प्रिय मित्रो,
कल यानी ३० नवम्बर को मैं न्यू जर्सी (यू.एस.ए.) पहुँचा हूँ। सुबह मुँह-अंधेरे लगभग साढ़े-छह बजे मिसिसागा (ओंटेरियो, कैनेडा) से कार द्वारा चल कर अपराह्न के साढ़े तीन बजे अपने बड़े बेटे के पास पहुँचा। जब घर से चले थे तो हल्की-हल्की बर्फ़ गिर रही थी जो कि लगभग एक घंटे बाद सेंट कैथरीन्स पहुँचते-पहुँचते गिरनी बंद हो चुकी थी। हम लोग प्रायः फ़ोर्ट इरी से यू.एस. में प्रवेश करते हैं—यहाँ कम भीड़ होती है। पहले नियाग्रा फ़ाल्स से जाया करते थे परन्तु उस रास्ते से वेस्टफ़ील्ड, न्यू-जर्सी (मेरे गंतव्य) तक पहुँचने के लिए जो हाइवे चाहिए उस तक पहुँचने के लिए पूरे बफ़लो शहर को पार करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में ही चालीस मिनट लग जाते हैं। वैसे भी बफ़लो यू.एस. के बड़े शहरों की तरह ही अवनति की ओर अग्रसर हो रहा है। समृद्ध लोग शहर के बाहरी हिस्सों में या आस-पास के क़स्बों में जा चुके हैं। सड़कों का बुरा हाल है। आस-पास के घर और दुकानें इत्यादि भी उजड़े-उजड़े दिखाई देते हैं। हाँ, बीच-बीच में समृद्धता की झलक जाती है परन्तु विश्व के सबसे अधिक शक्तिशाली देश का यह हाल देखकर अचम्भा अवश्य होता है।
दूसरी ओर, फ़ोर्ट इरी से सीमा पार करते ही न्यूजर्सी जाने के लिए हाईवे मिल जाता है।
इस राजमार्ग पर लगभग लगभग आधा घंटा ड्राईव करने के बाद हम लोग 20A मार्ग पर मुड़ते हैं जो अगले 36 मील ग्रामीण अंचल के बीच से जाता है। इस 36 मील को पार करने के लिए प्रायः एक घंटे का समय लगता है। यह बहुत सुंदर मार्ग है। छोटी-छोटी पहाड़ियाँ और घाटियाँ निरंतर मिलती चली जाती हैं। यह पहाड़ियाँ एप्लेशन पर्वत शृंखला का भाग हैं। रास्ते में छोटे-बड़े गाँव दोनों ओर बिखरे हैं। एक-दो क़स्बे भी हैं। जैसे की वारसॉ और माउंट मोरिस। वारसॉ 1804 में बसना आरम्भ हुआ था और माउंट मोरिस 1813 में इसलिए दोनो के बाज़ारों की दुकानों के शो-केस एक-से लगते हैं। दोनों क़स्बों का वास्तुशिल्प भी एक जैसा ही है। नगर के मध्य में पुराना चर्च है और चौराहे के दूसरे कोने एक थियेटर है तो तीसरे पर पुराना होटल।
दोनों का बाज़ार क्रिसमस की तैयारी में सजना आरम्भ हो चुका है। कल्पना कीजिए वारसॉ घाटी में नदी के किनारे, हल्की सी बर्फ़ से अच्छादित छज्जों के नीचे दुकानों शो केसों में सजे छोटे-छोटे क्रिसमस-ट्री और जगमाती रंगबिरंगी लाइट की लड़ियाँ। बिलकुल क्रिसमस कार्ड पर छपे चित्रों की तरह। ऐसा ही माउंट मोरिस में देखने को मिलता है।
इस अंचल से हर दो-तीन महीने के बाद गुज़रना होता है। हाइवे 20A के दोनों ओर के खेतों, डैरी फ़ार्मज़ को अब हम पहचानने लगे हैं। हर वर्ष देखते हैं कि कब खेत की जुताई हो चुकी है, बीज बोया जा चुका है या खेत की सतह पर फैले नव-प्रस्फुटित मक्का ने धरती पर हरा रंग उड़ेल दिया है। कभी देखते हैं कि मक्का तीन चार फुट का हो गया है—किशोर हो गया है और फिर अपनी ऊँचाई पर पहुँच कर व्यस्क यानी कटने के लिए तैयार है। एक सप्ताह के बाद लौटते हुए देखते हैं कि फ़सल कट चुकी है।
इस बार का दृश्य बिलकुल अलग था। दो महीने पहले भी इस मार्ग पर आना हुआ था। मक्का किशोरावस्था में था और इस बार उसी मक्का की फ़सल खेतों में खड़ी सूख रही है और पतझड़ की वर्षा से गल-सड़ रही है। मन में चिंता जगी कि यह हज़ारों एकड़ों में फैले खेतों के हज़ारों किसानों और उनके परिवारों की क्या हालत होगी? भारत के किसानों की तरह यू.एस.ए. या कैनेडा के किसानों को भी उन सभी विपित्तियों का सामना पड़ता है चाहे वह प्राकृतिक हों या आर्थिक। इस बार यू.एस.ए. के किसानों को राजनैतिक विपत्ति की मार भी झेलनी पड़ रही है। खेतों में गल-सड़ रही खड़ी फ़सल परिणाम है राष्ट्रपति ट्रम्प की टैरिफ़ नीति का। दशकों से स्थापित ग्राहक खड़ी फ़सलों को छोड़ कर विश्व की अन्य सस्ती मंडियों को ओर रुख़ कर चुके हैं। आधुनिक वैश्विक कृषि व्यवस्था में अनुबंध वर्षों के होते हैं। यानी यह तय होता है कि कौन सा देश या ग्राहक अगले पाँच-दस वर्षों तक कितनी मकई, कितनी गेहूँ या कितना चावल कहाँ से ख़रीदेगा। जिस तरह राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने राजनैतिक स्वार्थ को साधते हुए इन अनुबंधों पर टैरिफ़ का कुठाराघात किया है, उससे पूरे विश्व की स्थापित कृषि-व्यवस्था का संतुलन बिगड़ गया था। त्रासदी यह है कि राष्ट्रपति ट्रम्प को विजयी बनाने में इन्हीं किसानों ने ही वोट दिया था। इस विषय पर भी पहले भी लिख चुका हूँ किस तरह से इसी अंचल में जगह जगह “इलेक्ट ट्रम्प” के पोस्टर लगे हुए थे।
