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बाज़ार के शोर में

 

हमने सच के मरुस्थलों में
ढूँढ़ी हैं
शीतल छायाएँ। 
 
झूठ तर्क के
घने कुहासे
खोई हुई दिशा दिखती है। 
बाज़ारों की
भीड़-भाड़ में
सस्ती सी निष्ठा बिकती है। 
 
हमने देखीं सिद्धांतों की
उलझी 
झूठी परिभाषाएँ। 
 
क्लिक-क्लिक से
भरी दौड़ में
थमने लगा हृदय का स्पंदन। 
लिखे पोस्ट पर
‘लाइक’ गिनते
मुरझाया है पर अंतर्मन। 
 
किसने कहाँ-कहाँ बोई हैं
नफ़रत की
कड़वी शाखाएँ। 

पक्ष-विपक्ष के
हुल्लड़ में अब
मौन कहीं घायल रहता है। 
स्वार्थ खड़ा है
ऊँचे क़द में
न्याय खड़ा पीड़ा सहता है। 
 
आने वाली पीढ़ी को अब
सच का
आईना दिखलाएँ। 
 
सिसक रही है
मर्यादा अब
निंदा के हिंसक जंगल में। 
निजता की
बलि चढ़ी हुई है
डाटा के गहरे दलदल में। 
 
बचे हुए जो भाव शेष हैं
आओ अब हम
उन्हें बचाएँ। 

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