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पुरानी मेज़

 

कार्यालय में नई काँच की मेज़ रखी गई थी। चमकदार, पारदर्शी, आधुनिक। 

सभी कर्मचारी उसे कौतूहल से देख रहे थे। 

प्रबंधक ने गर्व से कहा, “अब हमारा कार्यालय भी आधुनिक दिखेगा।” 

पुरानी लकड़ी की मेज़ को कोने में हटा दिया गया। वह वर्षों तक उसी कमरे में रही थी। कितने ही कर्मचारी उसी पर बैठकर आदेशपत्र लिखते रहे, कितनों ने त्यागपत्र भी उसी पर रखा था। 

दोपहर में एक वृद्ध चपरासी कमरे में आया। उसने सावधानी से काँच की मेज़ साफ़ की, फिर एक क्षण ठहरकर कोने में रखी लकड़ी की मेज़ को देखने लगा। 

एक युवा कर्मचारी ने हँसते हुए पूछा “काका, उस पुरानी मेज़ में क्या रखा है?” 

चपरासी ने धीमे स्वर में कहा, “बाबूजी, इस मेज़ पर जब आपके प्रबंधक साहब नए आए थे, तब पहली बार नियुक्ति पत्र पर दस्तख़त किए थे। उसी दिन उन्होंने कहा था कि यह कार्यालय परिवार जैसा है।” 

कर्मचारी मुस्कुरा दिया, “समय बदलता है काका।” 

शाम को वही प्रबंधक एक कर्मचारी को कठोर स्वर में डाँट रहे थे “काम नहीं होता तो नौकरी छोड़ दो।” कर्मचारी चुपचाप खड़ा रहा। उसने कुछ नहीं कहा। 

उसकी दृष्टि अनायास ही कोने में रखी पुरानी लकड़ी की मेज़ पर चली गई। 

वृद्ध चपरासी भी वहीं खड़ा था। उसने धीरे से उस मेज़ की धूल पोंछ दी। 

कमरे में चमकती काँच की मेज़ सबको दिखाई दे रही थी। 

पर उस कोने में खड़ी लकड़ी की मेज़ जैसे किसी पुराने वाक्य को चुपचाप याद कर रही थी। 

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