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पिता का पता

 

पिता
कोई संबोधन भर नहीं होता
वह एक पूरा जीवन होता है
जो
अपने लिए नहीं
हमारे लिए जिया जाता है। 
 
पिता
अक्सर कम बोलता है
क्योंकि
उसके भीतर शब्द नहीं
ज़िम्मेदारियाँ भरी होती हैं। 
उसका मौन
कमज़ोरी नहीं
एक लंबी साधना है
जिसमें
वह रोज़
अपने हिस्से का सुख
चुपचाप त्याग देता है। 
 
उसका रूखापन
दरअसल
धूप में जली हुई
कोमल चिंता होती है
जिसके पीछे
परिवार का
सुनहरा भविष्य
सुरक्षित रखा जाता है। 
वह हँसता नहीं
तो इसका अर्थ यह नहीं
कि उसे हँसी नहीं आती
बल्कि
वह हँसी को
बच्चों के चेहरे पर
स्थगित कर देता है। 
 
पिता की इच्छाएँ
कभी पूरी नहीं होतीं
वे
घर की ज़रूरतों में
टुकड़े टुकड़े होकर
ख़त्म हो जाती हैं। 
नया जूता
कभी बेटे के पैरों में
आ जाता है
और
पुराना जूता
पिता की चुप्पी बन जाता है। 
 
आर्थिक तंगी
सामाजिक दबाव
व्यवहारिक अपमान
सबको
वह अपनी पीठ पर
ऐसे ढोता है
जैसे
दर्द कोई निजी वस्तु हो
जिसे दिखाना
अशिष्टता हो। 
 
वह थकता है
पर बताता नहीं
टूटता है
पर बिखरता नहीं
क्योंकि
उसके टूटने से
घर की दीवारें
हिल सकती हैं। 
 
विडंबना यह है
कि
उसके त्याग को
सबसे कम आँका जाता है
और
नई पीढ़ी
उसी पर
सबसे पहले
विश्वास खो देती है। 
कभी कहती है
आप नहीं समझते
कभी कहती है
आप पुराने हो गए हैं। 
 
उसे नहीं पता
कि पिता
समय से नहीं
संस्कारों से चलता है
और
उसका हर निर्णय
भविष्य की नींव में
चुपचाप जुड़ जाता है। 
 
पिता
आँसू भी
छुपकर पीता है
और
आशीर्वाद भी
बिना जताए देता है। 
 
वह
कंधा नहीं बनता
कि उस पर सिर रखा जाए
वह
ज़मीन बनता है
जिस पर
हम निश्चिंत होकर
चल सकें। 
 
पिता
जब तक साथ होता है
उसकी क़ीमत नहीं समझ आती
और
जब याद बन जाता है
तो
पूरा जीवन
उसके नाम
नम हो जाता है। 

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