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साक्षी भाव


(प्रिय शिष्य अजीत के प्रश्नों के उत्तर) 
  
तुम्हारे प्रश्न
प्रश्न नहीं
भीतर जलते दीप हैं
जो अँधेरे से नहीं
अज्ञान से लड़ रहे हैं
 
भीड़ में खड़े होकर
अकेले सोचना
और अकेले में
समूचे जीवन की धड़कन सुनना
यह वही करता है
जिसकी यात्रा आरंभ हो चुकी हो
 
समाज और अध्यात्म
दो शत्रु नहीं
एक बाहर की धूप है
एक भीतर की लौ
संघर्ष तब है
जब मुखौटा बाहर कुछ और
अंतरात्मा भीतर कुछ और हो
 
तुम अधूरे नहीं
तुम ईमानदार हो
और ईमानदारी
सबसे कठिन साधना है
 
जो रस्म बोझ बने
उसे छोड़ देना पलायन नहीं
और जो सम्बन्ध करुणा जगाए
वही समाज का धर्म है
 
तुम पुल पर खड़े हो
जहाँ पुराने विश्वास
अपने आप गिर रहे हैं
और नए अभी
शब्दों में नहीं ढले
यह पीड़ा नहीं
जागरण की प्रसव वेदना है
 
ध्यान
सीधे भीतर उतरना है
कर्मकांड
थोड़ी देर थामने का सहारा
 
पर जो सहारे को ही मंज़िल समझ ले
वह थक कर बैठ जाता है
और जो सहारे से आगे बढ़ जाए
वही पहुँचता है
 
जप
यदि होंठों पर अटका है
तो व्यर्थ
पर यदि जप करते करते
जप ही गिर जाए
तो वही मौन ध्यान है
 
मीरा ने गाया
और एक क्षण ऐसा आया
जब मीरा नहीं रही
केवल प्रेम बचा
 
बुद्ध बैठे
और एक क्षण ऐसा आया
जब बुद्ध नहीं रहे
केवल जागरूकता बची
 
रास्ते अलग थे
पर शून्य एक था
 
नाम
नाव है
जल नहीं
नाव पकड़ने के लिए है
पर पार जाने के लिए
नाव भी छोड़नी होती है
 
मृत्यु
शरीर की है
नाम की है
पहचान की है
 
साक्षी की नहीं
 
जिस दिन तुम देखोगे
कि विचार आते जाते हैं
और देखने वाला ठहरा रहता है
उसी दिन
मृत्यु का भय
अपने आप गिर जाएगा
 
पूर्णता
सब कुछ जान लेने में नहीं
संघर्ष के गिर जाने में है
 
प्रश्न
दरवाज़े तक लाते हैं
भीतर
प्रश्न नहीं जाते
 
ज्ञान को थोड़ा विश्राम दो
अनुभव को बोलने दो
 
प्रतिदिन
कुछ पल
न पाने के लिए
न छोड़ने के लिए
बस
होने के लिए बैठो
 
न सही ध्यान की चिंता
न परिणाम की लालसा
 
पूर्णता
किसी दिन नहीं आती
वह बोझ गिरने पर
स्वयं प्रकट होती है
 
तुम ठीक हो
तुम्हारी बेचैनी
रोग नहीं
संकेत है
 
यात्रा जारी रखो
धीरे
सच के साथ
 
पूर्णता
कहीं बाहर नहीं
वह तब प्रकट होगी
जब प्रश्न
शांत हो जाएँगे
 
स्नेह सहित
आशीर्वाद

 

सुशील शर्मा

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