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प्रेम में बढ़ना

 

प्यार में पड़ना
एक आकस्मिक घटना है
जैसे वसंत में अचानक
किसी वृक्ष पर फूल आ जाना
उसमें कोई तैयारी नहीं होती
कोई जागरूकता नहीं होती
बस रसायन होते हैं
हार्मोन होते हैं
और आँखों पर
एक मीठा अंधकार छा जाता है
 
इसीलिए कहा गया
प्रेम अंधा होता है
क्योंकि जीव विज्ञान
देखता नहीं
वह केवल प्रतिक्रिया करता है
 
पर प्रेम में बढ़ना
एक और ही यात्रा है
 
वह यात्रा
जहाँ आँखें नहीं
चेतना खुलती है
जहाँ आकर्षण नहीं
अंतर्दृष्टि जन्म लेती है
 
यह प्रेम
किसी पर गिरता नहीं
यह भीतर उगता है
मौन से
ध्यान से
जागरूक उपस्थिति से
 
यह प्रेम
चिल्लाता नहीं
दावा नहीं करता
मालिकाना भाव नहीं रचता
 
यह प्रेम
इतना कोमल होता है
कि उसकी उपस्थिति
हवा की तरह महसूस होती है
दिखती नहीं
पर जीवन देती है
 
यह प्रेम
बंधन नहीं बनाता
क्योंकि प्रेम
जिसे प्रेम करता है
उसे क़ैद कैसे कर सकता है
यह प्रेम
दरवाज़े खोलता है
खिड़कियाँ खोलता है
आकाश देता है
 
जैसे जैसे प्रेम गहरा होता है
वैसे वैसे स्वतंत्रता फैलती है
डर सिकुड़ने लगता है
असुरक्षा पिघलने लगती है
और नियंत्रण
अप्रासंगिक हो जाता है
 
इस प्रेम में
कोई यह नहीं कहता
तुम ऐसे क्यों हो
इस प्रेम में
कोई बदलने की चेष्टा नहीं करता
यह प्रेम
स्वीकार करता है
 
तुम जैसे हो
पूरे वैसे ही
तुम्हारी कमज़ोरियों सहित
तुम्हारी ख़ामोशियों सहित
तुम्हारे अँधेरों सहित
 
यह प्रेम
सुधार नहीं चाहता
यह केवल साक्षी बनता है
 
और जब कोई
बिना बदले जाने की शर्त के
स्वीकार किया जाता है
तो परिवर्तन
अपने आप घटित होता है
 
यह प्रेम
माँग नहीं करता
अपेक्षा नहीं करता
शर्तें नहीं रखता
यह प्रेम
बस उपस्थित रहता है
 
जैसे दीपक
कमरे को यह नहीं कहता
अँधेरा हट जाओ
वह बस जलता है
और अँधेरा
स्वयं विदा ले लेता है
प्रेम में बढ़ना
इसी जलने का नाम है
 
जहाँ दो व्यक्ति नहीं
दो चेतनाएँ मिलती हैं
जहाँ सम्बन्ध नहीं
सहअस्तित्व होता है
 
जहाँ प्रेम
किसी और को पाने की इच्छा नहीं
स्वयं को खो देने का साहस बन जाता है
 
और अंततः
वहाँ प्रेम भी नहीं बचता
प्रेमी भी नहीं बचता
 
बस प्रेम बचता है
न शोर करता हुआ
न दावा करता हुआ
 
बस
होता हुआ
शांत
स्वतंत्र
अनंत

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