अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

काँच हुए सब रिश्ते-नाते

 

काँच हुए सब रिश्ते-नाते, 
मन भी टूट भरे। 
 
भीतर-भीतर सन्नाटे अब, 
मन में खटक रहे। 
शहरों की इस भीड़ में रिश्ते, 
खूँटी लटक रहे। 
पास बैठ कर भी कोसों की, 
दूरी पाल रहे। 
आँखों की भाषा को पढ़ना, 
हम सब टाल रहे। 
संवेदन की सूखी क्यारी, 
कोमल भाव मरे। 
 
हाथों में मोबाइल थामे, 
दुनिया साथ लिए। 
पर घर के ही कमरे में हम, 
ख़ुद को बंद किए। 
मुखड़ों पर झूठी मुस्कानें, 
अश्रु भटक रहे। 
रिश्ते अब तो आभासी हैं, 
भ्रम में अटक रहे। 
शब्द अर्थ सब बेगाने हैं
केवल तर्क धरे। 
 
स्वारथ की आपाधापी में, 
अपनापन खोया। 
अहंकार का मरुथल फैला, 
सरल हृदय रोया। 
देख किसी की पीड़ा पर अब, 
पत्थर हैं आँखें। 
स्वप्न नहीं दिखते हैं इनमें, 
मुरझाईं पाँखें। 
सजी हुई महफ़िल में भी हम, 
बेबस सिसक भरे। 
 
बाज़ारों का शोर-शराबा, 
संवेदन बौने। 
रिश्तों की इस टूट-फूट में, 
वीराने कौने। 
दिल मशीन से चलते हैं अब, 
श्रम का अंत हुआ। 
करे दिखावा जग में जो भी, 
उतना संत हुआ। 
बर्फ़ सरीखे ठंडे मन हैं, 
भीतर धधक भरे। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अंतहीन टकराहट
|

इस संवेदनशील शहर में, रहना किंतु सँभलकर…

अंतिम गीत लिखे जाता हूँ
|

विदित नहीं लेखनी उँगलियों का कल साथ निभाये…

अखिल विश्व के स्वामी राम
|

  अखिल विश्व के स्वामी राम भक्तों के…

अच्युत माधव
|

अच्युत माधव कृष्ण कन्हैया कैसे तुमको याद…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता-मुक्तक

कविता

दोहे

गीत-नवगीत

सांस्कृतिक आलेख

बाल साहित्य कविता

लघुकथा

साहित्यिक आलेख

स्मृति लेख

कहानी

काम की बात

सामाजिक आलेख

कविता - हाइकु

ऐतिहासिक

कविता - क्षणिका

चिन्तन

व्यक्ति चित्र

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ललित निबन्ध

स्वास्थ्य

खण्डकाव्य

नाटक

रेखाचित्र

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

ग़ज़ल

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं