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सुख का अर्थ

 

जब भीतर का मन
दिन प्रतिदिन के संघर्षों से
थक कर बैठ जाता है
तो बाहर फैला हुआ
सुख का समुद्र भी
सूखा दिखाई देता है। 
 
पानी के बिना
सूखती हुई फ़सल की तरह
जब जीवन
तिनका तिनका होकर
बिखरने लगे
तब आने वाली वर्षा
के आश्वासन भी
मन को नहीं भिगो पाते। 
  
सम्बन्ध यदि
दुख की छाया में
कंधा न दें
तो उत्सवों की रोशनी
भी आँखों को
चुभने लगती है
क्योंकि साथ के बिना
सुख केवल शोर होता है। 
 
कटु वचनों से
जब मन आहत हो
और भीतर तक
दरारें पड़ जाएँ
तब बाद में कहे गए
मधुर शब्द
मरहम नहीं बनते
वे केवल
पुराने घाव
फिर से खोल देते हैं। 
 
सुविधाओं से भरा घर
यदि रोगों का बसेरा हो
तो आराम की वस्तुएँ भी
बोझ बन जाती हैं
क्योंकि स्वस्थ मन और देह के बिना
सुख साधन नहीं
केवल भ्रम रह जाता है। 
 
सच यही है
सुख का अर्थ
बाहर नहीं
भीतर जन्म लेता है
जहाँ मन शांत हो
वहाँ थोड़ी सी रोटी भी
पर्व बन जाती है
और जहाँ मन टूट चुका हो
वहाँ
सारी दुनिया
व्यर्थ प्रतीत होती है। 

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