पिछले सप्ताह बाहर ड्राईव-वे पर कार को स्टार्ट करके, पलट कर देखा तो पतझड़ रंगों में खो गया। मैं कार से बाहर निकल आया। पिछले लॉन में लगी फ़ेंस के पार जापानी मेपल के लाल रंग ने मोह लिया। विशाल मेपल वृक्ष के पीले पत्तों से प्रकाश टकरा कर नीचे हरी घास तक आते हुए पीली आभा फैला रहा था।
इतने में मेरी चार वर्षीय पोती मायरा कपड़े पहने कर बाहर आ गई, मेरे साथ मेरी नक़ल करते हुए हाथ पीछे बाँध कर खड़ी हो गई और मेपल देखने लगी। वह जानना चाहती थी मैं क्या देख रहा हूँ? मैंने उसे लाल, पीले पत्ते दिखाए। उसने एक पत्ता उठा कर सूँघा और बोली, “इसमें सुगंध नहीं है।” उसे शायद भूमि पर फैलने वाला पीले पत्तों वाला पौधा याद आ रहा था जिसमें से ‘ओरेगनो’ या ‘थाईम’ जैसी सुगंध आती है। इतने में आठ वर्षीय युवान भी आ चुका था। वह मायरा का हाथ पकड़ लॉन में ले गया और मेपल और ’ग्राउंड कवरिंग’ में अन्तर समझाने लग गया। दूर से मैं दोनों के हाव-भाव देख रहा था। मैं मुस्कुराया कि अभी कुछ साल पहले ही तो मैंने यही पाठ युवान को पढ़ाया था। एक-एक पौधे के पास ले जाकर, एक-एक पत्ते की छूअन और फूल की सुगंध और रंग से परिचित करवाया था। अब ज्ञान का दीपक युवान के नन्हे हाथों में था और उसकी शिष्या थी उसकी चार वर्षीया मायरा। अनुभव हुआ कि मेरा काम पूरा हो चुका है। शायद नहीं . . . अभी बहुत कुछ युवान ने सीखना है, उसने मुझ से बहुत कुछ पूछना है।
इन दिनों मेरा छोटा बेटा सुमित और उसकी पत्नी ऋतु अपने दो बच्चों के साथ हमारे साथ रह रहा है। घर पूरी तरह से भरा हुआ है। आज से छह वर्ष पहले भी दोनों, युवान के साथ, हमारे संग दो महीने रहे थे ऋतु और सुमित। उन दिनों वह अपने कोंडो को बेचने के लिए लिस्ट करवा चुके थे और नया घर खोज रहे थे। कोंडो को ख़ाली कर देने से उसे बेचना आसान हो गया था क्योंकि ग्राहक किसी भी समय आकर देख सकता था। दूसरा कारण था कि नया घर ख़रीदने के लिए चयन में वह दोनों हमारी सलाह हर चरण पर ले रहे थे। सभी घर देखकर आते और फिर उसका विश्लेषण करते। ख़ैर उन्होंने घर ख़रीद लिया, जो हमारे घर से पन्द्रह मिनट की दूरी पर था। नए घर को पूरा ठीक करवाने के बाद वह चले गए।
पिछले छह वर्षों में मायरा भी परिवार में आ गयी और युवान भी दो से आठ वर्ष को हो गया। अब वही घर छोटा लगने लगा। बड़ा घर ख़रीदने की बातें होने लगीं तो फिर से पहले वाली प्रक्रिया आरम्भ हुई। बेटे का पूरा परिवार हमारे पास है। पुराना घर बिक चुका और नया ख़रीद भी चुके हैं। बीस तारीख़ को नए घर की चाबी मिल जाएगी और पुराने घर की चाबी सत्ताईस तारीख को पुराने घर के नए मालिक को सौंप दी जाएगी। नए घर में पेंट वग़ैरह हो जाने के बाद महीने के अन्त तक बच्चे भी चले जाएँगे।
कुछ दिन पहले रात को सोने से पहले दूसरी मंज़िल पर बच्चों की धमा-चौकड़ी सुनते हुए नीरा से मैंने कहा था, “सुबह होते ही बच्चों की चहचहाट से घर भर जाता है। और इस समय भाग-दौड़ को सुनते हुए सुमित आलोक का बचपन याद आ जाता है।”
