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समय की धमनियों में बहता हुआ सत्य

 

यह कैसा समय है
जहाँ मनुष्य
अपनी ही परछाईं से अनजान खड़ा है
और दर्पण
सिर्फ़ चेहरा दिखाते हैं
चरित्र नहीं
 
नगरों की ऊँची इमारतों ने
आकाश को खंडित कर दिया है
अब सूरज
खिड़कियों में टुकड़ों में आता है
और हवा
पहचान पत्र लेकर चलती है
 
पेड़
जो कभी पृथ्वी की स्मृतियाँ थे
अब आँकड़ों में बदल दिए गए हैं
और नदियाँ
अपनी ही थकान में
अपने स्रोत को याद करती हैं
 
कंक्रीट के इस युग में
मिट्टी की गंध
एक विलुप्त होती भाषा है
जिसे केवल किसान
अपने पसीने की वर्णमाला में पढ़ता है
 
पर खेतों की हरियाली के ऊपर
एक अदृश्य संशय मँडराता है
बादल आते हैं
पर भरोसा नहीं आता
और बीज
धरती से अधिक
समय से डरता है
 
मनुष्य ने
दूरी को पराजित कर दिया है
पर निकटता हार गया है
स्पर्श अब
संवेदना नहीं
एक विस्मृत क्रिया है
 
शब्द
जो कभी हृदय के दूत थे
अब शोर के व्यापारी हो गए हैं
सत्य
अपनी ही देहरी पर
अतिथि बनकर खड़ा है
 
विवेक
भीड़ के कोलाहल में
अपनी ही आवाज़ खोज रहा है
और न्याय
तराज़ू नहीं
प्रतीक्षा बन गया है
 
फिर भी
इस अँधेरे की तहों में
एक मौन प्रकाश पल रहा है
किसी बच्चे की आँखों में
अब भी भविष्य मुस्कुराता है
 
किसी स्त्री के धैर्य में
अब भी पृथ्वी की धुरी स्थिर है
किसी सैनिक की निष्ठा में
अब भी सीमाएँ सुरक्षित हैं
 
और किसी कवि के शब्दों में
अब भी बची हुई है
मनुष्य होने की अंतिम सम्भावना
 
समय चाहे जितना कठोर हो जाए
संवेदना
अपनी जड़ों में जीवित रहती है
वह प्रतीक्षा करती है
उस क्षण की
जब मनुष्य
फिर से मनुष्य होगा
 
और पृथ्वी
फिर से
घर कहलाएगी। 

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