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वर्तमान में हिंदी साहित्य में गीत और नवगीत की स्थित

 

हिंदी साहित्य की परंपरा मूलतः काव्यात्मक रही है। वैदिक ऋचाओं से लेकर भक्ति काल के पदों, रीतिकालीन कवित्तों और आधुनिक युग के गीतों तक, हिंदी कविता ने सदैव गेयता, लय और भाव की सजीव परंपरा को जीवित रखा है। गीत केवल एक काव्य विधा नहीं रहा, वह भारतीय मनुष्य की संवेदना, अनुभूति और जीवन-दृष्टि का स्वाभाविक माध्यम रहा है। समय के साथ समाज बदला, जीवन की गति बदली, अनुभवों की प्रकृति बदली और इसी परिवर्तनशील चेतना के साथ गीत ने भी अपने रूप बदले। इसी प्रक्रिया में नवगीत का उद्भव हुआ, जिसने परंपरा को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे समय के साथ पुनः परिभाषित किया। 

आज जब हम वर्तमान हिंदी साहित्य में गीत और नवगीत की स्थिति पर विचार करते हैं, तो यह प्रश्न केवल साहित्यिक नहीं रह जाता, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक विमर्श का भी विषय बन जाता है। 

गीत की अवधारणा और स्वरूप

गीत मूलतः हृदय की सहज अभिव्यक्ति है। इसमें भाव की प्रधानता होती है और लय उसकी आत्मा होती है। गीत का सम्बन्ध केवल काग़ज़ से नहीं, कंठ से भी है। इसलिए गीत में गेयता अनिवार्य तत्त्व है। भारतीय परंपरा में गीत लोकजीवन, प्रकृति, प्रेम, भक्ति, विरह, ऋतु परिवर्तन और मानवीय संवेदनाओं का स्वाभाविक विस्तार रहा है। 

छायावाद के काल में हिंदी गीत ने अपनी सौंदर्यपूर्ण ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के गीतों में अनुभूति की कोमलता, प्रकृति के बिंब और आत्मिक संवेदना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। गीत उस समय आत्मा की भाषा था, जहाँ व्यक्ति और प्रकृति का अंतर लगभग विलीन हो जाता था। 

नवगीत का उद्भव और उसकी आवश्यकता

स्वतंत्रता के बाद का भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, मानसिक और सामाजिक रूप से भी बदल रहा था। गाँव से शहर की ओर बढ़ता समाज, औद्योगीकरण, आर्थिक असमानता, टूटते सम्बन्ध, संघर्षपूर्ण जीवन और नई आकांक्षाएँ इन सबने मनुष्य की अनुभूति को अधिक जटिल और यथार्थवादी बना दिया। 

परंपरागत गीत की कोमलता और सौंदर्यात्मकता इस नए यथार्थ को पूरी तरह वहन नहीं कर पा रही थी। यहीं से नवगीत की आवश्यकता महसूस हुई। नवगीत ने गीत की लय और संरचना को बनाए रखते हुए उसमें यथार्थ, सामाजिक चेतना और समकालीन बोध का प्रवेश कराया। 

नवगीत न तो गीत का विरोध है और न उसका निषेध, बल्कि वह गीत की ही विकसित अवस्था है। 

गीत और नवगीत में अंतर

गीत और नवगीत के अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि दोनों को अक्सर एक ही धरातल पर रखकर देखा जाता है। 

गीत में जहाँ भावुकता, कोमलता और सौंदर्य की प्रधानता होती है, वहीं नवगीत में यथार्थ, व्यंग्य और सामाजिक सरोकार अधिक मुखर होते हैं। गीत अक्सर व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित रहता है, जबकि नवगीत व्यक्तिगत अनुभव को सामाजिक संदर्भ से जोड़ता है। 

गीत की भाषा अपेक्षाकृत संस्कृतनिष्ठ, मधुर और अलंकारिक होती है। नवगीत की भाषा अधिक सरल, बोलचाल के निकट और समय की धड़कन से जुड़ी होती है। 

