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प्रिय मित्रो,

साहित्य कुञ्ज का यह अंक, इस वर्ष का अंतिम अंक है। यह समय आत्मनिरीक्षण, स्वावलोकन और आत्मदर्शन का है। जिस तरह समय की धर्मिता भविष्यगामी होना है उसी तरह मानव की नैतिकता, उसका आचरण और विचार उद्योन्मुख होने चाहिएँ न कि भावनाओं के चक्रव्यूह में फँस कर पुरानी लकीर को ही पीटते रहना चाहिए। पिछले दिनों घटी आतंकी घटनाओं की छाया मन और मस्तिष्क से अभी हटी नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति के विवेक को दिशाहीन होने में समय नहीं लगता क्योंकि यह प्रतिक्रिया, प्रतिरोध और प्रतिशोध की धुँध में खो जाता है। गत वर्ष ऐसा ही रहा है। 

अप्रैल में पहलगाम में नरसंहार से धर्म की आड़ में पल रहे आतंकवाद का घृणित चेहरा देखने को मिला। निहत्थे पर्यटकों का धर्म पूछ कर, एक एक को मृत्यु के घाट उतार दिया गया। पहलगाम आतंकी हमला 22 अप्रैल 2025 को हुआ था, जिसमें 26 पर्यटक मारे गए और 17 घायल हुए। यह हमला लश्कर-ए-तैयबा और टीआरएफ़ द्वारा किया गया था और इसके बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हुआ। घटना का प्रत्याघात ऑपरेशन सिन्दूर 7मई को हुआ और आधिकारिक वक्तव्य के अनुसार अभी समाप्त नहीं हुआ है।

नवम्बर में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने भारत की राजधानी क्षेत्र में आतंकवादी प्रहारों की योजना को विफल कर दिया। परन्तु जो आतंकी बच निकला उसने दिल्ली में आत्मघाती कार विस्फोट से कई निर्दोष लोगों की जान ले ली।

इस दौरान अन्य छोटी घटनाओं की गिनती नही की जा सकती। वह तो निरन्तर चल ही रही हैं।

इसी सप्ताह ऑस्ट्रेलिया में ‘बॉन्डी बीच’ पर ’हन्नुका’ का त्योहार मना रहे यहूदी समूह पर आतंकी बाप और बेटे ने गोलियों से अनेक लोगों की जान ले ली और दर्ज़नों घायल अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। 

आम व्यक्ति इन घटनाओं पर विचार करते हुए बौखला जाता है। क्यों . . . ऐसा होता है? पहलगाम, दिल्ली और बॉन्डी बीच की घटनाओं में क्या समानता है? एक-सी हिंसक विचारधारा और स्वधर्म की आड़ में किसी भी अन्य धर्म के लोगों को मौत के घाट उतारने वाले लोग स्वयं स्वर्ग में जाना निश्चित कर रहे हैं। यह कैसा स्वर्ग है जो  हत्यारों के लिए अपने द्वार खोलता है? बौखलाहट तो तब और बढ़ जाती है जब हमारे ही मुसलमान मित्र दबे स्वरों में ही सही इन घटनाओं को न्यायसंगत ठहराने के लिए बहाने खोजते दिखाई देते हैं। मित्रो, आज इन शब्दों में अपनी भावनाओं को प्रकट कर रहा हूँ। यह भावनाएँ धार्मिक दुराग्रह नहीं हैं अपितु अपने सामाजिक दायित्व की गंभीरता को समझते यह कह रहा हूँ। यह विचार व्यक्तिगत अनुभवों से जनित हैं।

मेरी पत्नी की सहेली पाकिस्तान से है। उसकी एक बेटी की शादी इंग्लैड में जन्मे, पले-बढ़े आईटी इंजीनियर से लगभग बारह-तेरह वर्ष पूर्व हुई थी। शादी के बाद युवा दम्पती ने कैनेडा को ही अपना घर बना लिया। बेटी कैनेडा में वकील है और एक बड़ी फ़र्म में काम करती थी। धीरे-धीरे उसका रुझान मस्जिद की ‘समाजसेवी’ गतिविधियों की ओर बढ़ने लगा। फिर पता चला कि वह अपनी नौकरी छोड़ कर ‘फ़्री लॉन्सर’ हो गई है ताकि वह मस्जिद के एनजीओ को अधिक समय दे सके। कुछ महीने पहले पता चला कि उसके पति को एक बहुत बड़ी आईटी कम्पनी से निकाल दिया गया क्योंकि उसने कुछ ऐसा हमास के समर्थन में कह दिया था जो कि कम्पनी के अनुसार अनुचित था। अब इस युवा दम्पती के विषय पर क्या कहेंगे? यह युवा युगल किस दिशा की ओर अग्रसर है। 

आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि इस लड़की का लालन-पालने एक सामान्य आधुनिक परिवेश में हुआ है। मेरी पत्नी की सहेली का पति अपने मित्रों की बुरखाधारी पत्नियों का मज़ाक उड़ाया करता था और अब उसकी बच्चियाँ (तीन में से दो) हिजाब के बिना दिखाई नहीं देतीं। ये बच्चियाँ मेरे बेटों के साथ ही पली-बढ़ी हैं। चिंतनीय विषय यह है कि इनके बच्चे इस्लामिक स्कूल में पढ़ रहे हैं। वह बाहरवीं कक्षा के बाद जब विधर्मियों के साथ विश्वविद्यालय में पढ़ेंगे तो विचारधारों का समन्वय कैसे बैठेगा?