इन किसानों के खेतों में हो रही बर्बादी को प्रत्यक्ष देखते हुए समझ आता है कि मतदान कितना महत्त्वपूर्ण निर्णय है। जब भीड़-तंत्र जन-तंत्र पर हावी हो जाता है तो परिणाम केवल खेत की बर्बादी तक ही सीमित नहीं रहता पूरा समाज गल-सड़ जाता है। यह भारत का सौभाग्य ही कहिए कि 2014 के बाद से ही प्रधान मंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत इतना शक्तिशाली हो चुका है कि वर्तमान की इस कृत्रिम राजनैतिक आपदा में भी उन्नति की राह पर अग्रसर है। टूटे अनुबंधों के दुष्परिणाम तो यू.एस. के अगले पाँच-दस वर्ष तक तो झेलने ही पड़ेंगे। इस आपदा के सामने प्रधान मोदी एक दीवार बन कर खड़े हैं और उनके पीछे भारत निरंतर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परिश्रम कर रहा है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में याद आ रहा है 1965 में प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का नारा—जय जवान, जय किसान!
इस समय अमेरिका (यू.एस.ए.) किसान अपकी दी हुई वोट की मार झेल रहा है। स्थिति दयनीय है। इसी परिप्रेक्ष्य में यू.एस.ए. में कह सकते हैं “जय जवान, जय (बेचारा) किसान”
—सुमन कुमार घई
टिप्पणियाँ
मधु शर्मा 2025/12/02 01:47 AM
एक चलचित्र की भाँति भावी परिस्थितियों से अवगत कराता संवेदनशील सम्पादकीय। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों द्वारा राजनीति के दाँव-पेंच खेलने की प्रवृत्ति को मुझ जैसी कम ही समझने वाली तक इस अंक के सम्पादकीय को पढ़कर हिल गई। ये 'महान' लीडर अपने ए.सी दफ़्तरों में आरामदायक कुर्सियों पर बैठकर निर्णय करते हुए क्यों ज़रा सा भी नहीं सोचते कि बिचारा किसान दिन-रात ठिठुरती सर्दी, तपती गर्मी व आँधी-तूफ़ान से लड़ता हुआ उनके परिवार व उन्हीं की जनता के भोजन हेतु फ़सल तैयार करता है...और कितने दुख की बात है कि अपने ही देश के इन अन्नदाताओं अर्थात् किसानों के मुँह से ही निवाला छीनने का प्रयास किया जा रहा है। माननीय मोदी जी द्वारा भारत में इतने कम समय में लाई गई उन्नति देखकर चीन, रूस, पाकिस्तान इत्यादि जैसे देश भी अब उनसे हाथ मिलाने के लिए आतुर हैं। काश अमेरिका के लीडर भी अपनी आँखों से पट्टी उतारकर देख लें कि उनके किये का परिणाम क्या रंग लाने वाला है। किसान देश की जान है, उसकी दुर्दशा प्रलय की ओर बढ़ती निशानी है।
हेमन्त 2025/12/01 05:56 PM
संपादकीय में स्थिति की चित्रात्मकता देखते ही बनती है। ऐसा चित्र मन मस्तिष्क में उत्पन्न हो। आनंद और कष्ट दोनों का वर्णन। वर्णन भीतर तक झंकृत कर देता है। साधुवाद है। गद्य का अनमोल नमूना है आपकी लेखनी।--हेमन्त।
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Usha Bansal 2025/12/02 07:34 PM
आदरणीय सुमन जी बहुत बहुत बधाई। आपने अमेरिका के किसानों व किसानी का जो वर्णन कियाहै उससे कुछ वर्ष पूर्व का पंजाब याद आ गया। जब बिहार से कामगर पंजाब नही पहुचें और खेतों में ही आलू सड गये। और फसलों की कटाई तक नहीं हुई। कृषी कर्म के लिए अमेरिका एक से एक आधुनिक उपकरण हैं। कि ानी भारत जैसा श्रमसाध्य नहीं है। पर टैरिफ की मार ने उनकी फसल की बर्बादी का कारण बन गई। । मतदाता चाहे पढा लिखा हो या अनपढ़ को मुफ़्त बहुत लुभाता है। बिनाश्म किये कुछ भी पाने के लिए वह तत्पर हो ट्रम्प व राजनेताओें के चक्कर में फंसता रहता है। हर बार धोखा खाकर भी नही मानता। कैसी विडम्बना है।