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नववर्ष की दस्तक

 

नया साल
शहर की चमक से पहले
मिट्टी के आँगन में उतरता है
जहाँ सुबह
अब भी
हाथों से बुनी जाती है। 
 
वह उन रास्तों पर जाता है
जहाँ जूतों से पहले
पाँव पहचान रखते हैं
जहाँ धूल
अपनापन ओढ़े रहती है
और हर मोड़
किसी पुराने नाम से
पुकारता है। 
 
नया साल
काग़ज़ों की योजनाओं में नहीं
अनाज की बालियों में
चुपचाप पकता है
हँसियों में नहीं
परिश्रम की साँसों में
अपना घर बनाता है। 
 
वह
लकड़ी की आहट में
भोर को जगाता है
चूल्हे की आँच में
दिन का अर्थ रचता है
और बच्चों की आँखों में
बिना बताए
आकाश रख देता है। 
 
नया साल
उन हाथों को भी
स्पर्श करता है
जो गिनती से बाहर हैं
और उन मनों को भी
जो हर गिनती में
पीछे छूट जाते हैं। 
 
वह
एकाकी रातों में
आस बनकर बैठता है
और थके संवादों में
फिर से
सुनने की शक्ति देता है। 
 
नया साल
उन स्मृतियों को भी
सँभालता है
जिन्हें हमने
अनावश्यक समझकर
किनारे रख दिया था
और उन भूलों को भी
जिनसे
हम आज के
थोड़े अधिक
मानव बने। 
 
वह
शोर नहीं करता
न वादे थोपता है
बस
धीरे से कहता है
यदि चाहो
तो इस बार
कुछ बेहतर
हो सकता है। 
 
आओ
इस नए साल को
सिर्फ़ तारीख़ न बनाएँ
इसे
अपने व्यवहार में
उतारें
अपने शब्दों में
नरमी दें
और अपने समय में
थोड़ा सा
सौहार्द जोड़ें। 
 
नया साल
तभी नया होता है
जब हम
एक दूसरे के लिए
कुछ अधिक
उपस्थित
हो पाते हैं। 
 
इसी उम्मीद के साथ
हर साधारण दिन को
विशेष बनाने की
शुभकामना
नववर्ष की
हार्दिक कामना।

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