सम्पादकीय के आरम्भ में मैंने नैतिकता, विचार और आचरण को उद्योन्मुख होने के लिए जो कहा उसकी यही पृष्ठभूमि थी। जब मेरी आँखों के सामने पले-बढ़े बच्चे बहुसंख्यक समाज से नाता तोड़ कर एक विचारधारा में न स्वयं अपने आपको बल्कि अपने बच्चों को भी क़ैद कर लें; अपने बच्चों को भी ऐसी व्यवस्था में शिक्षा के लिए भेजें जो समाज के बहुसंख्यक धर्मों से परिचित न होने दे, तो ऐसे समाज के लिए चिंतित होना ही होगा। 

आज कैनेडा में शान्ति है। कभी-कभार इक्का-दुक्का घटनाएँ हो जाती हैं परन्तु परिस्थितियाँ शान्तिपूर्ण हैं। कब तक ऐसा रहेगा यह कहना कठिन है। हमास ने इज़रायल में कॉन्सर्ट में गए लोगों का नरसंहार किया। प्रत्युत्तर में इज़रायल ने ग़ाज़ा को मिट्टी मिला दिया। कैनेडा में हर धर्म के ‘प्रगतिशील’ युवाओं ने पेलेस्टाइन के झण्डे उठा कर प्रदर्शन शुरू कर दिए। वोट की राजनीति के चलते इन समूहों को समर्थन भी मिलने लगा। हौंसला बढ़ा तो सिनेगॉगज़ (यूहूदियों के मन्दिरों) पर नारे और गालियाँ लिखी जाने लगीं, पथराव होने लगा। अभी शान्ति इसलिए बची हुई है क्योंकि यहूदियों ने कैनेडा में हिंसक प्रतिशोध को नहीं अपनाया है। जिस दिन टकराव हुअ तो आतंकवाद को फैलते भी देर नहीं लगेगी। 

अभी मैंने ट्रम्प के आर्थिक/टैरिफ़ के आतंकवाद की बात नहीं की—वह एक अन्य विषय है।

आशा है कि अगले वर्ष 2026 के उदय के साथ विवेक भी उदय होगा और मानव उगते सूर्य की ओर अग्रसर होगा और पूर्वाग्रहों को त्याग कर ‘मानवता को जिएगा’ उद्योन्मुख होगा! 

—सुमन कुमार घई
 

टिप्पणियाँ

shaily 2025/12/26 10:26 AM

विश्व की दुःखद स्थिति का जो वर्णन आपने ने किया है, वास्तव में भविष्य के प्रति कोई शुभ संकेत नहीं देता है। एक धर्म विशेष के लोग अपने को ख़ुदा मान चुके हैं, अन्य सभी धर्मों के प्रति हेय दृष्टि से देखना और उनसे जीने का हक छीनने का हक ये ख़ुद ही ख़ुद को दे लेते हैं। शायद यह मज़हब विश्व विनाश के लिए ही बना था। ये दूसरों से तो लड़ते ही हैं, ख़ुद अपनों को भी चैन से नहीं रहने देते। आख़िर क्या है इस समुदाय की शिक्षा में जो हत्या, बलात्कार और आतंक करके स्वर्ग में हूरें पाते हैं। आगामी वर्ष से आशा क्या करें? वर्ष प्रति वर्ष स्थिति शोचनीय होती जा रही है।

विजय विक्रान्त 2025/12/22 03:48 AM

सुमन जी: आप ने अपने इस सम्पादकीय में, २०२५ में घटी और नफ़रत से भरी उन सब घटनाओं का, जो पर्दा फ़ाश किया है उस से तो इस बात की पुष्टी होती है कि, एक दूसरे के धर्म को लेकर, आपसी intolerance की बीमारी अब दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। भारत में तो हालात को काबू में लाने के बजाये अपने ही देश में अपने ही लोग अपनी कुर्सी को कायम रखने के लिए तुष्टीकरण का सहारा लेकर शोलों को और भी भड़का रहे हैं। शायद बो भूल रहे हैं कि इस आग में एक दिन वो ख़ुद भी दफ़नाये जा सकते हैं। भारत से बाहर, इसकी एक ज़िन्दा मिसाल ७ अक्तूबर २०२३ को हमास का इज़राइल पर हमला करना है। क्या मिला हमास को? गाज़ा पट्टी का तहस नहस, ७०,००० से अधिक लोगों की मौत और हज़ारों लोगों का बेघर होना।

