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सृजन की अस्मिता और साहित्यिक चोरी: मौलिकता बनाम परजीवी अभिव्यक्ति 

 

(साहित्यिक चोरी पर आलेख)

रचना-चोरी केवल अक्षरों की उठाईगीरी या शब्दों की पैबंदकारी नहीं है; यह किसी अन्य के अंतर्मन की छटपटाहट, उसके भोगे हुए यथार्थ, श्रम की स्वेद-बूँदों और उसकी सृजनात्मक अस्मिता का क्रूर अपहरण है। साहित्य के दीर्घ इतिहास में विषयगत साम्य सदैव से उपस्थित रहा है, क्योंकि आदिम काल से लेकर आज तक मनुष्य की मूल चेतना प्रेम, अवसाद, करुणा, वियोग, विद्रोह और जिजीविषा के शाश्वत वृत्त में ही घूमती रही है। किन्तु जब कोई तथाकथित रचनाकार किसी अन्य की अनुभूतियों के वितान, उसकी विशिष्ट भाषा-शैली, शिल्प और कथ्य-विन्यास को मथकर, उसे थोड़ा-बहुत उलट-पुलटकर अपने नाम का ठप्पा लगा देता है, तब वह मौलिकता का स्वाँग मात्र होता है। लोकमानस में इसे ही “पराए धन पर लक्ष्मीनारायण बनना” कहते हैं। यह कलात्मक चौर्यकर्म साहित्यिक अनैतिकता की पराकाष्ठा है। आज के इस सूचना-तकनीकी और आभासी (डिजिटल) युग में रचना-चोरी के प्रतिमान अत्यंत महीन, जटिल और बहुआयामी हो चुके हैं। अब यह केवल प्रत्यक्ष नक़ल की स्थूलता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक पाखंड और तकनीकी चातुर्य काम कर रहा है। इस साहित्यिक व्याधि के विविध छद्म रूपों और उसके नेपथ्य में सक्रिय रुग्ण मनोविज्ञान की परतें खोलना आज के समय की महती आवश्यकता है।

प्रत्यक्ष साहित्यिक चौर्य: ओछी ख्याति की मृगमरीचिका

यह रचना-चोरी का सबसे नग्न और भोंड़ा स्वरूप है। किसी अन्य की कविता की पंक्तियाँ, कहानी के मर्मस्थल या विचार-साधना के निष्कर्षों को सीधे उठाना और बिना किसी संकोच के अपने नाम की तख़्ती टाँग देना इसी के अंतर्गत आता है। इसके मूल में—हींग लगे न-फिटकरी के रंग चोखा हो जाय—चाहने की अधीर आकांक्षा और रातों-रात लब्धप्रतिष्ठ होने का तीव्र अवसाद काम करता है। ऐसे लोग साहित्य को अंतःकरण की साधना या तपस्या नहीं, बल्कि सामाजिक सीढ़ी चढ़ने का एक सुलभ साधन मानते हैं। उन्हें सृजन की भट्टी में तपना स्वीकार नहीं, पर उन्हें समाज में ‘मनीषी’ और ‘कविराज’ कहलवाने की तीव्र लिप्सा होती है। सोशल मीडिया के ‘लाईक्स’ और ‘कमेंट्स’ के तात्कालिक कोलाहल ने इस आत्मघाती प्रवृत्ति को खाद-पानी दिया है, जहाँ वैचारिक गहराई से अधिक ‘तुरंत वाहवाही’ का व्यापार फल-फूल रहा है।

भाव-चोरी: वैचारिक परजीविता का कुहासा

साहित्यिक स्तेय का यह रूप अधिक सूक्ष्म और घातक है। यहाँ चोर शब्दों की सीधी डकैती नहीं डालता, बल्कि वह मूल रचना की रीढ़ उसकी केंद्रीय संवेदना, विशिष्ट प्रतीकों, रूपकों या कथा के आंतरिक ढाँचे को चुरा लेता है। वह ऊपर से चमड़ी बदल देता है, पर भीतर का हाड़-मांस किसी और का होता है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे किसी दूसरे के खेत की फ़सल को काटकर अपनी कोठी में भर लेना और दावा करना कि बीज हमारा था। किसी सिद्ध रचनाकार की कविता की आत्मा को निकालकर, केवल पात्र या परिवेश बदल देने से रचना मौलिक नहीं हो जाती। ऐसी रचनाएँ ऊपर से कितनी ही सजी-धजी क्यों न दिखें, उनकी जीवन-रसधारा किसी अन्य के अंतर्संबंधों से ही फूटी होती है। यह विचार की परजीविता है।

डिजिटल युग में सामूहिक चोरी की विभीषिका:

