नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान
आलेख | सांस्कृतिक आलेख डॉ. सुशील कुमार शर्मा1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
(नर्मदा जयंती पर विशेष आलेख)
नर्मदा केवल एक नदी का नाम नहीं है, वह भारतीय सार्वभौमिक चेतना की वह अविरल धारा है जो समय से परे, संस्कारों से युक्त, इतिहास से गहन और प्रकृति से अभिन्न है। नर्मदा के जल में पुराणों का शास्त्रीय वैभव, आध्यात्मिक पथ का दीप, तथा पर्यावरण की पुकार, तीनों एक साथ गुँथे हुए हैं। यही कारण है कि नर्मदा को माँ नर्मदा कहा जाता है। न केवल धर्मग्रंथों में, बल्कि जीवित अनुभवों और मानव-प्रकृति के संवाद में भी नर्मदा का अस्तित्व एक सौंदर्य, करुणा और चेतना का रूपक बन जाता है।
नर्मदा का प्रचलित पुराणिक रूप हमें यह बताता है कि उसके दर्शन मात्र से ही पापों के तिरोहित हो जाने का फल प्राप्त होता है। महान शास्त्रों के अनुसार गंगा-यमुना की नदियाँ तो स्नान से पावन होती हैं, पर नर्मदा की पवित्रता इतनी गहन है कि उसके दर्शन से भी पापनाश का संकल्प सम्भव होता है।
इस दृष्टि से नर्मदा जल मात्र नहीं, पर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचालक और जीवन्मुक्ति का स्रोत है। वह निर्जन घाटों में भी शान्ति का वास करती है और भीड़-भरी परिक्रमा में भी अपना समान आत्मीय प्रेम प्रदर्शित करती है।
धार्मिक अनुभूति और कर्मयोग
नर्मदा की धार पर चलना, उनके तट पर सिर रखना, उनकी धारा को स्पर्श करना, यह केवल भौतिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मा की अंतर्यात्रा है। नर्मदा परिक्रमा हिन्दू धर्म का एक अति प्रतिष्ठित धार्मिक कर्म है, जिसमें श्रद्धालु शारीरिक परिश्रम और मानसिक एकाग्रता से नर्मदा की संपूर्ण परिक्रमा करते हैं। यह न केवल पारंपरिक व्यवहार है, बल्कि आध्यात्मिक कर्मयोग का एक सशक्त आयाम भी है।
नदी के दोनों तटों पर स्थित हज़ारों मंदिर, तीर्थस्थान, तथा सांस्कृतिक स्थल न केवल भक्ति के केंद्र हैं, पर वे मानव की दिव्य आकांक्षा और उसकी नियति की अनुभूति का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। यहाँ श्रद्धालु अपनी आत्मा को शुद्ध कर, कर्मों का संधान करते हैं।
प्रकृति का गहन संग और जीवों का अस्तित्व
प्रकृति के दृष्टिकोण से नर्मदा एक अविरल जीवन-धारा है। यह नदी मध्य भारत की महाद्वीपीय ढाल पर बहते
हुए उन सभी जीवों का आश्रय है जिनका अस्तित्व जल पर निर्भर है। नदी के विस्तृत बेसिन में नदी के साथ-साथ विस्तृत जंगल, वन्यजीव, पक्षी, जल-जीव और वनस्पति का एक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र विद्यमान है।
नदी के सपाट क्षेत्र में खेत, बग़ीचे, घास के मैदान और सोने जैसी उपजाऊ मिट्टी का विस्तार होता है। यह वह भूमि है जहाँ न सिर्फ़ मानवीय जीवन संवहनीय है बल्कि हज़ारों प्रजातियाँ अपनी विविधता और अनुपम सौंदर्य के साथ जीवंत हैं शेष पृथ्वी के जीवन-चक्र का आधार बनाते हैं। परन्तु, यह सुंदर धारा आज विवर्धित मानव-क्रिया के दबाव में है। औद्योगिक अपशिष्ट, खेतों का रसायनिक मल, निर्माण कार्य, मेले-उत्सवों की अव्यवस्था, एवं अनियंत्रित परिक्रमा न केवल नदी के जल-गुण को दूषित कर रहे हैं, बल्कि इसके पारिस्थितिकी तंत्र को भी क्षय कर रहे हैं।
मानव-तरलता और प्रकृति के प्रति सम्बन्ध
नदी माँ है, परन्तु माँ तथा उसकी संतानों के बीच का सम्बन्ध आज संकट में है। मानव के स्वार्थ, लालच, सुविधा और अपने कर्मों को प्राकृतिक संतुलन से ऊपर रखने की प्रवृत्ति ने नदी की अमृतधारा को मलिन कर दिया है। यह वे ही मनोवैज्ञानिक कारण हैं जिन्होंने माँ नर्मदा की करुण पुकार को प्रतिध्वनित किया है एक पुकार जो मानव चेतना को जागृत करने की अनिवृत्ति माँगती है।
