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रुचि का हिंदी सपना

 

शहर से कुछ दूरी पर स्थित धनगाँव एक शांत सा गाँव था। यहाँ के लोग सरल थे, खेतों में काम करते थे, घर में हिंदी बोलते थे और त्योहारों पर एक साथ जुटते थे। परन्तु गाँव में पर्यावरण की समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही थी। प्लास्टिक कचरा, तालाब में गंदगी और पेड़ों की कटाई से जीवन प्रभावित हो रहा था। लोग समझते तो थे कि प्रकृति की रक्षा ज़रूरी है, पर उन्हें यह नहीं पता था कि शुरूआत कैसे करें। 

धनगाँव की शासकीय कन्या शाला में पढ़ने वाली रुचि आठवीं कक्षा की छात्रा थी। वह तेज़ दिमाग़ वाली, भावुक और विचारशील थी। हिंदी उसकी प्रिय भाषा थी। वह कहती, “शब्द सिर्फ़ बोलने के लिए नहीं होते, वे सोचने और बदलने का रास्ता खोलते हैं।” 

एक दिन स्कूल में पर्यावरण पर चर्चा हुई। बच्चों से कहा गया कि वे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में क्या बदलाव ला सकते हैं। सब चुप थे। तभी रुचि खड़ी हुई और बोली, “हम सब हिंदी बोलते हैं, पर क्या हम उसे सही तरह से लिखते हैं? क्या हम अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त कर पाते हैं? अगर हम अपनी भाषा में जागरूकता फैलाने के लिए लिखना सीखें, सही शब्द चुनें, अपने अनुभव साझा करें तो हम दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं। भाषा सोच को दिशा देती है। चलिए, हम पर्यावरण संरक्षण के लिए लिखने और समझने का अभियान चलाएँ।” 

मंजुला मैम ने उसकी बात को सराहा। उन्होंने कहा, “बहुत सही कहा रुचि! भाषा से विचार आकार लेते हैं। अगर हम अपने विचार स्पष्ट कर सकें, तो दूसरों का मन भी बदल सकता है।” 

रुचि ने ‘हरित लेखन मंडल’ शुरू किया। हर सप्ताह बच्चे पर्यावरण से जुड़े विचार लिखते, चित्र बनाते और अपने अनुभव साझा करते। उसने बच्चों को यह सिखाया कि संदेश प्रभावी कैसे बनाया जाता है, सरल भाषा, स्पष्ट विचार, प्रेरक उदाहरण और संवाद का स्वर। 

गाँव में महिलाओं के लिए ‘हिंदी वार्ता सभा’ आयोजित हुई। वहाँ रुचि ने बताया कि घर में पानी बचाने की आदत कैसे डाली जाए, जैविक खेती के फ़ायदे क्या हैं, और कचरे को अलग करके साफ़-सफ़ाई कैसे की जाए। सबने अपने अनुभव साझा किए। शब्दों के ज़रिए संवाद शुरू हुआ और व्यवहार में बदलाव आने लगा। 
किसानों के लिए ‘हरित सलाह पत्र’ तैयार किया गया। उसमें हिंदी में लिखा गया, “रसायनों की जगह जैविक खाद अपनाएँ। खेत की मिट्टी स्वस्थ रहेगी और पानी साफ़ रहेगा।” 

इस पत्र को गाँव में बाँटा गया। किसानों ने मिलकर तालाब की सफ़ाई का कार्यक्रम शुरू किया। 

रुचि ने बच्चों को समझाया, “हम हिंदी में सोचते हैं, सपने देखते हैं, अपने डर और ख़ुशियाँ बाँटते हैं। अगर हम सही शब्दों में अपने विचार रखेंगे तो समाज में बदलाव लाना आसान होगा। भाषा हमारे विचारों को ताक़त देती है, आत्मविश्वास देती है और हमें नेतृत्व करना सिखाती है।” 

धीरे-धीरे पूरा गाँव जुड़ गया। बच्चों ने दीवार पत्रिका शुरू की ‘हरित संदेश’। महिलाएँ घर में प्लास्टिक कम करने लगीं। किसान तालाब में गंदगी फेंकने से बचने लगे। गाँव में रविवार को ‘शब्द संगोष्ठी’ का आयोजन होने लगा, जिसमें पर्यावरण पर हिंदी में चर्चा होती और समाधान तय किए जाते। 

कुछ ही महीनों में तालाब फिर से साफ़ दिखाई देने लगा। बच्चों ने घर-घर जाकर बताया कि पेड़ लगाने से तापमान घटेगा और बारिश आएगी। गाँव की चौपाल पर लगी बोर्ड में लिखा गया, “हर विचार शब्द से जन्म लेता है, हर बदलाव संवाद से।” 

गाँव के बुज़ुर्ग बोले, “हमने जाना कि भाषा सिर्फ़ बोलने का तरीक़ा नहीं, सोचने और बदलने की ताक़त है। हिंदी ने हमें जोड़ा, समझाया और पर्यावरण की रक्षा का रास्ता दिखाया।” 

रुचि मुस्कुराई। वह जानती थी कि भाषा का सही उपयोग ही जागरूकता की असली कुंजी है। वह कहती, “हिंदी ने हमें शब्द दिए, शब्दों ने विचार दिए, और विचारों ने गाँव में हरियाली लौटाई। यही हमारी सबसे बड़ी कमाई है।” 

हिंदी का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि लोग इसे बोलते हैं, बल्कि इसलिए है कि यह सोच को स्पष्ट करती है, संवाद को प्रगाढ़ बनाती है, समाज में नेतृत्व पैदा करती है और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर प्रभावी बदलाव लाने में मदद करती है। भाषा से जुड़कर व्यक्ति न केवल अभिव्यक्ति में कुशल बनता है, बल्कि समाज को जागरूक करने और प्रकृति की रक्षा के लिए प्रेरित भी कर सकता है। यही भाषा की असली ताक़त है।

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