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स्वार्थ की लक्ष्मण रेखा

 

रात के भोजन की मेज़ पर सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल काँटों-चम्मचों की आवाज़ तोड़ रही थी। समर्थ ने अचानक कहा, “पिताजी, हमने शहर के पास जो नया अपार्टमेंट लिया है, वहाँ शिफ़्ट होने की सोच रहे हैं। वहाँ जिम है, क्लब है और विहान के स्कूल के पास भी है।”

दीनानाथ जी का हाथ रुक गया। “और यह घर? तुम्हारी माँ की यादें?”

समर्थ ने उपेक्षा से कंधे उचकाए, “पिताजी, इस पुराने खंडहर के मेंटेनेंस में बहुत पैसा बर्बाद होता है। प्रैक्टिकल बनिए। हमने आपके लिए शहर के सबसे बेहतरीन सीनियर लिविंग होम में बात कर ली है। वहाँ आपकी उम्र के बहुत से लोग होंगे।”

‘सीनियर लिविंग होम’ यह शब्द कितना सभ्य था, पर उसका अर्थ कितना क्रूर। दीनानाथ जी ने देखा कि उनके बेटे की आँखों में अब पिता के प्रति श्रद्धा नहीं, बल्कि एक बोझ को ठिकाने लगाने का संतोष था। जेनरेशन गैप केवल उम्र का फ़ासला नहीं था, वह मूल्यों के ढहने की खंदक थी। 

अगले दिन जब दीनानाथ जी की अटैची पैक हो रही थी, विहान ने अपना हेडफोन उतारकर पूछा, “दादाजी, क्या आप वहाँ ख़ुश रहेंगे?” 

दीनानाथ जी ने उसके मासूम चेहरे को देखा, जिसमें अभी संवेदना के कुछ बीज शायद बाक़ी थे। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बेटा, हम उस दौर के लोग हैं जहाँ टूटी हुई चीज़ों को रिपेयर किया जाता था। तुम उस दौर के हो जहाँ चीज़ों को रिप्लेस कर दिया जाता है। बस इतना याद रखना, जब तुम बड़े होगे, तो शायद तुम्हारा बेटा भी प्रैक्टिकल होने का यही पाठ पढ़ेगा।”

विहान के हाथ ठिठक गए। समर्थ के माथे पर पसीना आ गया। उस एक पल के लिए कमरे में फैला इमोशनल इंटेलिजेंस का सारा दिखावा तार-तार हो गया। 

दीनानाथ जी तो चले गए, पर वे एक सवाल छोड़ गए। आज जब हम सब अपनी निजता और करियर की दौड़ में अपनों को ही पीछे छोड़ रहे हैं, तो क्या हम वास्तव में प्रगति कर रहे हैं?

यदि आज आप समर्थ की जगह होते, तो क्या आप उस व्यवहारिक दुनिया को चुनते जहाँ केवल सुविधाएँ हैं, या उस पुराने घर को जहाँ स्मृतियों की गरमाहट और पिता का आशीर्वाद था? 

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