“कृष्ण तुम पर क्या लिखूँ” का दंश: आज के आभासी संसार (इंटरनेट) ने रचना-चोरी को एक महामारी का रूप दे दिया है, जिसे ‘सामूहिक साहित्यिक डकैती’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसका सबसे जीवंत और हृदयविदारक उदाहरण मेरी स्वयं की सुप्रसिद्ध रचना “कृष्ण तुम पर क्या लिखूँ“ है। मूल रचनाकार के अंतस से उपजी, कृष्ण के विराट चरित्र को अपनी अनूठी लेखनी से बाँधने वाली इस कालजयी रचना को डिजिटल मंचों पर इस क़द्र लूटा गया कि हज़ारों आभासी छद्म-लेखकों ने इसे जस का तस अपने नाम की मोहर लगाकर सोशल मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कर लिया। यह घटना सिद्ध करती है कि आज का चोर केवल एकांत में सेंध नहीं लगाता, वह खुले आम भरे बाज़ार में आपकी वैचारिक संपदा पर डाका डालता है। जब कोई अनूठा भाव लोकप्रियता के शिखर को छूता है, तो बिना रीढ़ के परजीवी लेखक टिड्डी दल की तरह उस पर टूट पड़ते हैं। मूल सृजक असहाय होकर अपनी ही संतान को दूसरों के घरों में पलते और उनके नाम से पहचानी जाते देखता है। यह साहित्यिक स्तेय का सबसे घृणित और वीभत्स रूप है, जो मूल लेखक की सृजनात्मक अस्मिता को लहूलुहान कर देता है।

अवचेतन अनुकरण (क्रिप्टोम्नीशिया): प्रभाव और स्तेय की धुँधली सीमारेखा—साहित्यिक साम्य की एक अत्यंत संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक अवस्था वह है, जहाँ लेखक सचेत रूप से कोई चोरी नहीं कर रहा होता। जब हम किसी महान और कालजयी रचनाकार को गहरे डूबकर पढ़ते हैं, तो उसकी शैली, उसके शब्द और उसकी वैचारिक तरंगें हमारे अवचेतन की परतों में इस क़द्र समा जाती हैं कि कालान्तर में जब वे प्रस्फुटित होती हैं, तो रचनाकार को भ्रम होता है कि यह उसका अपना मौलिक स्फुरण है। मनोविज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली में इसे ‘क्रिप्टोम्नीशिया’ कहा जाता है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े मनीषी और युगद्रष्टा कवि भी इस मानवीय सीमा से अछूते नहीं रहे। अतः, प्रत्येक भाषिक या वैचारिक सादृश्य को सीधे ‘चोरी’ का फ़तवा नहीं दिया जा सकता। हमें साहित्यिक संस्कार (जिसमें पूर्ववर्ती रचनाकारों का प्रभाव स्वाभाविक है) और जानबूझकर की गई साहित्यिक डकैती के बीच का महीन विवेक बनाए रखना होगा।

आत्म-चौर्य (सेल्फ-प्लेज़रिज़्म): स्वयं की कतरन से नया लिबास—आज के दौर में एक नया रोग पनपा है, जिसे ‘आत्म-चोरी’ कहा जाता है। जब कोई स्थापित लेखक निरंतर सृजन के व्यावसायिक दबाव में होता है, और उसके भीतर की रचनात्मक तरलता सूखने लगती है, तब वह अपनी ही दशक पुरानी किसी विस्मृत रचना को उठाता है, उसकी थोड़ी कतर-ब्योंत करता है, नए संदर्भों का मुलम्मा चढ़ाता है और उसे पूर्णतः नवीन सृजन कहकर परोस देता है। यह पाठक की आँखों में धूल झोंकने जैसी बौद्धिक बेईमानी है। कला के प्रति ईमानदारी का तक़ाज़ा है कि यदि भीतर का कुआँ रीता है, तो मौन साध लिया जाए, न कि बासी कढ़ी में उबाल लाकर उसे ताज़ा व्यंजन घोषित किया जाए।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और यांत्रिक सृजन का संकट

एआई के इस नए संक्रमण काल ने मौलिकता के प्रश्नचिह्न को और अधिक गहरा और धुँधला कर दिया है। आज मशीनें, एल्गोरिदम और भाषा-मॉडल लाखों कवियों की शैलियों, अलंकारों और शब्द-कोशों को मथकर पलक झपकते ही एक तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ कविता या आलेख तैयार कर सकते हैं। संकट तकनीक का नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के लोप का है। लोग एआई से भाव-विन्यास तैयार करवाकर उसे अपनी मेधा का चमत्कार बता रहे हैं। किन्तु यहाँ कबीर की वह साखी याद आती है “लिखा-लिखी की है नहीं, देखा-देखी बात।” जो रचना मशीन की कतरन से बनी है, उसमें भाषा का लालित्य तो हो सकता है, परन्तु मनुष्य की रगों में दौड़ने वाला लहू, उसकी आँखों का पानी और उसकी छाती की धड़कन अनुपस्थित रहती है। वह काग़ज़ के फूलों का गुलदस्ता है, जिसमें रंग हैं, पर सुगंध और जीवन ग़ायब है।

