ये तेरा घर ये मेरा घर
कथा साहित्य | कहानी डॉ. सुशील कुमार शर्मा1 Jun 2026 (अंक: 298, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
मई की वह दुपहरी तप रही थी, पर भोपाल के पुराने इलाक़े में स्थित पितृ-छाया बँगले के भीतर का वातावरण बाहर की लू से कहीं अधिक सर्द और भारी था। घर के बीचों-बीच बने बड़े से दीवान पर पंडित दीनानाथ जी अपनी लाठी टेके चुपचाप बैठे थे। उनके चेहरे की झुर्रियों में अस्सी वर्षों का अनुभव और आँखों में एक धुँधला सा दर्द था।
आज ‘अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस’ था, और विडंबना देखिए कि आज ही उनके तीनों बेटों ने घर के बँटवारे के लिए समय निश्चित किया था।
दीनानाथ जी का बड़ा बेटा, आलोक, जो शहर का बड़ा बिल्डर बन चुका था, बार-बार अपनी महँगी घड़ी देख रहा था। उसे अपनी नई साइट पर जाना था। मँझला बेटा, सुमित, जो बैंक में अफ़सर था, फ़ाइलों के ढेर के साथ मोबाइल पर किसी से उलझा हुआ था। और सबसे छोटा, वरुण, जो अपनी नई स्टार्टअप कंपनी के घाटे से परेशान था, चिड़चिड़ा होकर सिगरेट के धुएँ में अपनी नाकामियाँ ढूँढ़ रहा था।
“पिताजी,” आलोक ने चुप्पी तोड़ी। “यह घर अब हम सबके लिए छोटा पड़ रहा है। कोचर कॉलोनी में मैंने जो फ़्लैट्स लिए हैं, वे आधुनिक हैं। इस पुराने पुश्तैनी मकान को बेचकर जो रक़म मिलेगी, उससे हम तीनों की ज़रूरतें पूरी हो जाएँगी। विहान की पढ़ाई विदेश में होनी है, वरुण को बिज़नेस के लिए फ़ंड चाहिए . . . आप समझ रहे हैं न?”
दीनानाथ जी ने सिर नहीं उठाया। उन्होंने बस पास पड़ी पीतल की सुराही से पानी पिया और धीमे स्वर में बोले, “आलोक, यह घर केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं है। इसमें तुम्हारी माँ की चूड़ियों की खनक है, सुमित के पहले क़दम के निशान हैं और वरुण की वह चोट की चीख़ है जो उसे आँगन के अमरूद के पेड़ से गिरकर लगी थी। क्या इन सबको भी बेच दोगे?”
सुमित ने झुँझलाकर कहा, “पिताजी, भावुकता से पेट नहीं भरता। आज का दौर ‘प्रैक्टिकल’ होने का है। परिवार का मतलब अब साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की तरक़्क़ी में बाधक न बनना है।”
दीनानाथ जी की पुत्रवधुएँ भी पास ही बैठी थीं। बड़े बेटे की पत्नी, माया, को आलीशान बँगले का मोह था। उसने बात काटते हुए कहा, “बाबूजी, परिवार तो मन से जुड़ा होता है। अलग रहकर भी हम एक-दूसरे के काम आएँगे। आख़िर इसी को तो ‘फैमिली कमिटमेंट’ कहते हैं।”
दीनानाथ जी अचानक हँस पड़े। एक सूखी, बेजान हँसी। उन्होंने अपनी जेब से एक पुराना, मटमैला लिफ़ाफ़ा निकाला और उसे मेज़ पर रख दिया।
“यह क्या है?” वरुण ने उत्सुकता से पूछा।
“यह मेरा कमिटमेंट है, “दीनानाथ जी बोले।” जब तुम छोटे थे, तब मेरी नौकरी चली गई थी। छह महीने तक हमारे घर में केवल नमक-रोटी बनती थी। मुझे शहर के सबसे बड़े कॉलेज में प्रिंसिपल की नौकरी मिल रही थी, पर शर्त यह थी कि मुझे अपना घर छोड़कर सपरिवार वहीं शिफ़्ट होना होगा। तुम्हारी माँ बीमार थी, उसके इलाज के लिए पैसे नहीं थे। पर मैंने वह नौकरी ठुकरा दी थी क्योंकि उस समय तुम्हारे ताऊजी को लकवा मार गया था और मुझे उनकी सेवा करनी थी।”
दीनानाथ जी ने आलोक की आँखों में झाँका। “उस समय मैंने प्रैक्टिकल होना नहीं सीखा था आलोक। मैंने ‘परिवार’ चुना था। क्या तुम जानते हो क्यों? क्योंकि परिवार कोई बीमा कंपनी नहीं है जो केवल संकट में काम आए। परिवार वह कमिटमेंट है जहाँ आप अपना भविष्य दूसरे के वर्तमान को सँवारने के लिए दाँव पर लगा देते हैं।”
“सुमित,” दीनानाथ जी ने मँझले बेटे की ओर देखा। “तुम आज इस घर को सिर्फ़ एक संपत्ति मान रहे हो। तुम्हें लगता है कि हर चीज़ की एक क़ीमत होती है। पर क्या तुम्हें याद है, जब तुम दस साल के थे और तुम्हारी दोनों किडनियाँ जवाब दे गई थीं? डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे और डोनर मिलना उस दौर में नामुमकिन था।”
सुमित सकपकाया। “हाँ पिताजी, मुझे याद है। मामाजी ने किसी अज्ञात डोनर का इंतज़ाम किया था। आपने कहा था कि शहर के किसी भले आदमी ने परोपकार में अंगदान किया है। हमने उसे बहुत खोजा पर आपने कभी उसका नाम नहीं बताया।”
दीनानाथ जी के चेहरे पर एक पीली मुस्कान उभरी। उन्होंने कमरे में बैठी अपनी बड़ी बहू और आलोक की ओर देखा। “आलोक, उस समय तुम पंद्रह साल के थे। क्या तुम्हें सच में आज भी लगता है कि वह डोनर कोई अज्ञात व्यक्ति था? क्या तुम भूल गए वह महीना, जब तुम्हारी माँ और मैं एक साथ घर से ग़ायब थे और तुम छोटे भाइयों को सँभाल रहे थे?”
आलोक की नज़रें झुक गईं। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि घड़ी की सूइयाँ भी हथौड़े की तरह बजने लगीं।
“सच तो यह है सुमित,” दीनानाथ जी का स्वर भारी हो गया, “कि वह डोनर तुम्हारी माँ थी। और यह बात इस घर में कोई असंभव रहस्य नहीं थी। आलोक जानता था, क्योंकि उसने माँ के टाँकों के निशान देखे थे। मैंने जानबूझकर तुम दोनों छोटे भाइयों से यह छिपाया ताकि तुम अपराधबोध के तले दबकर अपना बचपन न खो दो। पर आलोक ने, उस किशोर उम्र में, मुझसे वादा किया था कि वह इस सच को अपनी छाती में दफ़न रखेगा। उसने अपने हिस्से का बचपन त्याग दिया ताकि घर का अनुशासन और माँ की ममता का स्वरूप तुम्हारे लिए बना रहे।”
दीनानाथ जी ने आलोक की ओर देखा, जिसकी आँखों से अब अविरल आँसू बह रहे थे। “आलोक ने बीस सालों तक इस ‘कमिटमेंट’ को निभाया। उसने अपनी माँ के उस बड़े बलिदान को कभी भुनाया नहीं, कभी जताने नहीं दिया कि उसने सुमित की जान बचाने के लिए मेरे साथ अस्पताल के गलियारों में कितनी रातें काटी थीं।”
दीनानाथ जी के आँसू अब उनकी सफ़ेद दाढ़ी पर लुढ़क रहे थे। “परिवार की आवश्यकता तब नहीं होती जब हम सफल होते हैं; उसकी आवश्यकता तब होती है जब हम टूट रहे होते हैं। आज तुम मकान बेचना चाहते हो, कल तुम अपने रिश्तों का भी सौदा कर लोगे। पर याद रखना, जिस जड़ को तुम काट रहे हो, उसी के कारण तुम आज फलदार वृक्ष बने खड़े हो।”
वरुण, जो अब तक ख़ामोश था, अचानक उठकर दीनानाथ जी के पैरों में गिर पड़ा। उसकी आँखों से पश्चात्ताप की गंगा बह रही थी। “बाबूजी, हमें माफ़ कर दीजिए। हम भूल गए थे कि हम जो कुछ भी हैं, आपकी और माँ की क़ुर्बानियों की नींव पर खड़े हैं। मुझे नहीं चाहिए कोई फ़ंड, मुझे बस यह आँगन चाहिए जहाँ मैंने चलना सीखा था।”
आलोक और सुमित की गर्दनें भी शर्म से झुक गईं। उन्हें अहसास हुआ कि वे जिस तरक़्क़ी की बात कर रहे थे, वह कितनी खोखली थी।
