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महाराणा प्रताप

कुंडलियाँ छंद

1
राणा थे मन से अडिग, थी रजपूती आन। 
मिट्टी में मिल कर रहा, मुग़लों का अभिमान॥
मुग़लों का अभिमान, शत्रु से जा टकराए। 
मातृभूमि की आन, बचा कर रण से लाए। 
भामा जैसा मित्र, लुटाया अंतिम दाना। 
हे भारत के गर्व, जयति ज्योति महाराणा॥
2
चेतक था रणबांकुरा, स्वामी का विश्वास। 
हल्दीघाटी में दिखा, अनुपम वीर प्रकाश॥
अनुपम वीर प्रकाश, शत्रु दल जब थर्राए। 
राणा की हुंकार, शत्रु उर कम्पन छाए। 
कह सुशील कविराय, वीरता का संकेतक। 
राणा का विश्वास, अमर है प्यारा चेतक॥
3
राणा का संघर्ष है, इस भारत की शान। 
जीवन वन में काट कर, रखा देश का मान॥
रखा देश का मान, नहीं धीरज को छोड़ा। 
मातृभूमि के हेतु, कष्ट से नाता जोड़ा। 
कह सुशील कविराय, शत्रु ने लोहा माना। 
रजपूतों की शान, देश का गौरव राणा॥

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