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अनकहा आलोक

 

वह शब्दों की उजली थाली लेकर
प्रेम का प्रदर्शन नहीं करती
उसकी आँखों में
कोई उद्घोष नहीं जलता
वह घर के मौन में
धीरे-धीरे एक दीर्घ सरिता की
तरह बहती है
 
सुबह की पहली आहट में
उसके स्पर्श से
दिन आकार लेता है
और संध्या की थकी हुई देह पर
वही शान्ति बनकर उतरती है
वह कभी अपने हिस्से का समय
चुपचाप किसी और के नाम लिख देती है कभी अपनी इच्छाओं को
इतनी कोमलता से समेटती है
कि कोई अभाव दिखाई ही नहीं देता
उसके भीतर एक अज्ञात धैर्य है
जो टूटता नहीं बस रूप बदलता है 
और हर कठिन क्षण में
आश्रय बनकर फैल जाता है
 
वह वचन नहीं देती
पर उसकी उपस्थिति
सबसे बड़ा आश्वासन होती है
जब जीवन अपनी कठोरता में
मनुष्य को थका देता है
वह बिना कुछ कहे
सहारा बन जाती है
 
उसकी थकान
अक्सर अदृश्य रहती है
पर उसका समर्पण
हर कोने में सुगंध की तरह बसता है
वह जानती है प्रेम
आवेग का उत्सव नहीं
एक दीर्घ साधना है
जिसमें निरंतर देना होता है
बिना किसी प्रतिध्वनि की अपेक्षा के
 
उसका स्नेह
धीरे-धीरे संबंधों की मिट्टी में उतरता है
और वहाँ से जीवन के वृक्ष उगते हैं
 
वह
कभी स्वयं को केंद्र नहीं बनाती
पर उसके बिना
कोई भी केंद्र पूर्ण नहीं होता
उसकी उपस्थिति
किसी तीव्र लहर की तरह नहीं
एक स्थिर विस्तार है
जहाँ मनुष्य
अपने सारे विखंडन छोड़कर
पूर्ण होने का अनुभव करता है
और तब समझ में आता है
कि उसका प्रेम
कहने की वस्तु नहीं
 
वह तो
हर घर में
उसके रूप में ईश्वर रहता है, 
सबकी देखभाल करने
वह जीवन के हर कण में
धीरे धीरे उगता हुआ
एक अनंत आलोक है। 

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