परीक्षा, तनाव और विद्यार्थी: दबाव के बीच संतुलन की राह
आलेख | काम की बात डॉ. सुशील कुमार शर्मा1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
आज का विद्यार्थी केवल किताबों से नहीं जूझ रहा, वह अपेक्षाओं, प्रतिस्पर्धा और परिस्थितियों के बहुआयामी दबाव में जी रहा है। परीक्षा नज़दीक है। एक ओर माता-पिता की उम्मीदों का अदृश्य बोझ है, दूसरी ओर गला काट प्रतिस्पर्धा का भय। पाठ्यक्रम पूरा करने की चिंता, अच्छे अंक लाने का दबाव, भविष्य को लेकर अनिश्चितता, और इन सबके बीच प्रदूषित वातावरण तथा डिजिटल विचलन इन परिस्थितियों में विद्यार्थी परीक्षा कक्ष की ओर बढ़ रहा है।
मैं यह लेख किसी उपदेशक की तरह नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक मित्र की तरह लिख रहा हूँ जो विद्यार्थियों से यह कहता है कि तनाव स्वाभाविक है, पर उसके अधीन होना आवश्यक नहीं।
तनाव को पहले समझें, फिर सँभालें
तनाव कोई शत्रु नहीं है। थोड़ी मात्रा में तनाव हमें सजग बनाता है, पर जब वह डर में बदल जाए, तब समस्या बनता है। तनाव कोई असामान्य स्थिति नहीं है। परीक्षा से पहले घबराहट होना स्वाभाविक है। समस्या तब होती है, जब तनाव डर का रूप ले लेता है अधिकांश विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना है, जबकि यह सोच ही सबसे बड़ा तनाव पैदा करती है।
परीक्षा का तनाव प्रायः तीन कारणों से जन्म लेता है पहला, अपेक्षाओं का दबाव दूसरा, तैयारी की असंतुलित रणनीति तीसरा, स्वयं पर विश्वास की कमी यदि विद्यार्थी यह समझ ले कि परीक्षा जीवन का एक पड़ाव है, पूरा जीवन नहीं, तो तनाव की तीव्रता स्वतः कम होने लगती है।
विद्यालय और शिक्षक की भूमिका यहीं से शुरू होती है। यदि शिक्षक कक्षा में यह वातावरण बना दें कि परीक्षा सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम सत्य नहीं, तो विद्यार्थी का भय आधा हो जाता है। जब शिक्षक कहते हैं तुम प्रयास करो, परिणाम हम मिलकर सँभालेंगे तो छात्र का मन हल्का हो जाता है।
परीक्षा की तैयारी: सही दिशा, सही दृष्टि
परीक्षा के पहले कुछ सप्ताह अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इस समय विद्यालय का वातावरण निर्णायक भूमिका निभाता है।
यदि विद्यालय में डर का माहौल हो, केवल परिणाम की चर्चा हो, तो तनाव बढ़ता है। यदि विद्यालय में विश्वास का वातावरण हो, जहाँ शिक्षक कहते हों हम साथ हैं तो विद्यार्थी मज़बूत बनता है।
इस समय शिक्षकों को चाहिए कि वे अतिरिक्त दबाव न डालें छात्रों की मानसिक स्थिति को समझें अनावश्यक तुलना से बचें एक समझदार शिक्षक जानता है कि इस समय एक प्रेरक वाक्य, दस प्रश्नों से अधिक प्रभावी होता है। परीक्षा की तैयारी का अर्थ केवल घंटों पढ़ना नहीं, बल्कि समझदारी से पढ़ना है।
सबसे पहले, पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटिए। पूरा सिलेबस एक साथ देखने से डर पैदा होता है। जब उसे अध्यायों, विषयों और उपविषयों में बाँट दिया जाता है, तो वह प्रबंधनीय हो जाता है।
दूसरा, पढ़ने का समय निश्चित कीजिए। अनियमित पढ़ाई मन को भ्रमित करती है। रोज़ का एक निश्चित समय भले कम हो, पर नियमित हो अधिक प्रभावी होता है।
तीसरा, पढ़ते समय तुलना न करें। कोई मित्र अधिक पढ़ रहा है, कोई तेज़ समझ रहा है यह सोच आपकी ऊर्जा को कम करती है। आपकी क्षमता आपकी है, उसी पर भरोसा रखें।
