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कैसे हम ख़ुद को समझाएँ

 

कैसे हम ख़ुद को समझाएँ
क्या हमको आभास नहीं है। 
भीड़ खड़ी है घर द्वारे पर
कोई भी पर ख़ास नहीं है। 
रिश्तों की फीकी दुनिया में
महुए भरी मिठास नहीं है। 
 
अँधियारे की चादर ओढ़े सोई हैं अपनी रातें
हार थकी सी चूर हुई हैं अपने मन की सब बातें। 
रिश्तों के बरगद पर देखो लंबी पड़ी दरारें हैं। 
अपनेपन की दरिया में स्वारथ की सूखी धारे हैं। 
चेहरों के इस मेले में हम अपना चेहरा भूल गए। 
स्वारथ के झूलों के ऊपर सारे रिश्ते झूल गए। 
भीतर जलते रेगिस्ताँ में
अब कोई मृग-प्यास नहीं है। 
भीड़ खड़ी है घर द्वारे पर
कोई भी पर ख़ास नहीं है। 
रिश्तों की फीकी दुनिया में
महुए भरी मिठास नहीं है। 
 
दर्पण देख डरे हम अक्सर अपने ही प्रतिबिम्बों से। 
अक्सर हमने खाईं चोटें अपने ही आलम्बों से। 
शब्दों की खेती में हमने केवल बोईं हैं आहें। 
कौन उतारे समय नदी को पकड़ हमारी अब बाँहें। 
क़िस्मत की कोरी चादर में दाग लगे हैं अति गहरे। 
सच्चाई अब खड़ी हिरासत लगे झूठ के ज्यों पहरे। 
सत्य खड़ा है सम्मुख मेरे
पर होता विश्वास नहीं है। 
भीड़ खड़ी है घर द्वारे पर
कोई भी पर ख़ास नहीं है। 
रिश्तों की फीकी दुनिया में
महुए भरी मिठास नहीं है। 
 
सूनी है पगडंडी देखो तरसे पनघट अब गगरी को। 
याद करें हम हरपल हरछिन अपनी प्यारी नगरी को। 
खलिहानों की रौनक़ रूठी कोयल भी अनबोली है। 
नदिया ताल तलैया सूखे, ख़ाली मन की झोली है। 
मेंड़-मेड़ पर फिरती तितली नहीं दिखाई अब देतींं 
पालीथीनों से ही गायें भूख पेट में भर लेतीं। 
बचपन वाली उस माटी सा
प्यारा कोई लिबास नहीं है। 
भीड़ खड़ी है घर द्वारे पर
कोई भी पर ख़ास नहीं है। 
रिश्तों की फीकी दुनिया में
महुए भरी मिठास नहीं है। 
 
चौखट पर बैठी वह बूढ़ी जोह रही किसका रस्ता। 
शायद बेटा फिर आयेगा लेकर यादों का बस्ता। 
बापू की लाठी कुड़काती कहाँ गाँव की वह ड्योढ़ी। 
कहाँ गई वह दाना-पानी गुड़-धानी की वह जोड़ी। 
मन बैरागी ढूँढ़ रहा है छप्पर वाली वह छैयाँ। 
कहाँ गए होली के फगुआ कहाँ हैं भाभी के सैयाँ। 
चमक-दमक की इस दुनिया में
अपनेपन का वास नहीं है। 
भीड़ खड़ी है घर द्वारे पर
कोई भी पर ख़ास नहीं है। 
रिश्तों की फीकी दुनिया में
महुए भरी मिठास नहीं है। 

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