वह मुस्कुराई थी और उसने कहा था, “दस मिनट ही तो दूर है नया घर। फिर सप्ताह में दो दिन हम दोनों ही तो बच्चों को स्कूल ले जाते हैं। सप्ताह के हर दिन सभी हमारे साथ ही खाना खाते हैं। केवल सोते दूसरे घर में हैं। इतना भावुक होने की क्या आवश्यकता है। यह सोचो परिवार बड़ा हो रहा है। बच्चों को अधिक जगह की आवश्यकता है। कब तक छाती से चिपटा कर बैठे रहोगे। शुक्र करो कि आ जाते हैं या आ सकते हैं। वह बेचारे माँ-बाप जिनके बच्चे इतनी दूर चले जाते हैं कि बरसों तक मिल नहीं पाते। छू नहीं सकते केवल फ़ेस-टाईम पर ही संतुष्ट हो जाते हैं।”
“फिर भी . . .” कह कर मैं चुप कर गया।
परसों ऋतु की पहली बर्फ़ गिर चुकी है। मेपल के दोनों पेड़ों के पीले पत्ते लगभग पूर गिर चुके हैं। लाल जापानी मेपल की शाखाएँ अपना रंग खो चुकी हैं। बच्चे सुबह बार क़दम रखते ही पीले पत्तों को छूकर देखते हैं कि अभी पूरी तरह से सूखे कि नहीं?
सोच रहा हूँ कि हम दोनों भी अब सिकुड़ रहे हैं। इतने बड़े घर की हमें आवश्यकता नहीं रही। दो कमरों से अधिक हमें अब और क्या चाहिए? बेटा कई बार कह चुका है कि हमें अब उसके साथ रहा चाहिए। क्या करूँ, बुढ़ापे में कई व्यक्ति स्वार्थी हो जाते हैं। शायद मैं भी उन्हीं में से एक हूँ—अपनी स्वतन्त्रता नहीं छोड़ सकता—फिर भी . . .
—सुमन कुमार घई
टिप्पणियाँ
मधु शर्मा 2025/11/18 02:17 PM
प्रौढ़ अवस्था में कदम रख चुके कितने ही पाठकों को मार्गदर्शन देता हुआ संवेदनशील सम्पादकीय। इस अवस्था तक पहुँचने पर हमें अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में किसी को आपत्ति या हमें दुविधा नहीं होनी चाहिए। पाश्चात्य देशों में तो देखा गया है कि यदि किन्हीं भाग्यशाली माता-पिता के बच्चे उन्हें अपने साथ रखना चाहते हों, तो बच्चों के घर की अनैक्स (उपभवन) में माता-पिता के रहने का प्रबंध सुगमता से हो जाता है। इस प्रकार दोनों ही की दिनचर्या में बिन किसी हस्तक्षेप के स्वतंत्रता भी बनी रहती है व आपस में अगाध प्रेम भी। क्योंकि देखने-सुनने मे यही आया है कि परस्पर अटूट प्रेम में बँधी दो बहनें भी यदि एक ही घर ब्याही जायें और उनकी रसोई एक ही हो तो अक्सर उनके प्रेम का धागा एक न एक दिन टूट जाता है। परिणामस्वरूप रहीम जी का कहना सत्य साबित हो सकता है कि 'रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय...टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय।'
सरोजिनी पाण्डेय 2025/11/16 03:00 PM