आलोक ने खड़े होकर बँटवारे के काग़ज़ात फाड़ दिए। “बाबूजी, आज परिवार दिवस पर मैं आपसे वादा करता हूँ यह घर नहीं बिकेगा। हम इसी छत के नीचे रहेंगे। शायद कमरे छोटे पड़ जाएँ, पर हमारे दिल अब बड़े होंगे। परिवार की सबसे बड़ी आवश्यकता त्याग नहीं, बल्कि साथ है।”
दीनानाथ जी ने अपने बेटों को गले लगा लिया। उस पुराने बँगले की दीवारें जैसे फिर से मुस्कुरा उठीं। अमरूद के पेड़ पर चिड़ियाँ चहचहाने लगीं और आँगन में बिछी धूप अब चुभने वाली नहीं, बल्कि सुखद अहसास दे रही थी।
पितृ-छाया आज फिर से एक पूर्ण परिवार का गवाह बना। दीनानाथ जी समझ गए थे कि संस्कार कभी मरते नहीं, वे बस वक़्त की धूल के नीचे दब जाते हैं।
आज के न्यूक्लियर दौर में, जहाँ हम अपनी स्वायत्तता और निजता को परिवार से ऊपर रखते हैं, हमें यह याद रखना होगा कि संकट के समय वाई-फ़ाई के सिगनल नहीं, बल्कि अपनों के हाथ काम आते हैं। परिवार वह वटवृक्ष है जो ख़ुद धूप सहता है, पर अपनी संतानों को शीतल छाँव देता है।
क्या हम इस छाँव को बचाने के लिए थोड़ा झुकने को तैयार हैं? क्या हमारा कमिटमेंट केवल सुख के दिनों तक सीमित है, या हम दुखों में भी ढाल बनकर खड़े होने का साहस रखते हैं?
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बाल साहित्य कविता
- अकड़म बकड़म
- अरे गिलहरी
- आओ बच्चों तुम्हें सुनाएँ
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - ठंड
- गर्मी की छुट्टी
- चिड़िया का दुःख
- चिड़िया की हिम्मत
- टेडी बियर टेडी बियर
- डूबी डूबी डिंग डिंग
- पतंग
- पानी बचाओ
- बादल भैया
- बाल कविताएँ – 001 : डॉ. सुशील कुमार शर्मा
- बेचारा गोलू
- मुनमुन गिलहरी
- मैं कुछ ख़ास बनूँगा
- मैं ही तो हूँ— तुम्हारे भीतर
- लोरी
- लौकी और कद्दू की लड़ाई
- हम हैं छोटे बच्चे
- होली चलो मनायें
सांस्कृतिक आलेख
- ओशो: रजनीश से बुद्धत्व तक, एक विद्रोही सद्गुरु की शाश्वत प्रासंगिकता
- कृष्ण: अनंत अपरिभाषा
- गणेश चतुर्थी: आस्था, संस्कृति और सामाजिक चेतना का महासंगम
- गीताजयंती कर्म, धर्म और जीवन दर्शन का महामहोत्सव
- चातुर्मास: आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का पर्व
- जगन्नाथ रथयात्रा: जन-जन का पर्व, आस्था और समानता का प्रतीक
- नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान
- नव संवत्सर: कालचक्र का नवोदय और चेतना का पुनर्जागरण
- नृसिंह का प्राकट्य अन्याय के विरुद्ध उद्घोष
- प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
- ब्राह्मण: उत्पत्ति, व्याख्या, गुण, शाखाएँ और समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: एक बहुआयामी व्यक्तित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: धर्म संतुलन की ज्वाला और युग चेतना का शाश्वत स्वर
- मकर संक्रांति: एक विराट सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विमर्श
- मनुस्मृति: आलोचना से समझ तक
- राम-राष्ट्र की जीवनधारा और शाश्वत चेतना का प्रवाह
- वट सावित्री व्रत: आस्था, आधुनिकता और लैंगिक समानता की कसौटी
- वर्तमान समय में हनुमान जी की प्रासंगिकता
- शिव और शक्ति का महामिलन: महाशिवरात्रि का विराट दर्शन
