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जीवन संग्राम

 

यह कहानी वर्तमान समय के उस संक्रमण काल की है, जहाँ दो पीढ़ियों के संस्कार, जीवन-मूल्य और आकांक्षाएँ एक-दूसरे के सम्मुख किसी महायुद्ध की भाँति खड़ी हैं। यह केवल एक पिता और पुत्री का विवाद नहीं, बल्कि पुरातन जड़ों और आधुनिक पंखों के मध्य एक सुलगता हुआ संवाद है। 

 

नर्मदा के तट पर बसे एक पुराने क़स्बे ‘रेवापुर’ के एक एकांत दालान में प्रमोद बैठे थे। उनके सम्मुख लकड़ी की पुरानी मेज़ पर दस पृष्ठों का एक पत्र बिखरा पड़ा था। यह पत्र उनकी ज्येष्ठ पुत्री—अनुभा—ने हैदराबाद से भेजा था। प्रमोद, जो स्वयं साहित्य और शास्त्रों के प्रकांड विद्वान थे, एक अच्छे शिक्षक थे, आज अपनी ही बेटी के लिखे शब्दों के जाल में उलझ गए थे। 

दालान के बाहर ढलती दोपहर की धूप धुँधली पड़ रही थी, पर प्रमोद के भीतर विचारों की अग्नि प्रज्वलित थी। अनुभा ने पत्र में वह सब लिख दिया था जो पिछले तीस वर्षों से उनके घर की दीवारों में मौन बनकर दबा हुआ था। पत्र का प्रारंभ ही एक चुनौती था—“पिताजी, मैं अब 30 वर्ष की स्वतंत्र स्त्री हूँ। यदि मैं आज स्वयं के लिए नहीं खड़ी हुई, तो शायद कभी नहीं हो पाऊँगी।”

प्रमोद का हाथ काँपा। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। सामने वाले घर में रहने वाली ‘सृष्टि’ का चेहरा उनकी आँखों के सामने घूम गया। अनुभा ने ठीक ही लिखा था, उस बेचारी को घर से बाहर क़दम तक नहीं रखने दिया गया। 12वीं के बाद ही उसे एक संकुचित मानसिकता वाले घर में ब्याह दिया गया, जहाँ वह आज भी सिर पर पल्लू रखे अपनी पहचान खो चुकी है। अनुभा ने ‘ज्योति दीदी’ और ‘तनु’ का भी ज़िक्र किया था, जिनमें से एक का जीवन जलकर राख हो गया और दूसरी अपनी मर्ज़ी के विरुद्ध किसी गुमनाम अँधेरे में धकेल दी गई। 

प्रमोद ने चश्मा उतारा और आँखें मूँद लीं। अनुभा ने पत्र के दूसरे भाग में उनके अपने दांपत्य जीवन की परतें उधेड़ दी थीं। उसने लिखा था—“पिताजी, मैंने बचपन में आपको उदास देखा है। मैं जानती हूँ कि आप किसी और से प्रेम करते थे, पर समाज और माता-पिता के दबाव में आपने माँ से विवाह किया। उस अतृप्ति ने आपको और माँ को एक ऐसे रिश्ते में बाँध दिया जहाँ केवल औपचारिकता शेष थी।”

प्रमोद के मानस पटल पर तीस साल पुरानी वह धुँधली छवि उभर आई। वह ‘कोई’ थी, जिसे वे चाहते थे, पर ब्राह्मण कुल की मर्यादा और पिता के हठ के आगे उन्होंने घुटने टेक दिए थे। अनुभा ने सच लिखा था उस अधूरेपन ने उन्हें चिड़चिड़ा और अत्यधिक अनुशासित बना दिया था। उन्होंने अपनी उस पीड़ा को ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ के भारी आवरण से ढकने का प्रयास किया। वे समाज के लिए ‘आदर्श ब्राह्मण’ बने रहे, पर घर के भीतर एक मौन शासक। 

अनुभा ने माँ का जो चित्रण किया था, वह दीनानाथ जी के हृदय में शूल की तरह चुभा। माँ जो घर भी सँभालती, स्कूल में पढ़ाती और मासिक धर्म की ‘अपवित्रता’ के दिनों में भी रसोई से दूर रहकर अपनी अस्मिता को कुचलती। अनुभा ने लिखा था “क्या आप अपनी बेटी को अपने जैसा ही परिवार देना चाहते हैं? जहाँ पति का शब्द अंतिम हो और पत्नी की राय गौण?” 

