अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

गाय की रोटी

कल जब शर्मा जी शाम को घूम कर लौट रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक गाय दो बछड़ों के साथ एक घर के दरवाज़े पर खड़ी थी, घर की मालकिन ने एक रोटी लाकर बछड़े को देने की कोशिश की तो गाय ने बछड़े को धकिया कर ख़ुद वह रोटी खाने लगी। शर्मा जी ने देखा कि वह गाय हर घर में जाती और ख़ुद वह रोटी खाती बछड़ों को दूर कर देती। 

शर्मा जी का मन बहुत भारी हो गया सोचने लगे देखो कलियुग आ गया गाय जिसे हम सबसे ज़्यादा परोपकारी मानते हैं वह भी कलियुग के प्रभाव में अपने बछड़ों को भूखा रख कर ख़ुद रोटी खा रही है। 

कुछ देर बाद जब शर्माजी बाज़ार के लिए निकले तो उन्होंने देखा कि वो दोनों बछड़े अपनी माँ का दूध पी रहे हैं एवं वह गाय बड़े दुलार से उन्हें चाट रही है। शर्मा जी को सारा मामला समझ में आ गया, शर्मा जी जब उसके बाजू से निकले तो जैसे गाय उनसे कह रही हो, “क्यों शर्मा जी अब समझ में आया कि वो सारी रोटी मैं क्यों खाती थी ताकि हम तीनों जीवित रह सकें मेरे दूध से मेरे दोनों बछड़े पल रहे हैं। अगर मैं रोटी नहीं खाती तो ये दूध कहाँ से निकलता और मेरे बच्चे कैसे पलते?” 

शर्मा जी कि आँखों में गाय और उसकी समझदारी के लिए अनन्य प्रेम भाव था। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अकथित दर्द
|

दोपहर प्रिया जब कॉलेज से घर आयी तो ननद सास…

अकेलेपन का बोझ
|

“हैलो मेनका! बिज़ी तो नहीं? कहीं मैं…

अगर तुम मिल जाओ 
|

अख़बार में छपा यह समाचार हृदय विदाकर था।…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

कविता

कहानी

कविता-मुक्तक

सम्पादकीय प्रतिक्रिया

गीत-नवगीत

आप-बीती

साहित्यिक आलेख

ग़ज़ल

दोहे

बाल साहित्य कविता

नाटक

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

स्मृति लेख

व्यक्ति चित्र

सांस्कृतिक आलेख

ललित निबन्ध

सामाजिक आलेख

चिन्तन

काम की बात

कविता - हाइकु

ऐतिहासिक

कविता - क्षणिका

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

स्वास्थ्य

खण्डकाव्य

रेखाचित्र

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं