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मैं पूर्ण न हो सका

 

मैं पूर्ण न हो सका
यह स्वीकार है
पर यह भी सत्य है
कि मैंने अधूरापन
जान-बूझकर नहीं चुना
 
मैं जन्मा था
अभावों की गोद में
जहाँ खिलौने नहीं
ज़िम्मेदारियाँ मिलती हैं
और लोरियाँ नहीं
चिंताओं की फुसफुसाहट
 
शिक्षा के नाम पर
माँ की छाया से दूर
नाना नानी के आँगन में
सीख लिया
कि अकेलापन
कैसा होता है
और प्रतीक्षा
कितनी भारी होती है
 
माँ का तेज़ स्वभाव
मेरे भीतर
डर बनकर उतर गया
मैं निर्णय से पहले
काँपने लगा
इच्छाशक्ति
धीरे धीरे
मौन हो गई
 
मैं स्वयं से
झूठ बोलता रहा
कि सब ठीक है
और उसी झूठ ने
हर बार
मुझे असफल किया
 
बेरोज़गारी
मेरी सबसे लंबी संगिनी रही
उसने मुझे मजबूर नहीं
भगा दिया
चुनौतियों से
मैं भागता रहा
क्योंकि लड़ना
मुझे किसी ने
सिखाया ही नहीं
 
शादी हो गई
बिना पैरों के
सपनों के साथ
पत्नी मिली
समझदार
संवेदनशील
पर मैं
उसे वह प्यार
न दे सका
जो शब्दों से आगे
होता है
 
घर
माँ के तेज़ स्वर
और ज़िम्मेदारियों के
बीच
मैं भाग्यवादी बन गया
कर्म से डरने लगा
और नियति के पीछे
छिप गया
 
दो बेटियाँ आईं
मेरी दुनिया में
नन्ही रोशनियाँ
जिनके लिए
मैंने
जैसे तैसे
रास्ते बनाए
पढ़ाया
सँभाला
पर उनसे
बात करना
न सीख सका
 
मेरी चुप्पी
उनके बीच
एक दीवार बन गई
वे अपनी दुनिया में
आगे बढ़ीं
और मैं
पीछे रह गया
मूक दर्शक की तरह
 
वे अपने ढंग से
जीना चाहती थीं
मैं चाहता था
उनका सहारा बनूँ
पर स्वयं
खड़ा न हो सका
तो उन्हें
क्या थामता
 
पत्नी
मेरे पास थी
पर मेरे भीतर
नहीं पहुँच सकी
मैंने उसे
समय दिया
पर आत्मा नहीं
 
और अब
जब सब अपने अपने
रास्तों पर हैं
मेरे पास
केवल मैं हूँ
एक खोखला
अकेला
अधूरा व्यक्तित्व
 
मैं शिकायत नहीं करता
बस स्वीकार करता हूँ
कि मैं
पूर्ण न हो सका
पर यह अधूरापन
मेरी सच्चाई है
और शायद
यही मेरी
सबसे ईमानदार
कविता भी। 

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