- हरितालिका तीज: आस्था, शृंगार और भारतीय संस्कृति का पर्व
गीत-नवगीत
- अखिल विश्व के स्वामी राम
- अच्युत माधव
- अनुभूति
- अब कहाँ प्यारे परिंदे
- अब का सावन
- अब नया संवाद लिखना
- अब वसंत भी जाने क्यों
- अबके बरस मैं कैसे आऊँ
- आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
- आज से विस्मृत किया सब
- इस बार की होली में
- उठो उठो तुम हे रणचंडी
- उर में जो है
- काँच हुए सब रिश्ते-नाते
- कि बस तुम मेरी हो
- किसे जगाएँ
- कृष्ण मुझे अपना लो
- कृष्ण सुमंगल गान हैं
- कैसे हम ख़ुद को समझाएँ
- कौन करे मन की अगवाई
- गमलों में है हरियाली
- गर इंसान नहीं माना तो
- गुरु पूर्णिमा पर गीत
- गुलशन उजड़ गया
- गोपी गीत
- घर घर फहरे आज तिरंगा
- घाव का उपहार
- चला गया दिसंबर
- चलो होली मनाएँ
- चढ़ा प्रेम का रंग सभी पर
- ज्योति शिखा सी
- झरता सावन
- टेसू की फाग
- तुम तुम रहे
- तुम मुक्ति का श्वास हो
- दिन भर बोई धूप को
- धरती बोल रही है
- नया कलेंडर
- नया वर्ष
- नव अनुबंध
- नववर्ष
- नारी
- फागुन ने कहा
- फूला हरसिंगार
- बहिन काश मेरी भी होती
- बारूदी बयार
- बाज़ार के शोर में
- बेटी घर की बगिया
- बोन्साई वट हुए अब
- भरे हैं श्मशान
- मतदाता जागरूकता पर गीत
- मन का नाप
- मन को छलते
- मन गीत
- मन फागुन
- मन बातें
- मन वसंत
- मन संकल्पों से भर लें
- महावीर पथ
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 001
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 002
- मौन गीत फागुन के
- मज़दूर दिवस पर गीत
- यूक्रेन युद्ध
- वयं राष्ट्र
- वसंत पर गीत
- वासंती दिन आए
- विधि क्यों तुम इतनी हो क्रूर
- शस्य श्यामला भारत भूमि
- शस्य श्यामली भारत माता
- शिव
- श्रावण
- सत्य का संदर्भ
- सुख-दुख सब आने जाने हैं
- सुख–दुख
- सूना पल
- सूरज की दुश्वारियाँ
- सूरज को आना होगा
- स्वप्न फिर छिटक गया
- स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
- हर हर गंगे
- हिल गया है मन
- ख़ुद से मुलाक़ात
- ख़ुशियों की दीवाली हो
ललित निबन्ध
सामाजिक आलेख
- अध्यात्म और विज्ञान के अंतरंग सम्बन्ध
- अबला निर्मला सबला
- आप अभिमानी हैं या स्वाभिमानी ख़ुद को परखिये
- आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और गूगल के वर्तमान संदर्भ में गुरु की प्रासंगिकता
- करवा चौथ बनाम सुखी गृहस्थी
- करवा चौथ व्रत: श्रद्धा की पराकाष्ठा या बाज़ार का विस्तार?
- कृत्रिम मेधा (AI): वरदान या अभिशाप?
- गाँधी के सपनों से कितना दूर कितना पास भारत
- गाय की दुर्दशा: एक सामूहिक अपराध की चुप्पी
- गौरैया तुम लौट आओ
- जीवन संघर्षों में खिलता अंतर्मन
- नकारात्मक विचारों को अस्वीकृत करें
- नब्बे प्रतिशत बनाम पचास प्रतिशत
- नया वर्ष कैलेंडर का पन्ना नहीं, आत्ममंथन का अवसर
- नव वर्ष की चुनौतियाँ एवम् साहित्य के दायित्व
- पर्यावरणीय चिंतन
- बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर: समता, न्याय और नवजागरण के प्रतीक
- भारतीय जीवन मूल्य
- भारतीय संस्कृति में मूल्यों का ह्रास क्यों
- माँ नर्मदा की करुण पुकार
- मानव मन का सर्वश्रेष्ठ उल्लास है होली
- मानवीय संवेदनाएँ वर्तमान सन्दर्भ में
- वाह रे पर्यावरण दिवस!
