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मशीन बना दिया गया शिक्षक 

 

कुछ अकर्मण्य हाथों की धूल
पूरे आकाश पर उछाल दी गई, 
और फिर
हर शिक्षक की आँखों में
संदेह का पहरा बैठा दिया गया। 
 
विश्वास की जगह
उपस्थिति का अंक भर दिया गया। 
चेहरे की पहचान से अधिक
अब महत्त्व रखती हैं
यंत्र पर दर्ज हुई एक सूचना। 
 
कक्षा में
बच्चों की आँखों से संवाद कम हैं, 
फ़ाइलों से संवाद अधिक। 
शब्दों की खेती करने वाला शिक्षक
अब आँकड़ों की फ़सल काट रहा हैं। 
 
जिसने
पीढ़ियों को समय का मूल्य सिखाया, 
उसी के समय को
मिनटों और सेकंडों में बाँध दिया गया। 
जिसने
स्वतंत्र सोच के दीप जलाए, 
उसे निर्देशों की दीवारों में
क़ैद कर दिया गया। 
 
बीस वर्षों की सेवा, 
धूप, धूल, वर्षा, 
दूरस्थ गाँवों की पगडंडियाँ, 
अनगिनत बच्चों के भविष्य में बोए गए बीज, 
एक आदेश की स्याही से
शून्य कर दिए गए। 
 
पुरानी पेंशन के साथ
केवल एक योजना नहीं गई, 
बुढ़ापे की वह निश्चिंत साँस भी चली गई, 
जो जीवन भर
दूसरों के सपनों को सँवारने वालों के हिस्से आती थी। 
 
शिक्षण से इतर
कभी सर्वेक्षण, 
कभी गणना, 
कभी चुनाव, 
कभी अभियान, 
कभी ऐसा दायित्व
जिसका शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं। 
और फिर भी पूछा जाता हैं
परिणाम क्यों घट रहे हैंं? 
 
शिक्षक
अब पाठ कम पढ़ाता है, 
प्रमाण अधिक देता है। 
काम कम नहीं करता, 
काम का प्रमाण अधिक जुटाता हैं। 
 
कितना विचित्र समय हैं, 
जहाँ
विश्वास का स्थान
सत्यापन ने ले लिया हैं, 
और समर्पण का स्थान
संदेह ने। 
 
किन्तु
इतनी कठोरताओं के बाद भी
हर सुबह
वह विद्यालय पहुँचता है। 
चॉक उठाता है, 
मुस्कुराने का अभिनय नहीं, 
मुस्कुराने का साहस करता है। 
 
क्योंकि
वह जानता हैं
यदि उसके भीतर का शिक्षक मर गया, 
तो केवल एक कर्मचारी नहीं मरेगा, 
एक पीढ़ी का भविष्य अनाथ हो जाएगा। 
 
इसलिए
आवश्यक है
कि दोषी को दंड मिले, 
पर निर्दोष का सम्मान भी बचे। 
व्यवस्था अनुशासन बनाए, 
पर विश्वास का दीप न बुझाए। 
 
शिक्षक
मशीन नहीं होता। 
मशीन आदेशों से चलती है, 
शिक्षक संवेदनाओं से। 
मशीन आँकड़े बनाती है, 
शिक्षक इतिहास। 
 
और जिस दिन
समाज यह अंतर भूल जाएगा, 
उस दिन
विद्यालयों में इमारतें तो होंगी, 
किन्तु शिक्षा नहीं। 

सुशील शर्मा

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