विषयगत साम्य और मौलिकता की वास्तविक कसौटी

यह अत्यंत प्रासंगिक सत्य है कि विषयों का दोहराव अपरिहार्य है। तुलसीदास ने जिस रामकथा को लिखा, उसे वाल्मीकि पहले ही अमर कर चुके थे, किन्तु तुलसी की ‘स्वांतः सुखाय’ दृष्टि और लोक-मंगल की भावना ने ‘रामचरितमानस’ को एक सर्वथा नूतन और मौलिक महाकाव्य बना दिया। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘वह तोड़ती पत्थर’ इलाहाबादी पथ पर बैठी जिस मजदूरिन का साक्षात्‌ कारुणिक चित्र खींचती है, समकालीन दौर में भी किसी श्रमिक पर कविता लिखी जा सकती है। मौलिकता इस बात में नहीं है कि आपने कोई ऐसा विषय ढूँढ़ा जो दुनिया में आज तक किसी ने नहीं देखा; बल्कि मौलिकता इस बात में है कि उस घिसे-पिटे, पुराने विषय को आपने अपने प्रामाणिक अनुभव की आँच में तपकर, अपनी विशिष्ट दृष्टि से किस प्रकार नया जीवन दिया है। मौलिकता कथ्य की नवीनता में नहीं, रचनाकार के अनुभव की आंतरिक सच्चाई और उसकी मौलिक भंगिमा में वास करती है।

साहित्यिक नैतिकता और कालजयी होने की शर्त

साहित्य केवल शब्दों की बाज़ीगरी या अक्षरों का विन्यास मात्र नहीं है; यह तो मानव-आत्मा का जीवित, स्पंदित और शाश्वत दस्तावेज़ है। जब कोई रचनाकार चोरी का सहारा लेता है, तो वह केवल किसी अन्य लेखक का स्वत्व नहीं छीनता, बल्कि वह उस संपूर्ण पाठक-समुदाय के साथ विश्वासघात करता है, जो उसकी रचनाओं में अपने जीवन का अक्स ढूँढ़ रहा होता है। इतिहास साक्षी है कि बैसाखियों के सहारे एवरेस्ट फ़तह नहीं किया जा सकता। उधार के शब्द, चुराए हुए भाव और मशीनी तकनीक के सहारे कुछ समय के लिए गोष्ठियों में तालियाँ तो बटोरी जा सकती हैं, अख़बारी सुर्ख़ियाँ भी पाई जा सकती हैं, परन्तु समय के क्रूर और निष्पक्ष थपेड़े ऐसी काग़ज़ी नावों को बहा ले जाते हैं। साहित्य के दरबार में अमरता केवल और केवल अपनी ज़मीन से जुड़े प्रामाणिक सृजन को ही मिलती है। मेरी रचना ‘कृष्ण तुम पर क्या लिखूँ’ को भले ही हज़ार चोर अपने नाम की ओट में छिपाने का प्रयास करें, पर उसकी आत्मा की पुकार सदैव अपने मूल जनक का पता देती रहेगी।

रचना-चोरी का यह संपूर्ण विमर्श केवल किसी कॉपीराइट क़ानून या क़ानूनी धाराओं का विषय नहीं है; यह सीधे-सीधे मनुष्य के नैतिक विवेक और उसकी आत्मिक ईमानदारी का मामला है। कला के क्षेत्र में प्रभाव ग्रहण करना स्वाभाविक है, पूर्ववर्तियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए परंपरा को आगे बढ़ाना अनिवार्य है; किन्तु अपनी रीढ़ को ही ग़ायब कर देना आत्मघाती है। जो रचनाकार अपने जीवन की धूल-धूप से वाक़िफ़ है, जो अपनी मिट्टी की सौंधी गंध को पहचानता है, जो अपनी आँखों से समाज की विद्रूपताओं को देखता है, अपनी छाती में उसकी पीड़ा को महसूस करता है और अपनी ठेठ देशज या प्रांजल भाषा में उसे निर्भीकता से अभिव्यक्त करता है वही रचनाकार काल की ललाट पर अमिट हस्ताक्षर अंकित करता है। साहित्य में अंततः यह मायने नहीं रखता कि—किस विषय पर लिखा गया—बल्कि युग-युगांतर तक गूँजने वाला प्रश्न यही रहता है कि—वह अनुभव की कितनी आंतरिक सच्चाई, प्रामाणिकता और तन्मयता से लिखा गया—यही मौलिकता का अंतिम सत्य है और यही सृजन का आत्मसम्मान भी।

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