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यक्ष प्रश्न

 

ब्राह्मण कौन है
यह प्रश्न आज
परिभाषा नहीं
पीड़ा बन गया है। 
 
वह जो क़ानून की किताब में
सिर्फ़ एक आरोप से
दोषी मान लिया जाता है
वह जो गाली में भी
जाति बनकर पुकारा जाता है
और चुप रह जाने को
उसकी सहमति समझ ली जाती है। 
 
वह जो मतदान करता है
पर बहुत से द्वारों पर
उम्मीद छोड़ आता है
जिसके लिए न कोई आयोग
न कोई योजना
सिर्फ़ धैर्य का उपदेश है। 
 
वह जो संविधान को
माथे से लगाकर जीता है
पर उसी संविधान की
कुछ पंक्तियों में
अपने लिए
स्थान नहीं पाता। 
 
वह जो दंड की व्यवस्था में
हर समय उपस्थित है
पर संरक्षण की छाया से
अक्सर बाहर। 
 
विद्यालय की फ़ीस में
चार गुना बोझ उठाता हुआ
अपने बच्चों को यह सिखाता है
कि ज्ञान ही
एकमात्र विरासत है। 
 
वह पिता
जिसका पुत्र
नब्बे से ऊपर अंक लाकर भी
सूची में पीछे छूट जाता है
और फिर भी
घर आकर कहता है
कोई बात नहीं
मेहनत बेकार नहीं जाती। 
 
वह समाज
जो सबसे अधिक देता है
और सबसे कम माँगता है
जो सत्ता को
कालीन बिछाकर सौंप देता है
और लौटते समय
ख़ुद को ठगा हुआ
पर मौन पाता है। 
 
वह जो देश के लिए
तन मन धन
तीनों अर्पित करता है
और फिर भी
देशद्रोही कहे जाने के डर से
अपने प्रश्न
अपने ही भीतर
दबा लेता है। 
 
इतिहास के पन्नों में
उसके नाम
रक्त से लिखे हैं
मंगल पांडे की पहली चिंगारी
चंद्रशेखर की अंतिम गोली
झांसी की रणभूमि में
लक्ष्मीबाई की हुंकार
बाजीराव की रणनीति
कारगिल की बर्फ़ में
मनोज पांडे का साहस
और सीमाओं पर
मोहित शर्मा की शहादत। 
 
इतना सब देने के बाद भी
आज वह
अपने ही देश में
स्पष्टीकरण देता फिरता है
कि वह
अपराधी नहीं
न्याय चाहता है। 
 
फिर भी
उसकी प्रार्थना बदली नहीं
आज भी उसके होंठों पर
वही शब्द हैं
धर्म की जय हो
अधर्म का नाश हो
प्राणियों में सद्भावना हो
विश्व का कल्याण हो। 
 
वह रोता नहीं
क्योंकि उसे
सहन करने की
लंबी परंपरा मिली है
पर उसकी चुप्पी
अगर ध्यान से सुनी जाए
तो वह
समाज को जगाने वाली
सबसे गहरी पुकार है। 
 
ब्राह्मण कौन है
वह जो त्याग करता है
सहता है
और फिर भी
विद्रोह नहीं
संवाद चाहता है। 
 
यह कविता
किसी के विरुद्ध नहीं
यह केवल
बराबरी की
एक करुण याचना है
कि न्याय
सचमुच
सबके लिए
समान हो।

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