कैसे पढ़ें ताकि याद रहे
पढ़ाई का सबसे बड़ा प्रश्न यही है पढ़ा हुआ याद कैसे रहे? इसके लिए तीन सूत्र अत्यंत उपयोगी हैं पहला, समझकर पढ़ना दूसरा, लिखकर अभ्यास करना तीसरा, बार-बार दोहराना।
सिर्फ़ पढ़ लेने से विषय स्थायी नहीं होता। महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को अपने शब्दों में लिखिए। जहाँ सम्भव हो, चार्ट, तालिका और माइंड मैप बनाइए। यह मस्तिष्क को दृश्य संकेत देता है, जिससे स्मरण शक्ति बढ़ती है।
रटने की बजाय अर्थ समझिए। जो बात समझ में आ जाती है, वह डर नहीं बनती।
परीक्षा के ठीक पहले: क्या करें, क्या न करें
परीक्षा से कुछ दिन पहले नया पाठ शुरू करने से बचें। इस समय का उपयोग केवल पुनरावृत्ति के लिए करें। यह वह समय है जब आत्मविश्वास बनाया जाता है, न कि स्वयं को भ्रमित किया जाता है।
रात को देर तक जागने की आदत छोड़ें। नींद मस्तिष्क के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी पढ़ाई। थका हुआ मस्तिष्क सीखी हुई बातों को भी भूल जाता है।
खान-पान हल्का और संतुलित रखें। अत्यधिक चाय, कॉफ़ी या जंक फ़ूड तनाव बढ़ाता है।
प्रश्न पत्र हल करने की तकनीक
परीक्षा कक्ष में प्रवेश करते ही घबराहट होना सामान्य है, पर उसे हावी न होने दें। सबसे पहले, प्रश्न पत्र को ध्यान से पढ़ें जल्दबाज़ी में उत्तर लिखना ग़लतियाँ बढ़ाता है।
जिन प्रश्नों के उत्तर अच्छे से आते हों, उन्हें पहले हल करें। इससे आत्मविश्वास बनता है और समय का संतुलन भी रहता है।
उत्तर लिखते समय साफ़-सुथरी भाषा और स्पष्ट अक्षरों का ध्यान रखें। उत्तर को बिंदुओं में लिखना, जहाँ सम्भव हो, परीक्षक के लिए भी सुविधाजनक होता है।
समय प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। किसी एक प्रश्न में अधिक समय न लगाएँ। हर प्रश्न के लिए समय पहले ही मन में बाँट लें।
कठिन परिस्थिति में तनाव प्रबंधन
यदि परीक्षा के दौरान कोई प्रश्न कठिन लग जाए, तो घबराएँ नहीं। कुछ गहरी साँसें लें। मस्तिष्क को कुछ क्षण का विराम दें। कई बार उत्तर थोड़ी देर बाद स्वतः स्पष्ट हो जाता है।
यदि उत्तर पूरा न आए, तो जितना आता है उतना सही ढंग से लिखिए। अधूरा प्रयास भी शून्य नहीं होता। ख़ुद से यह कहें मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ। यही भावना तनाव को कम करती है।
माता-पिता की अपेक्षाएँ और विद्यार्थी
यह सच है कि माता-पिता अपने बच्चों से बहुत उम्मीदें रखते हैं। पर विद्यार्थी को यह समझना चाहिए कि अधिकांश अभिभावक सफलता से अधिक सुरक्षा और स्थिरता चाहते हैं। उनसे संवाद करें। अपनी कठिनाइयों को साझा करें। चुप्पी तनाव को बढ़ाती है।
माता-पिता के लिए भी यह आवश्यक है कि वे परिणाम से पहले प्रयास को सराहें। परीक्षा के समय बच्चे को सहयोग चाहिए, तुलना नहीं।
माता-पिता, विद्यालय और शिक्षक: त्रिकोणीय संतुलन
विद्यार्थी सबसे अधिक दबाव तब महसूस करता है, जब विद्यालय और घर से विरोधाभासी संदेश मिलते हैं।
यदि विद्यालय माता-पिता को यह समझा सके कि अंक से अधिक महत्त्व प्रयास का है तो घर का दबाव कम होता है।
शिक्षक और अभिभावक के बीच संवाद विद्यार्थी के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
जब माता-पिता कहते हैं हम तुम्हारे साथ हैं तो विद्यार्थी का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है।
