प्रिय मित्रो,
दीपावली आई और चली गई। वर्ष के अब केवल दो महीने शेष हैं। वर्ष भी बदल जाएगा। २०२५ इतिहास बन जाएगा और २०२६ नई आशाओं, आकांक्षाओं और संकल्पों के साथ उदय होगा। वर्तमान समय परिवर्तन का समय है। इन दिनों में व्यक्ति पिछ्ले वर्ष की उपलब्धियों का आकलन करने लगता है। यह समय सफलताओं और असफलताओं की समीक्षा का है।
भारत में तो हर महीने कोई न कोई छोटा-बड़ा त्योहार या उत्सव मनता ही रहता है। पश्चिमी जगत में केवल यही ऋतु त्योहारों की ऋतु है। थैंक्सगिविंग, हॉलोविन, क्रिसमस और फिर अप्रैल में ईस्टर का त्योहार होगा। मेरा मानना है कि नव वर्ष और वैलन्टाइन डे का कोई धार्मिक या पारिवारिक महत्व नहीं है। इन देशों में नव वर्ष का उदय मदिरा के नशे और रात की पार्टी के साथ होता है। इसी तरह वैलन्टाइन तो है ही पूरी तरह से व्यवसायिक मस्तिष्क की। इस कृत्रिम त्योहार/उत्सव के उद्भव का कारण शुद्ध व्यवसायिक या आर्थिक है।
होता यूँ है कि क्रिसमस में उपहारों के लेन-देन और उत्सव मनाने में परिवारों का बजट लुट-पिट जाता है। बाक़ी की कमी नव वर्ष के दौरान केवल मदिरा ख़रीदने में बह जाती है। पहली जनवरी की सुबह जब आम जन उठता है और रात का नशा उतरता है तो बैंक बैलेंस के आंकड़े अपराध बोध बन व्यक्ति को वास्तविकता की कड़ी भूमि पर ला पटकते हैं। इन दिनों में लोगों की जेब में पैसा नहीं बचता—बाज़ार गिरने लगता है। स्टोर अपने सेल्स-स्टाफ़ की छँटनी करना आरम्भ कर देते हैं। माल गोदामों के कर्मचारी भी बेरोज़गार होने लगते हैं। फिर यह आर्थिक मंदी की शृंखला फैलने लगती है। ऊपर से सर्दी की ऋतु की मार। कोई दया भाव नहीं। जब सूर्य देवता के दर्शन दुर्लभ होने लगें; दिन छोटे और रातें लम्बी होने लगें तो फ़रवरी आते आते-अवसाद भाव छाने लगता है। शायद इसीलिए किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने मानव के कोमलतम भाव को गुदगुदाने के लिए वैलन्टाइन दिवस को आरम्भ किया होगा।
प्रेम की उष्मता जाड़े के बर्फ़ानी स्पर्श के दंश को भुला देती है। हृदय से प्रेम रस बह निकलता है। प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं को ‘डेट’ पर ले जाते हैं। रेस्त्राँ अपनी भट्टियाँ पुनः गर्म करने लगते हैं। अगर युवा युगल रेस्त्राँ जाएँगे तो नई पोशाकें भी तो ख़रीदनी होंगी। पोशाक-भंडारों के कैश-बॉक्स भरने लगते हैं। प्रेमिका को गुलाबों के गुलदस्ते भी भेंट ‘चढ़ाने’ होते हैं—फूलों की दुकानें महकने लगती हैं। चॉकलेट तो अब प्रेमिकाओं के लिए एक पारम्परिक उपहार बन ही चुका है। पिछले कुछ वर्षों से “टैडी बेयर” देने का चलन भी प्रचलित हो गया है। यानी एक कृत्रिम उत्सव ने बहुत ही कुशलता से व्यवसायिक पारिस्थितिकी तंत्र (Business ecosystem) बना डाला है। देखिए, मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा बस वास्तविकता को लिख रहा हूँ। उदाहरण दे रहा हूँ:
उपहार उद्योग (फूल, चॉकलेट, गहने, कार्ड, परफ्यूम आदि), रेस्त्राँ और कैफ़े (विशेष डिनर, रोमांटिक सेटअप), फ़ैशन और सौंदर्य (कपड़े, मेकअप, हेयर स्टाइलिंग), डिजिटल सेवाएँ (ई-कार्ड, सोशल मीडिया कैंपेन, डेटिंग ऐप्स) का—एक मिला जुला व्यापार। आप ही देखिए—एक भरा-पूरा बाज़ार खड़ा हो गया। यही पश्चिमी देशों की आर्थिक शक्ति है कि जब मार्केट गिरती है, सरकार टैक्स में छूट दे देती ताकि उपभोक्ता सक्रिय हो जाए। इस वर्षा भारत ने भी तो टैरिफ़ की मार से बचने के लिए जीएसटी की कटौती को ढाल के रूप में प्रयोग किया है। उपभोक्ता जम कर बाज़ार में उतरा है। टैरिफ़ का प्रभाव लगभग निरस्त हो गया। अवसाद का छा रहा बादल उत्सव के उत्साह से हवा में उड़ जाता है। यह परिवर्तन सुखद है। वैलन्टाइन दिवस के पश्चात अप्रैल में ईस्टर आएगा। यह सौम्य त्योहार है। यीशु मसीह की मृत्यु और पुर्नजागरण का त्योहार है। इसे भी जीवन से मृत्यु और मृत्यु से जीवन में परिवर्तन की अवस्था की तरह सोचा समझा जा सकता है।