गीत में प्रकृति और प्रेम प्रमुख विषय रहे हैं, जबकि नवगीत में भूख, बेरोज़गारी, विस्थापन, स्त्री चेतना, राजनीतिक छल और आम आदमी की पीड़ा भी विषय बनती है। 

पुराने गीत साहित्य में जीवन के सौंदर्य पक्ष का अधिक विस्तार मिलता है। वहाँ पीड़ा भी सौंदर्य में ढली हुई दिखाई देती है। गीतकार अपने दुख को भी फूलों, चाँद, रात और ऋतुओं के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। 
उस समय का समाज अपेक्षाकृत स्थिर था। संबंधों में गहराई थी और समय की गति धीमी थी। इसलिए गीतों में ठहराव, आत्ममंथन और सौम्यता अधिक मिलती है। 

गीत पाठ्य और गायन दोनों स्तरों पर समान रूप से प्रभावी था। मंचीय गीतों और साहित्यिक गीतों के बीच बहुत बड़ा अंतर नहीं था। 

वर्तमान गीत साहित्य में आए परिवर्तन

वर्तमान गीत साहित्य में सबसे बड़ा परिवर्तन विषय और दृष्टि का है। आज का गीत केवल व्यक्तिगत अनुभूति तक सीमित नहीं है। वह सामाजिक और सामूहिक चेतना से भी जुड़ा है। 

भाषा में सरलता आई है। अनावश्यक अलंकरण कम हुआ है और कथ्य अधिक सशक्त हुआ है। आज का गीत समय से संवाद करता है, प्रश्न पूछता है और कभी-कभी प्रतिरोध भी करता है। 

मंचीय गीत और साहित्यिक गीत के बीच अब एक स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। मंच पर गेयता और तात्कालिक प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है, जबकि साहित्यिक गीत गहराई और स्थायित्व की तलाश में है। 

डिजिटल माध्यमों ने गीत को व्यापक पाठक और श्रोता वर्ग तक पहुँचाया है, पर साथ ही तात्कालिक लोकप्रियता की चुनौती भी सामने रखी है। 

नवगीत की वर्तमान स्थिति

नवगीत आज हिंदी साहित्य की एक सशक्त और जीवंत विधा है। अनेक रचनाकार नवगीत के माध्यम से समय की विसंगतियों, आम आदमी की पीड़ा और सामाजिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त कर रहे हैं। 

नवगीत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने गीत को युगानुकूल बनाया है। उसने यह सिद्ध किया कि लय और यथार्थ परस्पर विरोधी नहीं हैं। 

हालाँकि यह भी सत्य है कि कहीं-कहीं नवगीत के नाम पर केवल नारेबाज़ी या सपाट गद्यात्मकता भी दिखाई देती है, जो इस विधा के लिए चुनौतीपूर्ण है। 

गीत और नवगीत का भविष्य

गीत और नवगीत का भविष्य पूरी तरह निराशाजनक नहीं है, जैसा कि कभी-कभी कहा जाता है। जब तक मनुष्य के भीतर संवेदना जीवित है, तब तक गीत जीवित रहेगा। 

भविष्य में गीत और नवगीत को संतुलन साधना होगा। गीत को अपनी कोमलता और गेयता बनाए रखनी होगी, वहीं नवगीत को यथार्थ के साथ सौंदर्य का भी ध्यान रखना होगा। डिजिटल युग में गीत के प्रस्तुतीकरण के नए रूप सामने आएँगे, पर साहित्यिक मूल्यों की रक्षा करना रचनाकार की ज़िम्मेदारी होगी। 

वर्तमान हिंदी साहित्य में गीत और नवगीत दोनों अपनी-अपनी भूमिका में महत्त्वपूर्ण हैं। गीत जहाँ मनुष्य को उसकी भावनात्मक जड़ों से जोड़ता है, वहीं नवगीत उसे उसके समय और समाज से साक्षात्कार कराता है। 
दोनों परंपरा और परिवर्तन के बीच सेतु का कार्य करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम गीत और नवगीत को प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक के रूप में देखें। क्योंकि जब लय में संवेदना और संवेदना में समय बोलता है, तभी गीत और नवगीत दोनों सार्थक होते हैं। 

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