प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर
गला काट प्रतिस्पर्धा का दौर हमें यह भूलने पर मजबूर कर देता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आगे निकलना नहीं, बल्कि समझदार बनना है।
दूसरों से आगे निकलने की होड़ में स्वयं को पीछे न छोड़ दें। सहयोग, चर्चा और सामूहिक अध्ययन तनाव को कम करता है और सीख को गहरा करता है।
प्रदूषण और स्वास्थ्य: अनदेखा पहलू
आज का वातावरण शारीरिक ही नहीं, मानसिक प्रदूषण से भी भरा है। लगातार शोर, स्क्रीन और नकारात्मक समाचार मन को थका देते हैं।
पढ़ाई के बीच थोड़ी देर खुली हवा में टहलना, हल्का व्यायाम या ध्यान करना अत्यंत लाभकारी है। यह मन को स्थिर करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।
आत्मविश्वास: सबसे बड़ा हथियार
अंततः, परीक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है आत्मविश्वास। आत्मविश्वास न तो रातों-रात आता है, न दूसरों से उधार लिया जा सकता है। यह छोटे-छोटे प्रयासों से बनता है।
हर दिन स्वयं से यह कहिए मैं सीख रहा हूँ, मैं प्रयास कर रहा हूँ, मैं सक्षम हूँ। ये तीन वाक्य परीक्षा के सबसे बड़े उत्तर बन जाते हैं।
परीक्षा जीवन का निर्णायक क्षण नहीं, बल्कि स्वयं को परखने का अवसर है। तनाव, दबाव और अपेक्षाएँ इस यात्रा का हिस्सा हैं, पर मंज़िल नहीं।
यदि विद्यार्थी सही दिशा में तैयारी करे, संतुलित जीवन जिए, स्वयं पर विश्वास रखे और परिस्थितियों को समझदारी से सँभाले, तो परीक्षा केवल अंकपत्र नहीं, आत्मविश्वास की प्रमाणपत्र बन जाती है।
याद रखिए आप परीक्षा देने जा रहे हैं, परीक्षा आपको परिभाषित करने नहीं।
आपका मूल्य आपकी मेहनत, आपकी ईमानदारी और आपकी संवेदनशीलता में है।
सफलता एक परिणाम है, पर संतुलित मन और स्वस्थ दृष्टि वही वास्तविक विजय है।
(संपादकीय टिप्पणी: सुशील शर्मा जी प्राचार्य हैं।)
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- वर्तमान समय में हनुमान जी की प्रासंगिकता
- हरितालिका तीज: आस्था, शृंगार और भारतीय संस्कृति का पर्व
कविता - हाइकु
कहानी
- अधूरी देहरी का मौन
- अर्जुन से आर्यन तक: आभासी दुनिया का सच
- अर्द्धांगिनी
- जड़ों से जुड़ना
- जल कुकड़ी
- जाको राखे सांइयाँ
- जीवन संग्राम
- त्रिवेणी संगम
- दरकता मन
- पद्मावती
- पुरानी नींव, नए मकान
- पूर्ण अनुनाद
- बुआ की राखी
- ब्रह्मराक्षस का अभिशाप
- मंदबुद्धि
- मन के एकांत में
- मैडम एम
- मौन की परछाइयाँ
- राखी का फ़र्ज़
- रिश्तों की गर्माहट
- रिश्तों के रेशमी धागे
- रेशमी धागे: सेवा का नया पथ
- हरसिंगार
- ज़िन्दगी सरल है पर आसान नहीं
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
लघुकथा
- अंतर
- अनैतिक प्रेम
- अपनी जरें
- आँखों का तारा
- आओ तुम्हें चाँद से मिलाएँ
- उजाले की तलाश
- उसका प्यार
- एक बूँद प्यास
- काहे को भेजी परदेश बाबुल
- कोई हमारी भी सुनेगा
- गाय की रोटी
- गाय ‘पालन की परिभाषा’!
- डर और आत्म विश्वास
- तहस-नहस
- तुलना का बोझ
- दूसरी माँ
- नारी ‘तुम मत रुको’!
- पति का बटुआ
- पत्नी
- पाँच लघु कथाएँ
- पौधरोपण
- बेटी की गुल्लक
- माँ का ब्लैकबोर्ड
- माँ ‘छाया की तरह’!
- मातृभाषा
- माया
- मुझे छोड़ कर मत जाओ
- मुझे ‘बहने दो’!