हम जब नर्मदा को अपने जीवन की लय से अलग कर देते हैं, तब हम अपने ही अस्तित्व, अपनी संस्कृति, अपनी भूमि और अपनी आत्मा की जड़ों को काट देते हैं। यह वह सम्बन्ध है जहाँ नदी के अस्तित्व को बचाना केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव-आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का संबोधन है।
संरक्षण के मार्ग: चेतना से क्रिया तक
प्रकृति संरक्षण केवल प्रदर्शनों, घोषणाओं या नियम-निर्माण से पूर्ण नहीं होता। यह आत्मा और अनुभूति की गहराइयों में उतरकर तब तक नहीं पहुँच सकता जब तक हर व्यक्ति स्वयं नर्मदा के प्रति एक सम्बद्ध कर्म न करे। माँ नर्मदा की करुण पुकार हमें यही कहती है मन छोटा मत करो, कर्म महान बनाओ।
नर्मदा स्वयं सहनशीलता का आदर्श है; उसने अपनी गंगा-गौरवता को निर्बलता में नहीं बदला, परन्तु उसने मानव की क्रूरता को भी अपनी धारा में मिला लिया। अब समय आ गया है कि मानव अपने किये कर्मों का उत्तर स्वयं बहता जल बनकर दे।
संरक्षण के कुछ प्रमुख उपाय नीचे, व्यवहारगत रूप से क्रियान्वयन योग्य हैं।
-
जल-संरक्षण के लिए मानवीय जागरूकता।
-
नदी किनारे अव्यवस्थित रेत उत्खनन को रोकना।
-
पूजा-निर्माल्य को पर्यावरण-अनुकूल तरीक़े से पुनः उपयोग योग्य खाद में परिवर्तित करना।
-
पॉलीथीन तथा संरचना-दूषित पदार्थों से दूरी बनाना।
-
नदी तट पर साफ़-सफ़ाई के लिए नियमित जनता-सेवा अभियानों का आयोजन।
-
सामुदायिक चेतना और शिक्षा
-
गाँव और नगरों में जल-संरक्षण शिविरों की स्थापना।
-
यात्राओं और मेले के आयोजनों में प्रदूषण रहित कार्यक्रमों का प्रावधान।
-
धार्मिक नेतृत्व को पर्यावरण संदेश का दूत बनाना।
आध्यात्मिक पुनर्जागरण: नदी और मानव का संवाद
नदी और मनुष्य के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संवाद चल रहा है। नर्मदा की धारा में न केवल जल का प्रवाह है, बल्कि वह भक्ति की धारा भी निरंतर बहाती है। यहाँ जो धार्मिक अनुभव प्रकट होता है, वह केवल मत-रिवाज़ का अनुकरण नहीं; बल्कि वह आत्मा का स्व-अन्वेषण है, जहाँ मनुष्य स्व-केन्द्रितता से ऊपर उठकर सर्व-केन्द्रितता की अनुभूति को स्वीकार करता है।
जब कोई भक्त नर्मदा के तट पर अपने सर झुकाता है, तब वह केवल नदी के आगे विनम्रता नहीं प्रस्तुत करता; वह स्वयं की मनःशुद्धि, चरित्र-परिष्कार और कर्तव्य-बोध की पूजा भी करता है। यही वह अनुभूति है जिसे नर्मदा का संदेश हमें प्रतिदिन देना चाहती है।
करुणा, चेतना और संरक्षण का संगम
नर्मदा की धारा वह अनंत धारा है जो जीवन, चेतना, इतिहास तथा प्रकृति को एक सूत्र में बाँधती है। उसकी करुण पुकार केवल नदी से निकलती आवाज़ नहीं, वह पूर्वजों की धरोहर, हमारे कर्मों का न्याय और हमारी आने वाली पीढ़ियों के स्वप्नों की पुकार है। यह पुकार मानव से कहती है कि मातृत्व न केवल दिए जाने वाला दान है, पर आत्मा का वह दर्पण भी है जिसमें मनुष्य अपने कर्मों का प्रतिबिम्ब देखता है।
नर्मदा के जल को साफ़ रखना कोई असम्भव कार्य नहीं; यह तो केवल भावना से कर्म की ओर एक सरल सी यात्रा है। नदी माँ से सीख लेने का यही अर्थ है जीवन की कल्पना करना, उसे सम्मान देना, और उसे बचाने का प्रण लेना।
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- मैडम एम
- मौन की परछाइयाँ
- राखी का फ़र्ज़
- रिश्तों की गर्माहट
- रिश्तों के रेशमी धागे
- रेशमी धागे: सेवा का नया पथ
- हरसिंगार
- ज़िन्दगी सरल है पर आसान नहीं
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
लघुकथा
- अंतर
- अनैतिक प्रेम
- अपनी जरें
- आँखों का तारा
- आओ तुम्हें चाँद से मिलाएँ
- उजाले की तलाश
- उसका प्यार
- एक बूँद प्यास
- काहे को भेजी परदेश बाबुल
- कोई हमारी भी सुनेगा
- गाय की रोटी
- गाय ‘पालन की परिभाषा’!