आदरणीय संपादक महोदय इतनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाइयां! जिन लोगों की तीसरी पीढ़ी आ चुकी है,,वे सब जिंदगी के इस खट्टे- मीठे कड़वे -तीखे,मिश्रित स्वाद वाले अनुभवों को जी रहे होंगे और संपादकीय के साथ सीधे संपर्क में आ जाएंगे! मैं भी उनमें से एक हूं अंतर इतना है कि आपके बच्चे आपसे 10 मिनट की ड्राइव पर हैं और मेरे बच्चे 3 घंटे और 20 घंटे की फ्लाइट की दूरी पर है! बच्चों का अनुरोध, आग्रह ,हठ, सभी कुछ इसके लिए सतत होता रहता है कि हम किसी बच्चे के साथ रहना शुरू कर दें परंतु जैसा कि आप सोचते हैं 'अपनी आजादी सबको प्यारी होती है'। इसे आधुनिक जीवन की, सम्पन्नता का वरदान कहें या अभिशाप कि हमारे पास चुनाव की स्वतंत्रता है, । यह विषय ऐसा है की एक जैसी अवस्था के लोग यदि मिल बैठे तो घंटों इस विषय पर बातचीत चल सकती है। जब तक जीवन भर साथ रहने वाला, साथी साथ हो तब तक तो अपना जीवन स्वतंत्र रूप से जीने का ही चुनाव करना मेरी समझ से बेहतर है। असली समस्या तो तब आरंभ होती है जब एक अकेला रह जाता है। हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक कहावत प्रचलित है - बाल कै माई न मरै , बूढ़े कै मेहरारू!! अर्थ है, बाल्यावस्था में माता की मृत्यु दुर्भाग्य है और वृद्धावस्था में पत्नी से विलगाव। अपनी कहानी लगता संपादकीय!!!
सुनीता आदित्य 2025/11/16 10:53 AM
एक सांस में सम्पादकीय पढ़ा... खूबसूरत अभिव्यक्ति। जब बड़े घर मिलते हैं तो जरूरतें सिमट जाती हैं.. बच्चे चाहते हैंसाथ रहना , यह एक सुखद स्थिति है। भारत जैसे देश में जहां भावनात्मक लगाव जीवन के उस पार तक महसूस किया जाता है, हमारी संस्कृति और सभ्यता का अपरिहार्य सा सिरा है ये जुड़ाव वहां भी टूटते घर,बिखरते रिश्ते , घर में पनप रहे घरोंदे... और बढ़ते हुए वृद्धाश्रमो की संख्या एक दुखद पहलू है.. या एक अवसर जीव को मोह माया से मुक्त करता सत्य। आपके सम्पादकीय में भावनात्मक कशमकश है... मुझे लगता है जब तक शारीरिक क्षमता है.. अपनी स्वतंत्रता के साथ जीवन बेहतर है .. हमारे ज्ञान,मन और शरीर का सबसे बेहतर उपयोग है कि हम नयी पीढ़ी को देते चलें.. एक सकारात्मक भूमिका में रहे... यह सच है कि क्षमताओं का ह्रास स्वाभाविक है .. तब हमें भी सहारे की आवश्यकता होगी...यदि हम सहारा बनते रहें हैं,हम अपनी सकारात्मक भूमिका में सफल रहे हैं तो यह भी आसान ही होगा.... हृदय से आभार सर... मंथन और चिंतन को प्रेरित करता प्यारा सा सम्पादकीय।
लखनलाल पाल 2025/11/15 11:05 PM
इस बार का संपादकीय परिवार के अपनेपन का एहसास कराता है। भावनात्मक रूप से जुड़े इस परिवार में एक दूसरे के प्रति आदर है, सम्मान है। आत्मीयता का घोल परिवार को विशेष बना रहा है। परिवार बढ़ता है तो घर के बड़ों का सुख अनिर्वचनीय होता है। रहीमदास जी ने इस संबंध में बहुत सटीक लिखा है - यों रहीम सुख होत है, बढ़त देख निज गोत। ज्यों बड़री अंखियां निरख, आंखिन को सुख होत।। पोती मायरा का बाबा की नकल करते हुए पीछे हाथ बांधकर चलना बहुत लुभाता है । पढ़कर पूरा दृश्य आंखों के सामने साकार हो उठता है। सच में, पोता पोतियों की मासूम जिज्ञासाओं को बाबा के अलावा दुनिया का कोई भी व्यक्ति नहीं समझ सकता है। यहां तक कि उनके माता-पिता भी नहीं। इसीलिए पोता पोतियां बाबा के सबसे निकट होते हैं। बच्चे जब पिता के घर आते हैं तो आंगन