अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

यज्ञ

छंद: कुण्डलिया 
(श्रीमद्भागवत गीता से)

1.
मेरे ही हेतार्थ हों, यज्ञ दान तप कर्म।
काम्य कर्मफल त्यागना, है संन्यासी धर्म।
है संन्यासी धर्म, फलों की इच्छा त्यागो।
मुझको करो निमित्त, नहीं कर्मों से भागो।
यज्ञ दान तप जाप, सुफल होंगे सब तेरे।
दम्भ आचरण त्याग, बनो तुम प्रियवर मेरे।

2.
गीता ज्ञान स्वरूप को, करता जो हृदयस्थ।
ज्ञान यज्ञ पूजित रहूँ, मैं उसके अंतस्थ।
मैं उसके अंतस्थ, करूँ मैं उसकी रक्षा।
सात्विक यज्ञ विधान, जगें उसकी अनुप्रेक्षा।
बिना यज्ञ जप ज्ञान, रहे मानव मन रीता।
लोक विहित संज्ञान, रूप है मेरा गीता।
 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

उपलब्ध नहीं