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सनातन उद्घोष

 

तुम कहते हो
सनातन को समाप्त कर दो
क्या कभी
आकाश को बाँधा जा सका है? 
क्या किसी ने
सूर्य से उसका प्रकाश छीन लिया? 
 
सनातन
कोई सत्ता का घोष नहीं
यह सहस्राब्दियों की चेतना है
ऋषियों की तपश्चर्या है
वेदों की ध्वनि है
गंगा की अविरलता है
और इस भूमि की आत्मा में
धड़कता हुआ शाश्वत स्पंदन है। 
 
जिसे तुम
अपने क्षणिक क्रोध में
मिटाने की बात करते हो
वह
किसी भवन की दीवार नहीं
जो नारे से गिर जाए। 
 
सनातन
उस किसान की प्रार्थना है
जो बीज बोते समय
धरती को प्रणाम करता है। 
उस माँ का विश्वास है
जो दीपक जलाकर
संतान की मंगलकामना करती है। 
 
यह
तुलसी की पत्ती में है
पीपल की छाया में है
कण कण में ईश्वर देखने वाली
उस विराट दृष्टि में है
जिसने संसार को कहा
“वसुधैव कुटुम्बकम्।” 
 
तुम्हारी भाषा में
विरोध नहीं
विष झलकता है। 
और इतिहास साक्षी है
जिसने भी
इस संस्कृति को मिटाने का प्रयास किया
वह स्वयं
समय की राख में बदल गया। 
 
सनातन
किसी एक जाति
एक वर्ग
या एक समूह का नाम नहीं। 
यह सहिष्णुता का महासागर है
जहाँ बुद्ध भी हैं
महावीर भी
कबीर भी
और नानक की वाणी भी। 
 
तुम इसे
घृणा से देख सकते हो
पर समाप्त नहीं कर सकते। 
 
क्योंकि
यह मंदिरों की घंटियों से पहले
मनुष्य के आचरण में बसता है। 
यह आरती से पहले
करुणा में प्रकट होता है। 
 
जो सभ्यता
हज़ारों आक्रमण झेलकर भी
जीवित रही
उसे
कुछ कटु शब्दों से
कैसे समाप्त करोगे? 
 
सावधान
जब तुम
सनातन पर प्रहार करते हो
तो केवल एक परंपरा पर नहीं
इस राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा पर
प्रश्न उठाते हो। 
 
और यह देश
अपनी आत्मा के अपमान को
कभी सहज स्वीकार नहीं करता। 
 
सनातन
न किसी सिंहासन का मोहताज था
न रहेगा। 
यह
जन जन की साँसों में है
और जब तक
इस भूमि पर
एक भी दीपक जलेगा
एक भी श्लोक गूँजेगा
एक भी माँ
अपने बच्चे को
राम और कृष्ण की कथा सुनाएगी
तब तक
सनातन
अविनाशी रहेगा। 

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