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हिंदी–माँ की आवाज़

 

आरव दस साल का था। शहर के एक बड़े स्कूल में पढ़ता था। वहाँ उसकी पढ़ाई अंग्रेज़ी में होती थी। वह अपने दोस्तों से भी अंग्रेज़ी में ही बातें करता। घर आकर माँ उससे हिंदी में बात करती, तो वह मुस्कुराकर कह देता 

“मॉम, प्लीज़! हिंदी मत बोलो . . . It’s so old-fashioned!” 

माँ चुप रह जाती। वह प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरती और बस इतना कहती, “बेटा, हिंदी तुम्हारी माँ की आवाज़ है . . . इसे मत भूलना।” 

आरव हँस देता। उसके लिए ‘हिंदी’ मतलब सिर्फ़ किताबों का विषय था। वह सोचता—अंग्रेज़ी में ही करियर है, हिंदी से क्या होगा! 

कुछ महीनों बाद आरव की दादी बीमार पड़ गईं। गाँव से उन्हें शहर लाना पड़ा। दादी को न मोबाइल चलाना आता था, न अंग्रेज़ी। आरव के सामने दादी रोती रहीं, “बेटा, पानी दे दो . . . ” 

“यह दवा कौन सी है?” 

“मुझे घर जाने दो . . . ” 

आरव असहज हो गया। वह दादी की बात समझ नहीं पा रहा था। उसकी आँखें झुक गईं। उसी रात वह माँ के पास आया और धीरे से पूछा, “माँ . . . ये दादी क्या कह रही हैं? मैं . . . मैं समझ नहीं पा रहा . . . ” 

माँ की आँखें नम हो गईं। वह मुस्कुराई और बोली, “बेटा . . . ये हिंदी में बात कर रही हैं। यही तो तुम्हारी जड़ है। यही आवाज़ तुम्हें बचपन में लोरियाँ सुनाती थी। यही शब्द तुम्हें दादी के प्यार से जोड़ते हैं। यही भाषा तुम्हें तुम्हारे घर से जोड़ती है।” 

आरव चुप हो गया। उसके मन में कुछ बदल गया। अगले दिन उसने दादी से हिंदी में बात करने की कोशिश की। दादी की आँखों में ख़ुशी छलक आई। वह रो पड़ीं। बोले, “बेटा . . . अब लगता है कि मेरा पोता लौट आया . . . ” 

धीरे-धीरे आरव ने हिंदी सीखना शुरू कर दिया। अब वह माँ से कहता, “माँ, आज दादी की कहानी सुनाइए . . . हिंदी में!” 

माँ मुस्कुराती। वह उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहती, “देखा बेटा . . . हिंदी सच में माँ की आवाज़ है . . . जो हमें अपनेपन से जोड़ती है।” 

उस दिन से आरव ने समझ लिया भाषा सिर्फ़ शब्द नहीं, रिश्तों की साँस होती है। हिंदी सिर्फ़ पाठ्यक्रम नहीं, उसकी माँ की आवाज़ है जो उसे अपने घर, अपने इतिहास, अपने लोगों से जोड़ती है। 

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