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जो निभाता है वो चुप रहता है

 

बादल
कभी यह नहीं कहते
कि वे प्यास बुझाएँगे
पर घिरते ही
सूखी मिट्टी की देह पर
जीवन का जल बरसा देते हैं।
 
पेड़
कभी घोषणा नहीं करते
कि वे फल देंगे
कि वे छाया देंगे।
वे चुपचाप
धूप में तपते हैं
आँधियों में झुकते हैं
और समय आने पर
अपनी डालियों पर
मधुरता टाँक देते हैं।
 
धरती भी
कभी यह वचन नहीं देती
कि वह अन्न उगाएगी
पर हर ऋतु में
वह किसान के सपनों को
धान और गेहूँ की बालियों में बदल देती है।
 
सूर्य
हर सुबह
आकाश के द्वार पर
धीरे से आ खड़ा होता है।
 
उसने कभी नहीं कहा
कि मैं अँधेरे से लड़ूँगा
कि मैं उजाला भर दूँगा
फिर भी
उसकी पहली किरण
धरती के माथे पर
विश्वास का स्वर्ण तिलक रख देती है।
 
नदियाँ
कभी नहीं कहतीं
कि वे सागर तक जाएँगी।
वे बस बहती रहती हैं
पर्वतों से उतरती
पथरीले रास्तों से गुजरती
और अंततः
सागर की बाहों में समा जाती हैं।
 
चाँद
कभी यह नहीं कहता
कि वह रात को सुंदर बना देगा
पर उसकी शीतल आभा
अँधेरे के मन में
शांति का दीप जला देती है।
 
माँ भी
कभी वादा नहीं करती
कि वह हर पीड़ा में साथ होगी
पर जब भी जीवन काँपता है
सबसे पहले वही
अपना आँचल फैलाती है।
 
मित्र
कभी प्रतिज्ञा नहीं करता
कि वह दुख में खड़ा रहेगा
पर कठिन समय आते ही
उसका कंधा
सबसे पास मिल जाता है।
 
तभी समझ में आता है
कि जीवन का सच्चा भरोसा
शब्दों में नहीं बसता।
 
जहाँ आस्था जन्म लेती है
वहाँ वचन की आवश्यकता नहीं होती
क्योंकि सच्चा संबंध
घोषणाओं से नहीं
निरंतर निभाए गए
मौन कर्मों से बनता है।
 
और जो बार बार
वादा करता है
वह शायद अभी
विश्वास के सरल
परंतु गहरे व्याकरण को
समझ ही रहा होता है।

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