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सुरमयी संध्या: स्मृतियों के झरोखे से शक्कर के दाने और गम्मत का उल्लास

 

जीवन की आपाधापी के मध्य जब आत्मीयता के स्वर गूँजते हैं तो समय जैसे ठहर-सा जाता है। मोहपानी की वादियों में स्थित कपिल साहू के छोटा जबलपुर की नैसर्गिक छटा के बीच बीती शाम कुछ ऐसी ही थी। अवसर था आशु भाई के अल्प प्रवास पर गृह नगर आगमन का। उनकी अभिन्न मित्र मंडली एवं शक्कर के दाने समूह द्वारा आयोजित यह स्नेहिल गम्मत और संगीत संध्या आत्मीयता के एक नए सोपान पर थी। 

कार्यक्रम का श्रीगणेश संध्या की सुरमई बेला में हाई-टी के साथ हुआ। प्रकृति की गोद में बसे इस रिसोर्ट में जैसे ही मित्रों का हुजूम उमड़ा वातावरण चिर-परिचित ठहाकों से जीवंत हो उठा। वर्षों पुराने साथ और सानिध्य की वह महक चाय की हर चुस्की के साथ गहराती जा रही थी। यह केवल एक मिलन नहीं था अपितु अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक आत्मीय उत्सव था। 

संध्या ज्यों-ज्यों परवान चढ़ी जबलपुर के ख्यात गायक श्री अमित दुबे के सुरों ने समां बाँध दिया। “छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके” की रूहानी प्रस्तुति ने जहाँ श्रोताओं को सूफ़ियाना रंग में सराबोर किया वहीं “नर्मदे हर” के जयघोष और “गुरु वंदना” ने पूरे परिवेश को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। 
​विशेष आकर्षण रहा “शिव जी का महारास नृत्य” और आशु भाई के व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोती वह रचना “वो आशुतोष कहलाया है”। इन प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। संगीत की इस सरिता में हर कोई गोते लगा रहा था। 

संगीत का संयोजन प्रिय मिनेंद्र भाई ने बड़ी ही कुशलता से किया जिनके मार्गदर्शन में सुरों की सरिता अविरल प्रवाहित हुई। नगरपालिका अध्यक्ष शिवाकांत मिश्रा, प्रिय कीर्तिराज लूनावत, एवं मिनेंद्र भाई का नृत्य ने जैसे सबको सम्मोहन में बाँध दिया हो। एनडीटीवी संवाददाता आशीष जैन ने आयोजन को अपने कैमरे में बड़ी कुशलता से कैप्चर किया। 

संगीत के बीच-बीच में जब आशु भाई ने अपनी चिर-परिचित शैली में संवाद प्रारंभ किया तो मानों ज्ञान की अविरल धारा बह निकली। उन्होंने अध्यात्म और प्रेम की गुत्थियों को इतने सरल ढंग से सुलझाया कि हर मन आलोकित हो उठा। गंभीर दार्शनिक बातों के साथ जब उन्होंने हास्य की फुहारें छोड़ीं तो पूरी मित्र मंडली ठहाकों से सराबोर हो गई। प्रियवर आशु भाई का सहज सानिध्य यही आभास करा रहा था कि ऊँचाइयों पर पहुँचने के बाद भी अपनी माटी के प्रति उनका अनुराग आज भी उतना ही अगाध है। 

इस आयोजन की एक और विशेषता थी यहाँ का विशुद्ध देशी खान-पान। चूल्हे पर सिकते टिक्कड़ दाल-बाटी और भर्ता की सौंधी महक के बीच मित्रों की गुफ़्तुगू देर रात तक चलती रही। टिक्कड़ दाल-बाटी और भर्ता की सौंधी महक ने भूख के साथ-साथ तृप्ति का भी अहसास कराया। आधुनिकता के शोर से दूर मिट्टी की ख़ुश्बू में बसे इस स्नेह भोज का स्वाद अद्भुत था।

कपिल के रिसोर्ट की मेहमाननवाज़ी ने इस शाम को और भी यादगार बना दिया। 

यह आयोजन मात्र एक ग़म्मत नहीं बल्कि शक्कर के दाने समूह के प्रेम की वह अभिव्यक्ति थी जिसने रिश्तों की मिठास को और प्रगाढ़ कर दिया। आशु भाई का सहज सानिध्य और मित्रों का निःस्वार्थ प्रेम इस शाम को इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अंकित कर गया। 

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