आज की रात ’हैलोविन’ की रात है। युवान और मायरा (मेरा पोता और पोती) थोड़ा अंधेरा होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दोनों एस्ट्रोनॉट बन कर निकलेंगे। दो दिन से रुक-रुक कर वर्षा हो रही है। ठंडी हवा भी चलने लगी है। मेपल के गिर रहे पीले पत्तों से लॉन अटा पड़ा है। परिवर्तन की ऋतु है। सुहावनी गर्मी अब स्मृति बनती जा रही है, सर्दी की तैयारी करनी शुरू कर रहा हूँ। शायद गुलाब, जरेनियम और बगोनिया के फूलों को आने वाली शरद ऋतु का आभास नहीं हुआ है अपने पूरे यौवन पर हैं। महात्मा बुद्ध की मूर्ति को उठा कर शेड में ले जाऊँगा। युवान पिछले सप्ताह महात्मा बुद्ध की मूर्ति के बारे में पूछ रहा था कि क्या यह भगवान जी हैं? आठ वर्ष का हो रहा है, ऐसे प्रश्न पूछना स्वाभाविक है। पिछला सप्ताह हर रात को उसे श्री राम और श्री कृष्ण और महात्मा बुद्ध की कहानियाँ सुनाता रहा। उसकी माँ ऋतु भारत में पली-बढ़ी है। सोलह वर्ष की आयु में कैनेडा आई थी। सुबह उठ कर रात की कहानी युवान अपनी माँ को सुनाता तो माँ के चेहरे पर विस्मयपूर्ण प्रसन्नता छलक पड़ती है। महाकवि आदेश जी का कथन याद आने लगता है। वह कहते थे कि ’बच्चे को संस्कार माता-पिता से नहीं बल्कि दादा-दादी, नान-नानी से मिलते है’। संभवतः यह भारतीय संस्कृति की शाश्वत परम्परा रही होगी। पौराणिक साहित्य कब लोक-साहित्य में परिवर्तित हो गया—किसी को अंश मात्र भी आभास नहीं हुआ होगा।
परिवर्तन ही जीवन है—ऐसा प्रायः कहा जाता है। एक प्रश्नचिह्न है कि नए वर्ष में जीवन में क्या परिवर्तन आएँगे। प्रौढ़ व्यक्ति चाहता है कि समय थम जाए। जबकि बच्चे जल्दी किशोर होना चाहते हैं और किशोर युवा। रोज़ मायरा ज़िद करती है कि उसने युवान जितना बड़ा होना है। मायरा चार वर्ष की है और युवान पहली नवम्बर को आठ का हो गया है। बचपन तुरंत परिवर्तन चाहता है। यह परिवर्तन की क्रिया समय के चक्र की तरह है जो थमता नहीं है। गतिशील रहता है और कभी पलटता नहीं है।
—सुमन कुमार घई
टिप्पणियाँ
लखनलाल पाल 2025/11/01 05:47 PM
साहित्य कुंज का इस बार का संपादकीय - 'परिवर्तन ही जीवन है!' में जीवन जगत में हो रहे परिवर्तनों की बात कही गई है। जीवन उत्सवों का नाम है। अगर ढंग से जीना आ गया तो हर रोज उत्सव है। नहीं आया तो वह भार है। जिंदगी जीते नहीं है, जैसे तैसे काटते हैं। जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए मानव ने सामाजिक व्यवस्था तैयार की जिसकी इकाई परिवार है। तीज-त्योहार उस इकाई को विस्तार देते हैं। त्योहारों को धर्म की डोरी में बांध दिया गया है, ताकि ये सदियों तक ऐसे ही चलते रहें। हर धरती के अपने त्योहार है और मनाने के अपने तरीके हैं। संपादक जी ने भारतीय तथा कनाडा के त्योहारों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा है। कुछ त्योहार लोक निर्मित भी है। इनमें एक नव वर्ष तथा दूसरा वेलेंटाइन डे है। यह पढ़कर काफी दुख हुआ कि नववर्ष पर वहां के लोग शराब में अपना सारा अकाउंट खाली कर लेते हैं। सबसे बड़ी बात ये कि एक नहीं,सभी लोग। इससे उनकी जेबें तो खाली होती हैं, बाजार भी धराशाई हो जाते हैं। यहां तक कि लोग बेरोजगार भी हो जाते हैं। फ़रवरी में वेलेंटाइन डे से फिर रौनक शुरू हो जाती है। बाजार गुलजार होने लगते हैं। त्योहार बाजारों को भी रंग-बिरंगा कर देते हैं। इस बार की दीपावली पर भारत में रिकार्ड तोड़ खरीददारी देखने को मिली। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर तो मेरे कस्बे में इतने बिके कि एक समय आपूर्ति भी कम पड़ने लगी थी। जीएसटी में परिवर्तन भी एक कारण रहा है। मौसम का बदलाव केवल ऋतुएं ही नहीं बदलता है बल्कि हमारी उम्र में भी बदलाव लेकर आता है। आपकी यह बात बड़ी शोध पूर्ण है कि युवा, युवा बने रहना चाहते हैं,उसी तरह प्रौढ़ भी परिवर्तन के पक्ष में नहीं होते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि हम अब एक सीढ़ी नीचे फिसलें। बच्चे जल्दी बड़े होना चाहते हैं। बूढ़े अपने विगत दिनों की यादों में खुश हो रहे होते हैं। पर परिवर्तन के गरल से कोई नहीं बच पाया है। वह गरल है ही ऐसा कि उसके डसे का असर होना ही होना है। इसका अन्य कोई विकल्प है ही नहीं। यह जानकर आश्चर्य हुआ साथ में खुशी भी हुई कि आप अपने पोते पोतियों को आज भी धार्मिक किस्से कहानियां सुनाते हैं। सही कहा आपने कि पिता अपनी संतानों को ये संस्कार नहीं दे पाते हैं। ये संस्कार दादा जी ही देते हैं। आप पोता पोतियों के लिए आप आज के समय के आदर्श दादा जी हैं। सच्चे अर्थों में पोता पोतियों का मनोविज्ञान दादा जी ही समझ पाते हैं, पिता नहीं समझ पाता है। भारतीय परंपरा इस संदर्भ में कमजोर पड़ती जा रही है। परिवार विघटन तथा बढ़ते एकल परिवारों ने दादा-दादी वाले कांसेप्ट को ही दरकिनार कर दिया है। आप कनाडा में रहते हुए भी भारतीय परंपराओं को पूरे उमंग और उत्साह के साथ निर्वाह कर रहे हैं। आपको सेल्यूट करता हूं सर। परिवर्तन को समेटे आपका यह संपादकीय बहुत बढ़िया है। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर ????
सरोजिनी पाण्डेय 2025/11/01 04:50 PM
आदरणीय संपादक महोदय सबसे पहले तो चिरंजीव विवान घई को मेरी ओर से जन्मदिन के शुभ अवसर पर शत कोटि आशीर्वाद और शुभकामनाएं। आप उनको संस्कार दे पा रहे हैं इसके लिए आपको बधाइयां। मैं तो आपके प्रति ईर्ष्या रखती हूं क्योंकि मेरे दौहित्र- पौत्र -पौत्री सभी दूर-दूर जा बसे हैं ,अपने माता-पिता के साथ ।उनसे मिलने का अवसर वर्ष में शायद कुछ दिनों का औसतन होता है। आजकल व्यापार और व्यावसायिकता का प्रभाव हम सबके जीवन के हर क्षेत्र में पड़ रहा है ,चाहे वह दैनिक जीवन हो, हमारे तीज- त्यौहार हों या फिर हमारे सोलह संस्कार! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम सब इस बाजारवादके हाथों की कठपुतली हैं। यह सोचकर मन को शांत करने की कोशिश करते हैं कि यही परिवर्तन है, जीवन का सतत प्रवाह,,कभी देर शांत धीर, मंद ,कभी पत्थरों -चट्टानों पर उछलता कूदता ,कभी मरुस्थल में अति तनु धार बनकर सतत बहता त्योहारों की उपादेयता ,संस्कार और जीवन की धार को अपने में समाहित किए सुंदर संपादकीय।
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मधु शर्मा 2025/11/02 01:43 AM
सर्वप्रथम बेटे युवान के जन्मदिन पर ढेरों आशीर्वाद। आदरणीय सम्पादक जी, आपने पूर्वी व पाश्चात्य देशों से जुड़े त्योहार, त्योहारों से जुड़े व्यापार, न चाहते हुए भी उस व्यापार-प्रथा से जुड़े परिवार, इस विषय को बहुत सुन्दर शैली में प्रस्तुत किया है। वैसे देखने-सुनने में तो यही आया है कि आज से तीस-पैंतीस वर्ष पहले की तुलना में अब भारत के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ में बड़े-बूढ़ों से अधिक युवाओं के चेहरे देखने को मिल रहे हैं। संभवतः दो-एक अन्य 'धर्मों' का बढ़ता कट्टरपन इसका कारण हो सकता है, परन्तु अपनी संस्कृती से पुनः जुड़ने का हमारे युवाओं में जो जोश आया उसका श्रेय इन्हीं 'धर्मों' को देना तो बनता ही है।