- म्यूज़िक कंसर्ट
- रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
- रौब
- शर्बत
- शिक्षक सम्मान
- शिक्षा की पाँच दीपशिखाएँ
- शुद्धि की प्रतीक्षा
- शेष शुभ
- सपनों की उड़ान
- हर चीज़ फ़्री
- हिंदी–माँ की आवाज़
- हिन्दी इज़ द मोस्ट वैलुएबल लैंग्वेज
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- फ़र्ज़
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- अमृत काल का आम
- एक कप चाय और सौ जज़्बात
- कविता बेचो, कविता सीखो!
- काश मैं नींबू होता
- गुरु दक्षिणा का नया संस्करण—व्हाट्सएप वाला प्रणाम!
- घरेलू मॉडल स्त्री
- डॉ. सिंघई का ‘संतुलित’ संसार
- नवदुर्गा महोत्सव और मोबाइल
- न्याय की गली में कुत्तों का दरबार
- प्रोफ़ाइल पिक की देशभक्ति
- मातृ दिवस और पितृ दिवस: कैलेंडर पर टँगे शब्द
- मिठाइयों में बसा मनुष्य का मनोविज्ञान
- वाघा का विघटन–जब शेर भी कन्फ्यूज़ हो गया
- शर्मा जी और सब्ज़ी–एक हरी-भरी कथा
ललित निबन्ध
गीत-नवगीत
- अखिल विश्व के स्वामी राम
- अच्युत माधव
- अनुभूति
- अब कहाँ प्यारे परिंदे
- अब का सावन
- अब नया संवाद लिखना
- अब वसंत भी जाने क्यों
- अबके बरस मैं कैसे आऊँ
- आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
- आज से विस्मृत किया सब
- इस बार की होली में
- उठो उठो तुम हे रणचंडी
- उर में जो है
- कि बस तुम मेरी हो
- कृष्ण मुझे अपना लो
- कृष्ण सुमंगल गान हैं
- गमलों में है हरियाली
- गर इंसान नहीं माना तो
- गुरु पूर्णिमा पर गीत
- गुलशन उजड़ गया
- गोपी गीत
- घर घर फहरे आज तिरंगा
- चला गया दिसंबर
- चलो होली मनाएँ
- चढ़ा प्रेम का रंग सभी पर
- ज्योति शिखा सी
- झरता सावन
- टेसू की फाग
- तुम तुम रहे
- तुम मुक्ति का श्वास हो
- दिन भर बोई धूप को
- धरती बोल रही है
- नया कलेंडर
- नया वर्ष
- नव अनुबंध
- नववर्ष
- फागुन ने कहा
- फूला हरसिंगार
- बहिन काश मेरी भी होती
- बेटी घर की बगिया
- बोन्साई वट हुए अब
- भरे हैं श्मशान
- मतदाता जागरूकता पर गीत
- मन का नाप
- मन को छलते
- मन गीत
- मन बातें
- मन वसंत
- मन संकल्पों से भर लें
- महावीर पथ
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 001
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 002
- मौन गीत फागुन के
- मज़दूर दिवस पर गीत
- यूक्रेन युद्ध
- वयं राष्ट्र
- वसंत पर गीत
- वासंती दिन आए
- विधि क्यों तुम इतनी हो क्रूर
- शस्य श्यामला भारत भूमि
- शस्य श्यामली भारत माता
- शिव
- श्रावण
- सत्य का संदर्भ
- सुख-दुख सब आने जाने हैं
- सुख–दुख
- सूना पल
- सूरज की दुश्वारियाँ
- सूरज को आना होगा
- स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
- हर हर गंगे
- हिल गया है मन
- ख़ुद से मुलाक़ात
- ख़ुशियों की दीवाली हो
स्वास्थ्य
स्मृति लेख
खण्डकाव्य
बाल साहित्य कविता
- अरे गिलहरी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - ठंड
- गर्मी की छुट्टी
- चिड़िया का दुःख
- चिड़िया की हिम्मत
- पतंग
- पानी बचाओ
- बादल भैया
- बाल कविताएँ – 001 : डॉ. सुशील कुमार शर्मा
- बेचारा गोलू
- मुनमुन गिलहरी
- मैं कुछ ख़ास बनूँगा
- मैं ही तो हूँ— तुम्हारे भीतर
- लोरी
- लौकी और कद्दू की लड़ाई
- हम हैं छोटे बच्चे
- होली चलो मनायें
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
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