अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जीवन प्रेम से खुलता है

 

तुम किसी स्त्री को
निर्वस्त्र कर सकते हो
पर नग्न नहीं। 
 
नग्नता
कपड़ों का हट जाना नहीं
नग्नता
आत्मा का भरोसा है। 
 
जब बलपूर्वक
कपड़े उतारे जाते हैं
तो स्त्री
और भी गहरे वस्त्र पहन लेती है
ऐसे वस्त्र
जो आँखों से नहीं
केवल प्रतीक्षा से उतरते हैं। 
 
तुम शरीर को छू सकते हो
तोड़ सकते हो
रौंद सकते हो
पर आत्मा
वहाँ से चुपचाप चली जाती है
जैसे कोई दीप
हवा आने से पहले ही
बुझ जाना चुन ले। 
 
शरीर पर किया गया अत्याचार
लाश से किया गया संवाद है
उसमें जीवन उपस्थित नहीं होता
केवल आकृति बची रहती है
आत्मा नहीं। 
 
कुँआरापन
कोई झिल्ली नहीं
जो फट जाए
कुँआरापन
तो विश्वास की जड़ है
जो केवल प्रेम से
फूल बनती है। 
 
वैज्ञानिक
जीवन को मेज़ पर लिटाता है
औज़ारों से खोलता है
काटता है
मापता है
और समझ लेता है
कि उसने जान लिया। 
 
पर जो तोड़ा गया
वह जाना नहीं गया
जो खंडित हुआ
वह रहस्य नहीं रहा
केवल वस्तु बन गया। 
 
प्रेम के पास
हाथ में हथियार नहीं होता
वह
घुटनों के बल बैठा
प्रकृति के द्वार पर
प्रार्थना की तरह होता है। 
 
प्रेम अर्जुन की तरह है
दुर्योधन नहीं
वह आक्रामक नहीं
धैर्य में डूबा हुआ होता है। 
 
प्रेम हमेशा कहता है
मैं प्रतीक्षा कर सकता हूँ
जब तुम चाहो
तभी खुलना
जब तुम्हारे भीतर
भी वही चाह जागे। 
 
और तब
प्रकृति ने
अपने चीर स्वयं बढ़ा दिए
रहस्य
फूल की तरह
खुल गया। 
 
जो ज्ञान
प्रयोगशालाओं में नहीं मिला
वह
प्रतीक्षा की एक साँस में
उतर आया। 
 
धर्म
कोई सिद्धांत नहीं
धर्म
प्रेम की भाषा है
अनाक्रमण का साहस है
और भरोसे की धीमी चाल है। 
 
जीवन
तो स्त्री है
वह
बल से नहीं
समर्पण से खुलता है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

कविता - हाइकु

सामाजिक आलेख

दोहे

कहानी

ऐतिहासिक

सांस्कृतिक आलेख

कविता - क्षणिका

चिन्तन

लघुकथा

व्यक्ति चित्र

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ललित निबन्ध

साहित्यिक आलेख

कविता-मुक्तक

गीत-नवगीत

स्वास्थ्य

स्मृति लेख

खण्डकाव्य

बाल साहित्य कविता

नाटक

रेखाचित्र

काम की बात

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

ग़ज़ल

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं