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साहित्य की अस्मिता का अपमान

 

उस दिन
मंच पर
एक व्यक्ति नहीं
एक प्रश्न खड़ा था
और प्रश्नों के सामने
हमेशा
सत्ताएँ असहज होती हैं। 
 
विश्वविद्यालय
जो कभी
संवाद का घर था
अचानक
दरबार में बदल गया
जहाँ विचार नहीं
अनुशासन बोला। 
 
कहना आसान है
यह किसी एक व्यक्ति का अहं था
पर सच यह है
अहं अकेला नहीं चलता
उसे
चुप बैठी भीड़ चाहिए
सम्मानित कुर्सियाँ चाहिए
और मौन की सहमति चाहिए। 
 
मनोज रुपड़ा
एक नाम भर नहीं था
वह
साहित्य की कसौटी था
जिस पर
हमारे साहस को
कसा जाना था
और हम
फिसल गए। 
 
जब शब्दों का अपमान हुआ
तब
कई प्रतिष्ठित नाम
मंच के नीचे
सुरक्षित बैठे रहे
उनकी आँखों में
असहमति थी शायद
पर पैरों में
खड़े होने का साहस नहीं। 
 
तटस्थता
कितना सुंदर शब्द है
पर जब अन्याय सामने हो
तब
तटस्थ रहना
सहभागिता बन जाता है
और मौन
सबसे प्रभावी समर्थन। 
 
साहित्य अकादमी
उस दिन
केवल एक संस्था नहीं थी
वह
साहित्य की आत्मा का
प्रतिनिधि थी
और उसकी चुप्पी
सबसे ऊँची आवाज़ बन गई। 
 
मंच सजा था
नाम उधार थे
सम्मान की चादर तनी थी
पर भीतर
कविता काँप रही थी
क्योंकि
उसकी पीठ
ख़ाली थी। 
 
बाद में
बयान आए
सोशल मीडिया पर
क्रोध फूटा
पर वह क्रोध
इतना सुरक्षित था
कि किसी पुरस्कार
किसी आमंत्रण
किसी सुविधा को
छूता तक नहीं। 
 
लोभ
हमेशा
तलवार की तरह नहीं आता
वह
रेशमी रस्सी बनकर आता है
और धीरे धीरे
रीढ़ को
झुकाता चला जाता है। 
 
यह घटना
किसी एक कवि की नहीं
यह
पूरे साहित्य का
आईना है
जिसमें
हमारी झुकी हुई पीठ
स्पष्ट दिखाई देती है। 
 
साहित्य
तभी जीवित रहता है
जब वह
सत्ता से
आँख मिलाकर बात करे
और जब वह
आँखें चुरा ले
तो शब्द
सिर्फ़ सजावट रह जाते हैं। 
 
आज प्रश्न
किसी कुलपति का नहीं
किसी मंच का नहीं
प्रश्न है
कि क्या हम
अब भी
सच के पक्ष में
खड़े हो सकते हैं। 
 
क्योंकि
अगर साहित्य भी
डर गया
तो फिर
अँधेरे से
लड़ने के लिए
कौन बचेगा। 

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