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माँ पीताम्बरा बगलामुखी वंदना

 

आज का दिन
साधना की पीली आभा में स्नात है,
जग के कोलाहल पर
एक मौन, तेजस्वी विराम उतर आया है
क्योंकि आज
आप अवतरित हुई थी,
हे माँ पीताम्बरा,
हे वाक् की अधीश्वरी,
हे बगलामुखी।
 
कहा जाता है
जब प्रलय की आँधी ने
सृष्टि के संतुलन को डिगा दिया था,
जब शब्दों ने विष बनकर
धर्म की जड़ों को हिलाना शुरू किया,
तब आप प्रकट हुईं
पीत वर्ण में लिपटी,
अचल संकल्प की तरह।
 
आपके एक हाथ में गदा,
दूसरे में शत्रु की जिह्वा थामी हुई
यह दृश्य भय का नहीं,
सत्य की रक्षा का उद्घोष है।
आप सिखाती हैं
कि जब वाणी अधर्म की ओर बढ़े,
तो उसे रोकना ही धर्म है।
 
हे माँ,
आपका पीताम्बर केवल वस्त्र नहीं,
वह चेतना का सूर्य है,
जो अज्ञान के कुहासे को
क्षण भर में भंग कर देता है।
आपकी साधना में
हल्दी की गंध घुलती है,
पीले पुष्पों का अर्पण होता है,
भोग में चने की दाल, बेसन,
और सादगी से भरा समर्पण
क्योंकि आप वैभव नहीं,
नियंत्रण और संयम की अधिष्ठात्री है।
 
मैं आपके चरणों में
अपनी वाणी अर्पित करता हूँ,
हे माँ
क्योंकि आज सबसे बड़ा युद्ध
शब्दों का ही है।
झूठ का विस्तार
सत्य से अधिक तीव्र हो गया है,
वाणी में कटुता
संबंधों को निगल रही है,
और मनुष्य
अपनी ही बोली हुई बातों का
बंधक बनता जा रहा है।
ऐसे समय में
आपका अवतरण केवल कथा नहीं,
एक चेतावनी है
कि शब्दों को साधो,
वाणी को पवित्र करो,
अन्यथा वही शब्द
विनाश का कारण बनेंगे।
 
हे बगलामुखी,
मेरी जिह्वा को संयम दो,
मेरे शब्दों को सत्य का आधार दो,
मेरे विचारों को स्थिरता दो।
मेरे भीतर के शत्रु
अहंकार, क्रोध, असत्य
उनकी जिह्वा भी आप थाम लें,
ताकि वे मेरे जीवन को
विकृत न कर सकें।
आपकी कृपा से
वाणी में मधुरता हो,
विचारों में स्पष्टता हो,
और कर्मों में दृढ़ता।
 
हे पीताम्बरा माँ,
आज आपके अवतरण दिवस पर
बस यही प्रार्थना है
मुझे ऐसा मौन दें
जिसमें सत्य बोलता हो,
मुझे ऐसी वाणी दें
जो किसी को आहत न करे,
और मुझे ऐसा साहस दें
कि अधर्म के सामने
मैं अडिग रह सकूँ।
आप ही वह शक्ति है
जो शब्द को शस्त्र बनाती है
और शस्त्र को शांति में बदल देती है।
 
हे माँ बगलामुखी,
आपके चरणों में
मेरा नमन,
मेरा समर्पण,
और मेरी सम्पूर्ण वाणी।

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