पत्र का सबसे विवादास्पद हिस्सा था—‘अविरल’। अनुभा ने लिखा था कि जब वह हैदराबाद में गंभीर रूप से अस्वस्थ हुई, जब उसकी पीठ की चोट ने उसे बिस्तर पर डाल दिया, तब कोई रिश्तेदार, कोई चाचा या भाई काम नहीं आया। उस समय केवल अविरल था, जो उसे अस्पताल ले गया, उसकी दवाइयों का ध्यान रखा और उसे मानसिक अवसाद (BPD) से बाहर निकाला। 

अविरल, जो कि ब्राह्मण कुल से नहीं था। प्रमोद के लिए यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन के दर्शन पर एक प्रहार था। उनके लिए ‘ब्राह्मणत्व’ कोई जाति नहीं, बल्कि संस्कारों की वह शुद्धता थी जिसे वे पीढ़ियों से सहेज रहे थे। उन्होंने पत्र में अनुभा द्वारा उद्धृत गीता के श्लोक को पढ़ा—चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। 

वे बुदबुदाए, “गुण और कर्म ठीक है अनुभा, पर गुण संस्कारों की खाद से ही तो फलते हैं। जिस समाज में मैं रहता हूँ, जहाँ लोग मुझे ‘शुद्धता’ का प्रतीक मानते हैं, वहाँ मैं यह कैसे स्वीकार कर लूँ कि मेरी बेटी एक ग़ैर-समाज में जाए? क्या मेरी प्रतिष्ठा केवल एक काग़ज़ की नाव है जो तुम्हारी एक ज़िद से डूब जाएगी?” 

प्रमोद का मानसिक संघर्ष अब शारीरिक वेदना में बदलने लगा था। वे इस समय नितांत अकेले थे। उनके अपने भाई उनसे विमुख थे, माता-पिता वृद्ध और अशक्त थे। पूरा घर, उनकी शादी की चिंता और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोझ केवल उनके कंधों पर था। उन्हें लगा कि अनुभा ने अपनी ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर उनके ‘स्वाभिमान’ की बलि चढ़ा दी है। 

उन्हें वह समय याद आया जब उन्होंने अनुभा को आईआईटी भेजने के लिए समाज की बातों को अनसुना किया था। तब उन्हें गर्व था कि उनकी बेटी आधुनिक बनेगी, पर उन्हें यह भान न था कि वह आधुनिकता उनके ही आधार को चुनौती देगी। अनुभा ने पत्र में दहेज़, सरनेम न बदलने और सिंदूर-बिछिया जैसे प्रतीकों के त्याग की जो बातें लिखी थीं, वे प्रमोद के लिए किसी ‘सांस्कृतिक विध्वंस’ से कम नहीं थीं। 

वे सोचने लगे, “क्या मैंने इसे पढ़ाया ताकि यह मेरे ही कुल की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाए? क्या माता-पिता का स्नेह इतना सस्ता है कि उसे ‘जाति’ के तराज़ू पर तौल दिया जाए?” 

