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नारी, सृष्टि की अजस्र धारा


(विश्व नारी दिवस पर)
 
जब सृष्टि की प्रथम भोर
अभी पूर्णत: खुली भी नहीं थी
जब पृथ्वी की निस्तब्ध मिट्टी में
जीवन की हल्की हलचल भर उठी थी
तभी प्रकृति ने
अपने हृदय का सबसे कोमल अंश
नारी के रूप में रचा।
 
वह केवल एक शरीर नहीं थी
वह संवेदना का स्रोत थी
वह करुणा की वह झरती धारा थी
जिससे मानवता की पहली प्यास बुझी।
 
नारी
धरती की तरह धैर्यवान
नदी की तरह प्रवहमान
आकाश की तरह विस्तारमयी
और अग्नि की तरह उज्ज्वल है।
 
वह जन्म देती है
पर केवल शरीर को नहीं
वह संस्कारों को जन्म देती है
वह भाषा को जन्म देती है
वह उस स्पर्श को जन्म देती है
जिससे मनुष्य
मनुष्य बनता है।
 
जब शिशु पहली बार रोता है
तो संसार की सारी दार्शनिकता
उस एक आँचल में सिमट जाती है
जिसे हम माँ कहते हैं।
 
पर नारी केवल माँ नहीं
वह जीवन की सहयात्री भी है
वह वह विश्वास है
जिस पर पुरुष अपने संघर्षों की नाव टिकाता है।
 
युगों के इतिहास में
उसने अनेक रूप धारण किए हैं
कभी वह सीता बनकर
त्याग की शांत ज्योति बनी
कभी वह दुर्गा बनकर
अन्याय के विरुद्ध वज्र सी खड़ी हुई
कभी मीरा बनकर
प्रेम को भक्ति की अग्नि में बदल दिया
और कभी गार्गी बनकर
विचारों के आकाश में प्रश्नों के दीप जलाए।
 
पर इतिहास के इन उजले पन्नों के बीच
कई बार उसकी पीड़ा भी लिखी गई
उसके सपनों पर पहरे भी लगे
उसकी उड़ान को सीमाओं में बाँधने की कोशिशें भी हुईं
फिर भी नारी की आत्मा
कभी पराजित नहीं हुई।
 
उसने चुपचाप
अपने आँचल में भविष्य को पालते हुए
समय की कठिन घाटियाँ पार कीं।
 
आज का समय
नारी को नए आयामों में देख रहा है।
 
वह घर की चौखट से निकलकर
ज्ञान की प्रयोगशालाओं तक पहुँची है
वह खेतों की मिट्टी में भी है
और अंतरिक्ष की ऊँचाइयों में भी।
 
वह विद्यालयों में ज्ञान की दीपिका है
वह अस्पतालों में करुणा का स्पर्श है
वह न्यायालयों में न्याय की आवाज है
वह विज्ञान के सूत्रों में
मानव बुद्धि की नई दिशा है।
 
पर इन सबके बीच
उसका मूल स्वभाव नहीं बदला
वह आज भी
संबंधों की सबसे गहरी धुरी है।
 
वह टूटते घरों को जोड़ती है
वह थके हुए मन को सहलाती है
वह संघर्षों के बीच
आशा का एक दीप जलाए रखती है।
 
आज की नारी
केवल अधिकारों की बात नहीं करती
वह उत्तरदायित्वों का भी साहस रखती है।
 
वह जानती है
स्वतंत्रता का अर्थ केवल सीमा तोड़ना नहीं
बल्कि अपने भीतर के सामर्थ्य को पहचानना है।
 
वह जानती है
समानता का अर्थ
किसी से आगे निकल जाना नहीं
बल्कि साथ-साथ चलने की गरिमा है।
 
इसलिए आज की नारी
अपनी चेतना में संतुलन की वह ज्योति लिए है
जो समाज को
नए संस्कार दे सकती है।
 
वह माँ है
तो भविष्य की पहली शिक्षक भी है
वह बहन है
तो संबंधों की मधुरता भी है
वह पत्नी है
तो जीवन यात्रा की सहधर्मिणी भी है
और जब वह स्वयं अपने स्वप्नों के पथ पर चलती है
तो वह सम्पूर्ण मानवता की प्रेरणा बन जाती है।
 
नारी
केवल उत्सव का विषय नहीं
वह अस्तित्व का आधार है।
 
यदि पृथ्वी पर
करुणा जीवित है
यदि मनुष्य अभी भी
प्रेम की भाषा समझता है
तो उसमें नारी की आत्मा का अंश है।
 
इसलिए
विश्व नारी दिवस
केवल एक तिथि नहीं
यह उस शक्ति का स्मरण है
जो सृष्टि के प्रारंभ से
मानवता को दिशा देती आई है।
 
नारी
जब मुस्कराती है
तो संसार में विश्वास लौट आता है
और जब वह संकल्प करती है
तो इतिहास की दिशा बदल जाती है।
 
वह शक्ति भी है
वह शांति भी है
वह संघर्ष भी है
वह सृजन भी है।
 
और शायद इसी कारण
प्रकृति ने
अपने सबसे गहरे रहस्य
नारी के हृदय में छिपा दिए हैं
ताकि दुनिया
हर युग में
उसके प्रेम से
नया जन्म ले सके।

सुशील शर्मा

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