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महाशिवरात्रि, शिव और शक्ति का जागरण

 

फाल्गुन की गहनतम रात्रि में
जब आकाश अपने ही अंधकार में डूबा रहता है
और दिशाएँ मौन साध लेती हैं, 
तभी कहीं भीतर
एक सूक्ष्म ज्योति जन्म लेती है। 
 
वह ज्योति किसी दीपक की नहीं, 
वह किसी तारे की भी नहीं, 
वह चेतना की वह पहली कम्पन है
जिसे ऋषियों ने शिव कहा। 
 
शिव
अर्थात् वह जो शून्य है
और उसी शून्य से
अनन्त की सरिताएँ बह निकलती हैं। 
 
महाशिवरात्रि
केवल कैलास का उत्सव नहीं, 
यह आत्मा के हिमालय पर
ध्यान की हिमरेखा खींचने की रात्रि है। 
 
जब वैराग्य
अपनी भस्म से लिपटा हुआ
श्मशान की निस्तब्धता से उठता है
और शक्ति
हिमगिरि की पुत्री बन
करुणा की गंगा लिए
उसके समीप आती है, 
तब सृष्टि का प्रथम स्पंदन होता है। 
 
वह मिलन
केवल विवाह नहीं, 
वह प्रकृति और पुरुष का
आदिम आलिंगन है। 
 
शिव बिना शक्ति
निष्पंद, निर्जीव, निर्विकार
ज्यों शब्द बिना अर्थ। 
शक्ति बिना शिव
दिशाहीन प्रवाह
ज्यों नदी बिना तट। 
 
दोनों का संग
अर्धनारीश्वर की दीप्ति बन
ब्रह्मांड के मध्य खड़ा हो जाता है, 
स्मरण दिलाता हुआ
कि संतुलन ही सृष्टि का प्राण है। 
 
त्रिशूल उठता है
और समय की तीन धाराएँ
एक ही कर में सिमट जाती हैं। 
भूत की पीड़ा
वर्तमान की ज्वाला
भविष्य की आशंका
सब एक बिंदु पर स्थिर। 
 
डमरू बजता है
और नाद की लहरें
शून्य को भर देती हैं। 
कण कण में कम्पन
जैसे सृष्टि अभी अभी जन्मी हो। 
 
गले में लिपटा नाग
संकेत देता है
कि भय भी आभूषण बन सकता है
यदि साधना की अग्नि
उसे संस्कारित कर दे। 
 
जटाओं से उतरती गंगा
मन के ताप को शीतल करती है, 
मस्तक का चंद्र
अहंकार की धूप में
एक शीतल छाया रचता है। 
 
भस्म लिपटा शरीर
कहता है
यह देह क्षणभंगुर है
पर चेतना अमर। 
 
और जब तीसरा नेत्र खुलता है
तो केवल काम नहीं
अज्ञान भी भस्म हो जाता है। 
 
इस रात्रि में
जागरण केवल नेत्रों का नहीं, 
यह कुंडलिनी की धीमी चढ़ाई है
रीढ़ की सीढ़ियों से
सहस्रार के सूर्य तक। 
 
ध्यानमग्न साधक
सीधा बैठा
अपने भीतर के विष को रोकता है। 
नीलकंठ बनना
यही तो है
विकारों को पी जाना
और जगत को अमृत देना। 
 
शिव की बारात में
देव भी हैं
और उपेक्षित भी। 
भूत प्रेत
वनचर पशु
गंधर्व
सब एक साथ। 
 
कौन है यहाँ अछूत
कौन है पराया। 
महाकाल की दृष्टि में
सब एक ही नाद के अंश। 
 
आज जब मनुष्य
अपने ही बनाए शोर में
अपनी धड़कन सुन नहीं पाता, 
महाशिवरात्रि
उसे मौन का उपहार देती है। 
 
भागती हुई सभ्यता के मध्य
एक ठहराव
एक गहन श्वास
एक अंतर यात्रा। 
 
यह पर्व पूछता है
क्या तुमने अपने भीतर
शिव को पहचाना। 
क्या तुमने अपनी शक्ति को
सम्मान दिया। 
 
यदि शिव ज्ञान हैं
तो शक्ति कर्म है। 
यदि शिव दीप हैं
तो शक्ति उसकी लौ। 
 
दोनों का संतुलन ही
जीवन का महाकाल है
जो संहार भी है
और सृजन भी। 
 
आओ
इस रात्रि
घंटों की ध्वनि से अधिक
अपने अंतर की प्रतिध्वनि सुनें। 
मंदिर के बाहर से अधिक
मन के भीतर दीप जलाएँ। 
 
अपने विष
ईर्ष्या
क्रोध
लोभ
सब शिवचरणों में अर्पित कर
प्रेम और करुणा की गंगा बहाएँ। 
 
तभी यह रात्रि
वास्तव में महाशिवरात्रि होगी। 
तभी शून्य से अनन्त तक
हमारी यात्रा पूर्ण होगी। 
 
और तब
हर हृदय में
एक शांत, धैर्यवान, 
जाग्रत महाकाल
मुस्कुराएगा। 

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