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मर्यादा का प्रेम

 

वेलेंटाइन दिवस था। नगर के कैफ़े, उद्यान और मार्ग गुलाबों से भर गए थे। युवा हाथों में उपहार लिए घूम रहे थे। उसी भीड़ के बीच अरुण और निधि पुस्तकालय की सीढ़ियों पर शांत बैठे थे। 

दोनों वर्षों से एक दूसरे को जानते थे। सहपाठी रहे, फिर जीवन की अलग राहों पर चल पड़े। उनके बीच स्नेह था, पर वह कभी प्रदर्शन में नहीं उतरा। 

निधि ने धीरे से कहा, “आज सब प्रेम का उत्सव मना रहे हैं। कभी तुम्हें नहीं लगा कि हम भी . . .?” 

अरुण मुस्कराया। “हम भी क्या? वही जो सब कर रहे हैं? यदि प्रेम केवल साथ घूमने, उपहार देने और तस्वीरों तक सीमित हो, तो वह ऋतु के साथ बदल जाएगा। पर यदि वह जीवन की ज़िम्मेदारियों को निभाने का संकल्प बन जाए, तब वह स्थायी होगा।” 

निधि चुप रही। उसके घर की परिस्थितियाँ कठिन थीं। पिता अस्वस्थ, छोटे भाई की पढ़ाई अधूरी। उसने कई बार सोचा था कि अपने सपनों को छोड़ दे। 

अरुण ने उसकी ओर देखकर कहा, “तुम्हारा चिकित्सक बनने का स्वप्न केवल तुम्हारा नहीं, तुम्हारे परिवार की आशा है। यदि मैं सच में तुम्हें चाहता हूँ, तो मेरा पहला कर्त्तव्य है कि तुम्हें आगे बढ़ते देखूँ, न कि तुम्हें अपने साथ बाँध लूँ।” 

निधि की आँखें नम हो गईं। 

“और तुम्हारे सपने?” 

“मेरे सपने भी समाज से जुड़े हैं। गाँव के विद्यालय में पढ़ाने का निर्णय मैंने इसलिए लिया है कि वहाँ बच्चों को अवसर मिले। यदि हमारा स्नेह सच्चा है, तो वह हमें अपने दायित्वों से विमुख नहीं करेगा।” 

कुछ क्षण दोनों मौन रहे। बाहर से हँसी और संगीत की ध्वनि आ रही थी। भीतर एक गहरा निर्णय जन्म ले रहा था। 

निधि ने कहा, “तो आज हम वचन लें कि हमारा प्रेम किसी की मर्यादा नहीं तोड़ेगा। हम परिवार की प्रतिष्ठा, अपने कर्म और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को सर्वोपरि रखेंगे। यदि भविष्य में हमारे मार्ग एक हो सके, तो वह सम्मानपूर्वक होगा; यदि न भी हो, तो भी यह स्नेह हमें बेहतर मनुष्य बनाएगा।” 

अरुण ने सिर झुका दिया। 

“प्रेम अधिकार नहीं, प्रेरणा है। यदि हम एक दूसरे के जीवन को ऊँचा उठा सकें, वही हमारा उत्सव है।” 

उस दिन उन्होंने कोई गुलाब नहीं ख़रीदा। उन्होंने एक दूसरे को एक पुस्तक भेंट की। भीतर लिखा था “तुम्हारे स्वप्नों की रक्षा करना ही मेरा प्रेम है।” 

वर्षों बाद निधि सचमुच चिकित्सक बनी और अरुण आदर्श शिक्षक। उनके मार्ग अंततः एक हुए या नहीं, यह कथा नहीं बताती। पर इतना अवश्य हुआ कि उनका प्रेम किसी आकर्षण का क्षणिक ज्वार नहीं रहा; वह कर्त्तव्य, सम्मान और मर्यादा का दीप बनकर दोनों के जीवन में स्थिर रहा। 

वेलेंटाइन का वह दिवस सिखा गया कि सच्चा प्रेम स्पर्श से अधिक संकल्प में बसता है, और जो प्रेम सबकी गरिमा बचाए, वही जीवन को सार्थक करता है। 

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