गमक उठता है। घर की हर दीवार जैसे चमक उठती है। मां का तो कहना ही क्या है! मां तो सिर्फ मां होती है। बेटे जिसमें सुखी हों वैसा ही करती है, वैसा ही सोचती है। दस मिनट के रास्ते वाले घर में बेटा सुखी है तो भी संतोष है। भावुक नहीं होती है। अपने को समझा लेती हैं। वे उन माताओं के लिए सोचती हैं जिनके बच्चे दूर देश में हैं। वे बेचारे बरसों तक मिल नहीं पाते, छू नहीं सकते केवल फ़ेस-टाईम पर ही संतुष्ट हो जाते हैं। सर आपकी इस बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि मां बाप को पराश्रित नहीं रहना चाहिए। अपनी स्वतंत्रता से समझौता तो बिलकुल नहीं करना चाहिए। भले ही बच्चे आदर्शवादी हों तब भी।अब कोई स्वार्थी कहे तो कहता रहे। क्या फर्क पड़ता है? हमें अपना स्पेस सुरक्षित रखना चाहिए। इस भावनात्मक संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर ????
हेमन्त 2025/11/15 05:41 PM
बड़े दिन बाद संपादकीय भावपूर्ण कहानी की तरह मिला।यह पूर्ण साहित्य युक्त। काव्य भाव की मार्मिकता ले। पढ़ना एक साहित्यिक आनन्द को उत्पन्न कर गया। कोई गोर्की की कहानी सा या प्रेमचंद की कथा साहित्य की की बानगी सा। 'फिर भी...' वाक्य में बहुत सा शेष है। जिसे सुधी पाठक गण अपनी मेधा में आत्मसात कर लेंगे। सुमन जी को धन्यवाद इतने अच्छे संपादिकय के लिए।वह भावपूर्ण पीड़ा हृदय से हृदय तक जाती है।'फिर भी' बहुत कुछ अपने में समेटे है।----हेमन्त।
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2025
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- फिर भी . . .
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- मानवीय तत्त्व गुम है
- हिन्दी दिवस पर एक आकलन
- भारत के 79वें स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर
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- और अंतिम संकल्प . . .
- मनन का एक विषय
2024
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- सबके अपने-अपने ‘सोप बॉक्स’
- आप तो पाठक के मुँह से केवल एक सच्ची आह या वाह सुनने…
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डॉ पद्मावती 2025/11/19 12:04 PM
बहुत ही भावपूर्ण ,सौ प्रतिशत सत्य ,हर एक की कहानी , शब्दों में छुपा अनकहा बहुत कुछ कह गया । तभी किसी ने कहा है कि रिश्तों को बनाए रखने के लिए दूरी ही आवश्यक है । अति निकटता अपनत्व को लील लेती है । जितनी जल्दी इस तथ्य को जान ले उतना अच्छा । ईश्वर से यही प्रार्थना होनी चाहिए कि मरते दम तक अपने बल पर जिएं । शारीरिक भी और आर्थिक तो बहुत ही जरूरी । इस दुनिया में मान सम्मान तभी मिलता है जब तक हम स्वावलम्बी हैं । किसी पर आश्रित हो जाना बहुत भारी पड़ता है ,फिर वह अपनी ही संतान ही क्यों न हो । माँ -बाप के लिए संतान दायित्व है लेकिन संतान के लिए माँ -बाप??? अनुत्तरित प्रश्न । आपका यह संपादकीय कई बार पढ़ा । लेखनी को साधुवाद !