शैलजा सक्सेना 2025/12/17 11:05 AM

आपने उस सच को रखा है जो हमारे आँखों के सामने है पर नकाब में है। हम उसकी आँखें देख रहे हैं और वह हमारी। उसकी आँखों का रंग बदल रहा है पर हम अभी भी वह देख रहे हैं जो देखना चाहते हैं। हम जब तक जागेंगे, तब तक उन आँखों की घृणा हमें कितना जला चुकी होगी, यह चिंतनीय है। आपने जिस उदाहरण से संपादकीय को पुष्ट किया वह चिंतनीय है... नया वर्ष शुभ लाए, ऐसा मानना तो चाहते हैं पर जागना तो हमारा ही काम है।

मधु शर्मा 2025/12/16 10:22 PM

सच दर्शाता निडरता से भरा सम्पादकीय।आये दिन की दिल दहला देने वाली दहशतगर्दी को देख अब समझदार मुस्लिम भी आलोचना करने लगे हैं। परन्तु अफ़सोस, वे मुट्ठीभर ही हैं। हमारे लोकल (स्थानीय) रेडियो के एक अधेड़ आयु के आर.जे., जो सप्ताह मे चार दिन उर्दू में शो पेश करते हैं, इनके नब्बे प्रतिशत श्रोता मुस्लिम हैं। यह निडर व्यक्ति ऑस्ट्रेलिया में हुई इस आतंकवादी घटना का वर्णन करते हुए मुस्लिम-समाज को खुलेआम लताड़ रहा था कि "सभी मुसलमान दहशतगर्द नहीं होते मगर सभी दहशतगर्द मुसलमान ही क्यों होते हैं...और फिर हम मुस्लिम ही शिकायत करते हैं कि पाश्चात्य देश यूँही 'इस्लामोफ़ोबिया' का शोर मचा-मचाकर दुनिया को हम मुसलमानों के ख़िलाफ़ कर रहे हैं..."। ऐसे ही उनके अन्य तर्क सुन-सुनकर कितने ही लोगों ने ग़ैर-मुसलमानों के प्रति अपनी गलत सोच को बदल भी डाला है। क्रिसमस न मनाने वाले या हिंदु-सिक्खों के त्यौहारों पर शुभकामनाएँ न देने वाले कितने ही मुस्लिम श्रोता अब रेडियो पर बधाई-संदेश स्वयं 'ऑन एयर' आकर या टैक्स्ट संदेश भेजने लगे हैं। वे स्वीकार भी करने लगे हैं कि उन्हें घर व स्कूलों में जो कुछ बचपन से पढ़ाया गया था, इसीलिए वे लकीर के फ़क़ीर बन गये थे। ऐसे लोग, यदि उन्हें भनक पड़ जाये, अपने बच्चों को हर हालात में गलत मार्ग पर जाने से अवश्य रोकेंगे। पाश्चात्य देशों में इम्मीग्रेशन (आप्रवासी) कानून बहुत सख़्त किए जाने के पश्चात् अब वीज़ा आसानी से मिलने पर भी पाबंदी लगने वाली है। इन रोक-टोक के चलते सम्पूर्ण संसार में अमन व शांति स्थापित हो जाये, यही मेरी कामना नववर्ष के लिए ही नहीं अपितु भविष्य के लिए भी है।

UshaRaniBansal 2025/12/16 08:45 PM

बहुत बधाई सुमन जी आपने जिस परिवेश में होने वाले जिस परिवर्तन की ओर संकेत ही नही खुले शब्दों में लिखा है वह वास्तव में डरावना भविष्य है। २०१२ में जब मैं टोरंटो में एक दो मुस्लिम परिवारों से मिली तो उन्होंने इस पर अफसोस जताया कि उन्हें अपने मज़हब के बारे में भारत में कुछ पता नहीं था। टोरंटो आकर उन्होंने अपना फर्ज , मजहब समझा है। वह बकायदा इसकी तालीम ले रही हैं। अब उन्हें हिजाब और बुर्के की अहमियत पता लग रही है ऐसा ही हाल इंडोनेशिया की मुस्लिम जनता का भी हो रहा है। कुछ मुस्लिम देश वहां इमाम को माध्यम बना कर कट्टरपंथी विचारधारा को बढावा दे रहे हैं। इंडोनेशिया बदल रहा है।

हेमन्त 2025/12/16 05:09 PM

आपने जो बात संपादकीय में उठाई उसका हल तो कोई नहीं है। परन्तु अन्य को सचेत रहना कुछ अच्छा होगा।

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