- डर और आत्म विश्वास
- तहस-नहस
- तुलना का बोझ
- दूसरी माँ
- नारी ‘तुम मत रुको’!
- पति का बटुआ
- पत्नी
- पाँच लघु कथाएँ
- पौधरोपण
- बेटी की गुल्लक
- माँ का ब्लैकबोर्ड
- माँ ‘छाया की तरह’!
- मातृभाषा
- माया
- मुझे छोड़ कर मत जाओ
- मुझे ‘बहने दो’!
- म्यूज़िक कंसर्ट
- रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
- रौब
- शर्बत
- शिक्षक सम्मान
- शिक्षा की पाँच दीपशिखाएँ
- शुद्धि की प्रतीक्षा
- शेष शुभ
- सपनों की उड़ान
- हर चीज़ फ़्री
- हिंदी–माँ की आवाज़
- हिन्दी इज़ द मोस्ट वैलुएबल लैंग्वेज
- ग़ुलाम
- ज़िन्दगी और बंदगी
- फ़र्ज़
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- अमृत काल का आम
- एक कप चाय और सौ जज़्बात
- कविता बेचो, कविता सीखो!
- काश मैं नींबू होता
- गुरु दक्षिणा का नया संस्करण—व्हाट्सएप वाला प्रणाम!
- घरेलू मॉडल स्त्री
- डॉ. सिंघई का ‘संतुलित’ संसार
- नवदुर्गा महोत्सव और मोबाइल
- न्याय की गली में कुत्तों का दरबार
- प्रोफ़ाइल पिक की देशभक्ति
- मातृ दिवस और पितृ दिवस: कैलेंडर पर टँगे शब्द
- मिठाइयों में बसा मनुष्य का मनोविज्ञान
- वाघा का विघटन–जब शेर भी कन्फ्यूज़ हो गया
- शर्मा जी और सब्ज़ी–एक हरी-भरी कथा
ललित निबन्ध
गीत-नवगीत
- अखिल विश्व के स्वामी राम
- अच्युत माधव
- अनुभूति
- अब कहाँ प्यारे परिंदे
- अब का सावन
- अब नया संवाद लिखना
- अब वसंत भी जाने क्यों
- अबके बरस मैं कैसे आऊँ
- आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
- आज से विस्मृत किया सब
- इस बार की होली में
- उठो उठो तुम हे रणचंडी
- उर में जो है
- कि बस तुम मेरी हो
- कृष्ण मुझे अपना लो
- कृष्ण सुमंगल गान हैं
- गमलों में है हरियाली
- गर इंसान नहीं माना तो
- गुरु पूर्णिमा पर गीत
- गुलशन उजड़ गया
- गोपी गीत
- घर घर फहरे आज तिरंगा
- चला गया दिसंबर
- चलो होली मनाएँ
- चढ़ा प्रेम का रंग सभी पर
- ज्योति शिखा सी
- झरता सावन
- टेसू की फाग
- तुम तुम रहे
- तुम मुक्ति का श्वास हो
- दिन भर बोई धूप को
- धरती बोल रही है
- नया कलेंडर
- नया वर्ष
- नव अनुबंध
- नववर्ष
- फागुन ने कहा
- फूला हरसिंगार
- बहिन काश मेरी भी होती
- बेटी घर की बगिया
- बोन्साई वट हुए अब
- भरे हैं श्मशान
- मतदाता जागरूकता पर गीत
- मन का नाप
- मन को छलते
- मन गीत
- मन बातें
- मन वसंत
- मन संकल्पों से भर लें
- महावीर पथ
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 001
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 002
- मौन गीत फागुन के
- मज़दूर दिवस पर गीत
- यूक्रेन युद्ध
- वयं राष्ट्र
- वसंत पर गीत
- वासंती दिन आए
- विधि क्यों तुम इतनी हो क्रूर
- शस्य श्यामला भारत भूमि
- शस्य श्यामली भारत माता
- शिव
- श्रावण
- सत्य का संदर्भ
- सुख-दुख सब आने जाने हैं
- सुख–दुख
- सूना पल
- सूरज की दुश्वारियाँ
- सूरज को आना होगा
- स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
- हर हर गंगे
- हिल गया है मन
- ख़ुद से मुलाक़ात
- ख़ुशियों की दीवाली हो
स्वास्थ्य
स्मृति लेख
खण्डकाव्य
बाल साहित्य कविता
- अरे गिलहरी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - ठंड
- गर्मी की छुट्टी
- चिड़िया का दुःख
- चिड़िया की हिम्मत
- पतंग
- पानी बचाओ
- बादल भैया
- बाल कविताएँ – 001 : डॉ. सुशील कुमार शर्मा
- बेचारा गोलू
- मुनमुन गिलहरी
- मैं कुछ ख़ास बनूँगा
- मैं ही तो हूँ— तुम्हारे भीतर
- लोरी
- लौकी और कद्दू की लड़ाई
- हम हैं छोटे बच्चे
- होली चलो मनायें
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
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