प्रमोद ने अपनी क़लम उठाई। उनके हाथ काँप रहे थे, पर संकल्प दृढ़ था। उन्होंने पत्र लिखना शुरू किया। यह पत्र किसी विद्वान का नहीं, बल्कि एक आहत पिता का था। 

“प्रिय अनुभा,

तुम्हारा पत्र पढ़ा। तुमने मेरे अतीत को कुरेदा, मेरे दांपत्य को आँका और मेरे संस्कारों को ‘संकीर्णता’ का नाम दिया। बिटिया, तुम जिस नवीनता की तुलना पुराने समय से कर रही हो, वह अन्यायपूर्ण है। हमारे समय में विकल्प नहीं थे, केवल उत्तरदायित्व थे। यदि वह जीवन केवल विफलता होता, तो तुम आज इस योग्य न होतीं कि मुझे यह पत्र लिख सको। 

तुमने अविरल को चुन रही हो, क्योंकि उसने तुम्हारा साथ दिया। मैं उसका कृतज्ञ हूँ। पर विवाह केवल एक ‘सहयोग’ नहीं, बल्कि ‘संस्कारों का संगम’ है। मैं ब्राह्मण हूँ और यह मेरी अहमन्यता नहीं, मेरी जीवन पद्धति है। मैं चाहता हूँ कि तुम ब्राह्मण कुल में ही विवाह करो चाहे वह कोई भी हो। यह मेरी ज़िद नहीं, मेरा वह स्वाभिमान है जिसके बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। 

तुमने लिखा है कि तुम मुझे खोना नहीं चाहतीं। पर याद रखो, यदि तुम ऐसा निर्णय लेती हो जो मेरे जीवन मूल्यों और सामाजिक प्रतिष्ठा को धूल में मिला दे, तो तुम अपने पिता को उसी क्षण खो दोगी। मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता। मैं अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करूँगा और शेष जीवन ईश्वर भक्ति में गुज़ार दूँगा। मैं मान लूँगा कि मेरा कोई वंश नहीं था।”

लिखते-लिखते प्रमोद की आँखों से एक आँसू गिरा और ‘वंश’ शब्द पर फैल गया। उन्होंने पत्र समाप्त किया: 

“निर्णय तुम्हारा है। तुम सक्षम हो, स्वतंत्र हो। पर मेरे स्नेह और मेरी उपस्थिति की शर्त केवल एक है मर्यादा। यदि यह तुम्हें स्वीकार नहीं, तो हमारे रास्ते आज से अलग हैं।”

रात गहरा चुकी थी। प्रमोद ने पत्र को लिफ़ाफ़े में बंद किया। उन्हें पता था कि यह पत्र अनुभा के हृदय को वैसे ही छलनी करेगा जैसे उसके पत्र ने उन्हें किया था। यह दो सत्यों का टकराव था। एक सत्य वह था जो पंख फैलाकर उड़ना चाहता था, और दूसरा वह जो अपनी जड़ों को मिट्टी से अलग नहीं होने देना चाहता था। 

उस ठंडी रात में, प्रमोद के दालान में रोशनी तो थी, पर अँधेरा उनके भीतर कहीं गहरा था। वे जानते थे कि आने वाला कल या तो एक नई समझ का सेतु बनेगा, या फिर एक पिता और पुत्री के बीच ऐसी खाई खोद देगा जिसे समय भी नहीं भर पाएगा। 

प्रमोद ने दीवार पर टँगी अपनी पूर्वजों की तस्वीरों को देखा और हाथ जोड़ लिए। उनकी आँखों में ग्लानि, प्रेम, क्रोध और ममता का एक अजीब मिश्रण था। उन्होंने अपनी अंतिम साँस तक अपने ‘स्वाभिमान’ और संस्कारों की रक्षा करने का प्रण लिया था, भले ही इसकी क़ीमत उन्हें अपनी सबसे प्यारी संतान को खोकर ही क्यों न चुकानी पड़े। 

यह कहानी उस अघोषित युद्ध का चित्रण है जो आज हर मध्यमवर्गीय भारतीय घर में चल रहा है। पिता का ‘स्वाभिमान’ और पुत्री की ‘स्वाधीनता’—दोनों अपनी जगह अडिग हैं। समाधान अब केवल ‘संवाद’ के उस महीन धागे पर टिका है, जो अगर टूटा तो स्मृतियों का यह महल ढह जाएगा। 

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