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मंच पर कविता की तलाश

 

कभी
मंच पर शब्द
चलते थे
सीधे हृदय तक
बिना माइक के शोर के
बिना इशारों के आदेश के। 
 
दिनकर बोलते थे
तो इतिहास
सीधा खड़ा हो जाता था
बच्चन पढ़ते थे
तो जीवन
आँखों में उतर आता था
नीरज की पंक्तियों में
एक पूरा युग
चुपचाप साँस लेता था। 
 
तब
वाह नहीं बोली जाती थी
तब
मौन भी
एक प्रतिक्रिया होता था
और तालियाँ
दिल से निकलती थीं
हाथों को आदेश नहीं दिया जाता था। 
 
आज
कवि सम्मेलन
कविता का नहीं
प्रतिक्रिया का उत्सव है
पहले बताया जाता है
कहाँ हँसना है
कहाँ ताली बजानी है
कहाँ उछलना है। 
 
कवि मंच पर आता है
और कविता से पहले
श्रोता को तैयार करता है
अब जो पंक्ति आए
उस पर
आपको बहुत ज़ोर से ख़ुश होना है। 
 
कविता
बीच में खड़ी
संकोच से देखती है
कि उसे कब पढ़ा जाएगा
क्योंकि चुटकुला
अब मुख्य वक्ता है। 
 
काजू वाले बिस्किट की तरह
कविता भी है
पर इतनी कि
स्वाद याद आ जाए
पेट न भरे। 
 
मंच संचालक
हर सुंदर पंक्ति पर
ऐसे चिल्लाते हैं
जैसे भाव नहीं
रिकॉर्ड टूट रहा हो
और कविता
अपने ही शब्द
खो बैठती है। 
 
कभी
एक पंक्ति पर
ताली नहीं बजती
और वही
सबसे बड़ी प्रशंसा होती है
क्योंकि उस क्षण
मन
हिल गया होता है। 
 
आज
मंचीय कवि
समृद्ध है
पर कविता
काफ़ी थकी हुई
वह
कुलिस बन गई है
मनोरंजन की गाड़ी ढोते हुए। 
 
फिर भी
कभी कभी
यूट्यूब की धूल में
पुरानी रिकॉर्डिंग खुलती है
और शब्द
फिर से
जीवित हो उठते हैं। 
 
तब समझ आता है
कि कविता
शोर से नहीं
सच से
ज़िन्दा रहती है
और मंच
तभी पवित्र होता है
जब उस पर
कविता
बोली नहीं जाती
सुनी जाती है। 

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