- विद्यालयीन परिवेश में शिक्षक-प्रकृतियाँ
- विश्व पर्यावरण दिवस – वर्तमान स्थितियाँ और हम
- वृद्धजन—अतीत के प्रकाश स्तंभ और भविष्य के सेतु
- वेदों में नारी की भूमिका
- वेलेंटाइन-डे और भारतीय संदर्भ
- व्यक्तित्व व आत्मविश्वास
- शिक्षक पेशा नहीं मिशन है
- शिक्षण का वर्तमान परिदृश्य: चुनौतियाँ, अपेक्षाएँ और भावी दिशा
- संकट की घड़ी में हमारे कर्तव्य
- सम्बन्ध और स्वार्थ का द्वंद्व
- सम्बन्धों का क्षरण: एक सामाजिक विमर्श
- सामाजिक जीवन के मूल्यांकन का विरोधाभास
- स्वतंत्रता दिवस: गौरव, बलिदान, हमारी ज़िम्मेदारी और स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत
- स्वामी विवेकानंद: आधुनिक भारत के आध्यात्मिक महाप्राण
- हिंदी और रोज़गार: भाषा से अवसरों की नई दुनिया
- हैलो मैं कोरोना बोल रहा हूँ
चिन्तन
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- अमृत काल का आम
- एक कप चाय और सौ जज़्बात
- कविता बेचो, कविता सीखो!
- काश मैं नींबू होता
- गुरु दक्षिणा का नया संस्करण—व्हाट्सएप वाला प्रणाम!
- घरेलू मॉडल स्त्री
- डॉ. सिंघई का ‘संतुलित’ संसार
- नवदुर्गा महोत्सव और मोबाइल
- न्याय की गली में कुत्तों का दरबार
- प्रोफ़ाइल पिक की देशभक्ति
- मातृ दिवस और पितृ दिवस: कैलेंडर पर टँगे शब्द
- मिठाइयों में बसा मनुष्य का मनोविज्ञान
- वाघा का विघटन–जब शेर भी कन्फ्यूज़ हो गया
- विश्वशान्ति का महायुद्ध
- शर्मा जी और सब्ज़ी–एक हरी-भरी कथा
साहित्यिक आलेख
- आज की हिन्दी कहानियों में सामाजिक चित्रण
- गीत सृष्टि शाश्वत है
- डिजिटल युग में कविता की प्रासंगिकता और पाठक की भूमिका
- पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री विमर्श
- प्रवासी हिंदी साहित्य लेखन
- प्रेमचंद का साहित्य – जीवन का अध्यात्म
- बुन्देल खंड में विवाह के गारी गीत
- भारत में लोक साहित्य का उद्भव और विकास
- भाषा का उद्भव और विकास: मानवीय चेतना की अभिव्यक्ति
- मध्यकालीन एवं आधुनिक काव्य
- मुक्त छंद रचनाओं में आज की हिंदी
- रामायण में स्त्री पात्र
- वर्तमान में साहित्यकारों के समक्ष चुनौतियाँ
- वर्तमान में हिंदी साहित्य में गीत और नवगीत की स्थित
- समाज और मीडिया में साहित्य का स्थान
- समावेशी भाषा के रूप में हिन्दी
- साहित्य में प्रेम के विविध स्वरूप
- साहित्य में विज्ञान लेखन
- सोशल मीडिया के साहित्यिक पटल: एक समालोचना
- हिंदी और आधुनिक तकनीक: डिजिटल युग में भाषा की चुनौतियाँ और संभावनाएँ
- हिंदी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास एवं अन्य भाषाओं का प्रभाव
- हिंदी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास एवं अन्य भाषाओं का प्रभाव
- हिंदी साहित्य में प्रेम की अभिव्यंजना
स्मृति लेख
काम की बात
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
व्यक्ति चित्र
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