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मकर संक्रांति

 

हुए सूर्य उत्तर अयन, जागा जीवन गान। 
सूर्य मकर के कह रहे, शुभ का नया विधान॥ 
 
तिल गुड़ के लड्डू बने, घुले नेह मनुहार। 
सूरज के इस पर्व में, जुड़ता मन परिवार॥ 
 
सूरज ने बदली दिशा, मन में ख़ुशी अपार। 
अँधियारे मन से हटे, आशा का संचार॥ 
 
हरियाली है खेत में, थिरका हृदय किसान। 
राशि मकर में सूर्य अब, महका श्रम का मान। 
 
संग पतंगों के उड़े, सपनों के विस्तार। 
नीले नभ में लिख दिया, उत्सव का आभार॥ 
 
दान पुण्य की भावना, जागी हर घर द्वार। 
सूरज की संक्रांति ही, जीवन का आधार॥ 
 
संगम तट पर स्नान कर, धो लो मन के पाप। 
सूर्य वंदना से मिटें, जीवन के संताप॥ 
 
घर घर ख़ुशियाँ बाँटते, गुड़ तिल लड्डू गोल।
मकर संक्रांति जोड़ती, सब रिश्ते अनमोल॥ 
 
बीती ताहि बिसार दे, चल द्रुति गति की चाल। 
नव संकल्पों के संग अब, जीवन की चौपाल॥
 
धूप गुनगुनी हो रही, सतरंगी अब राह। 
सूर्य मकर के हो चले, पूरी हों सब चाह॥

 

“आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएँ!”

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