तरी सीमा पर भी चीन का संकट मँडरा रहा है। लौह मनोबल की आवश्यकता है। राष्ट्र में एकता का संचार होना अनिवार्य है। आशा है कि भारतवासी इस संकट की घड़ी पर खरे उतरेंगे और इन अंतरराष्ट्रीय दबावों की राजनीति के जुए को भी उतार फेंकेंगे और वास्तविक स्वतंत्रता को भोग सकेंगे।

अब एक दूसरी बात। कई बार आप ने जिस बात की आशा भी नहीं की होती और वह हो जाती है तो एक हार्दिक रोमांच होता है जिसे अभिव्यक्त करना आसान नहीं होता। जब मैं युवा लेखकों को प्रोत्साहित करता हूँ, उनके लेखन को निखारने का प्रयास करता हूँ तो मेरी बड़ी से बड़ी आकांक्षा उन्हें एक अच्छे साहित्यकार के रूप में देखने तक ही सीमित होती है। लगभग तीन महीने पहले कुछ हुआ जो इससे भी आगे बढ़कर है।

पिछले चार-पाँच वर्ष में कुछ युवा लेखक साहित्य कुञ्ज के साथ जुड़े जिनमें स्वयं को परिष्कृत करने की अदम्य इच्छा थी। हर आलोचना को स्वीकार करते और उसे सुधारने का प्रयास करते। उनकी रचनाओं में होते सुधार से मुझे संतोष होता और लगता कि मेरा परिश्रम सफल हो रहा है। इन लेखकों में एक साझी बात थी कि यह एक अन्य साहित्यिक? वेब-पोर्टल पर प्रकाशित होते हुए वाह-वाही लूट रहे थे। इन्होंने मेरी आलोचना स्वीकार की, जिसका अर्थ यह है कि यह अपनी कमियों के प्रति सजग थे - बस प्रतीक्षा कर रहे थे सही मार्ग दर्शन की। धीरे-धीरे आत्मविश्वास की ज्योति इन लेखकों के मन में प्रज्जवलित हुई और इनके मन में अपना एक साहित्यिक वेब-पोर्टल संचालित करने का विचार आया। इनमें राजेन्द्र कुमार शास्त्री ’गुरु’ प्रमुख थे।

पिछले सप्ताह इस युवा लेखक समूह की वेबपत्रिका साहित्य हंट.कॉम का तीसरा अंक प्रकाशित हुआ। इन युवाओं में साहित्य के प्रति उत्साह और समर्पण है। इनका प्रयास वेबपत्रिका के एक-एक पन्ने से झलकता है। पूरा संपादक मंडल बधाई का पात्र है क्योंकि १६ वर्ष के वेबपोर्टल प्रकाशन के बाद मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि एक अंक प्रकाशित करने में कितना समय लगता है। यह संपादक मंडल युवा है, इनके अपने दायित्व हैं, इनकी उम्र की अलग माँगें हैं यानी इनकी व्यक्तिगत व्यस्तता मुझसे कहीं अधिक है। इन सब तथ्यों को समझते हुए जो बीड़ा इन्होंने उठाया है उसके लिए यह सभी साधुवाद के पात्र हैं। प्रायः साहित्यिक सम्मेलनों में हिन्दी की दशा और दिशा के विषय पर बहुत भाषण दिए जाते रहे हैं, चिंताएँ व्यक्त की जाती रहीं हैं, जिनका परिणाम केवल सम्मेलन के अंत पर प्रकाशित पन्नों पर ही सिमट कर रह जाता रहा है। तृणमूल के स्तर पर कुछ नहीं होता केवल ऊपरी लफ़्फ़ाज़ी और आपसी बहस में ही उलझ कर बात रह जाती है। साहित्य हंट.कॉम का प्रयास तृणमूल का प्रयास है। इस उम्र में अपनी रचनाओं के प्रकाशन के प्रयास में लगने वाले समय में से निकाल कर अन्य लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित करने का समय निकालना इनके हिन्दी साहित्य के प्रति निष्ठा को दिखाता है और स्तुत्य है।

मैं आप सबसे अनुरोध करता हूँ कि आप सभी साहित्य हंट.कॉम को उसी तरह समर्थन प्रदान करें जैसे आप साहित्य कुञ्ज करते हैं। हिन्दी साहित्य के भविष्य में इंटरनेट का माध्यम मुख्य भूमिका लेने वाला है। अगर उचित, कर्मठ, समर्पित लेखक इस भार को अपने सक्षम कंधों पर उठाने के लिए तैयार हैं तो हम सब का दायित्व है कि हम इन्हें भरपूर सहयोग दें।

– सुमन कुमार घई


 

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