अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अनैतिक प्रेम

"मेरी रीतू . . . ओ माय लव आओ मेरी बाँहों में समा जाओ," सुधीर ने रीतू को बहुत ज़ोर से आग़ोश में लिया।

"अरे अरे मेरा दम घुट जाएगा। धीरे-धीरे आशिक़ जी मैं कहीं भागी थोड़ी जा रही हूँ," रीता ने कसमसाते हुए छूटने की कोशिश की।

रीता सुधीर की बाँहों में मछली की भाँति फिसलने लगी किन्तु सुधीर रीता के अंदर समाता चला गया। फिर एक ऐसा तूफ़ान उठा जिसमे रीता का जिस्म और आत्मा दोनों तृप्त हो गए। आज पहली बार रीता ने किसी पुरुष को महसूस किया; उसके अंदर की नारी सुगन्धित होकर महक उठी। आज पहली बार उसे लगा कि वह एक सम्पूर्ण स्त्री है।

शादी के २० साल तक वह सिर्फ़ प्यासी भटकती रही। न शरीर की बुझी न आत्मा की; सिर्फ़ छलावा और अवसरवादिता की शिकार होती रही। पति सिर्फ़ नाम का था; दिन भर दुकान पर पैसों में व्यस्त और रात में नींद में; उसने कभी उसकी परवाह नहीं की। रीतू ने बहुत कोशिश की लेकिन उसके पति की आदतें नहीं बदलीं। फिर उसकी मुलाक़ात सुधीर से हुई। सुधीर एक समाजसेवी था। समाज के निम्न तबक़ों के बच्चों के लिए शिक्षा एवं उनके बेहतर पोषण के लिए अपने एन जी ओ के माध्यम से कार्य करता था। रीता उससे प्रभावित हुई और उस एन जी ओ के लिए कार्य करने लगी। रीता और सुधीर कब प्यार में रँग गए पता ही नहीं चला और एक रात वह सब हो गया जो प्रेमियों के लिए तो सही था किन्तु सामाजिक रूप से अनैतिक कहा जाता है।

दोनों जब तूफ़ान से निकले तो दोनों के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं।

"रीतू क्या हमने ये सही किया," सुधीर ने रीता की आँखों में झाँक कर कहा।

"पता नहीं सुधीर लेकिन मैं आज बहुत ख़ुश हूँ," रीता ने मुस्कुराते हुए कहा।

"लेकिन सामाजिक रूप से तो ये अनैतिक कहा जाएगा," सुधीर ने उदास होकर कहा।

"ये ठीक है कि सामाजिक रूप से यह अमान्य है। लेकिन बीस साल से जो मैं भुगत रही थी उसकी तुलना मैं ये बिलकुल अनैतिक नहीं है," रीतू ने सुधीर का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।

"अब आगे क्या होगा? हमारा रिश्ता किस ओर जा रहा है?" सुधीर के चेहरे पर चिंता के निशान थे।

"बिलकुल सही जा रहा है और अब हम इस अनैतिक को नैतिक बनाने जा रहे हैं। मैं अपने पति से तलाक़ लेकर तुमसे शादी करूँगी। क्या तुम्हें ये रिश्ता मंज़ूर है?" रीता ने बहुत गंभीरता से सुधीर की ओर देखा।

सुधीर के चेहरे पर आत्मग्लानि की जगह मुस्कराहट थी।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सामाजिक आलेख

कविता

लघुकथा

बाल साहित्य कविता

गीत-नवगीत

दोहे

कविता-मुक्तक

कविता - हाइकु

व्यक्ति चित्र

साहित्यिक आलेख

सिनेमा और साहित्य

कहानी

किशोर साहित्य नाटक

किशोर साहित्य कविता

ग़ज़ल

ललित निबन्ध

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं