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प्रेम की अंतिम व्याख्या

 

राधा का प्रेम
प्रेम की मधुरतम व्याख्या है।
मीरा का प्रेम
प्रेम की परम व्याख्या है।
 
जहाँ राधा में
कृष्ण के आने की प्रतीक्षा है,
वहाँ मीरा में
कृष्ण के होने की अनुभूति है।
 
राधा के प्रेम में
मिलन की आकांक्षा है।
मीरा के प्रेम में
स्वयं का विसर्जन है।
 
मीरा ने कृष्ण को पाया नहीं,
कृष्ण में स्वयं को खो दिया।
प्रेम की यात्रा में पानेवाला
अक्सर रिक्त रह जाता है,
खोनेवाला पूर्ण हो जाता है।
 
मीरा के पास कृष्ण से माँगने को
कुछ भी शेष नहीं—
न स्वर्ग, न मुक्ति, न सिद्धि, न चमत्कार।
 
मीरा का प्रेम
याचना का द्वार नहीं, अर्पण का उत्सव है।
वह प्रेम में
लेन-देन का लेखा नहीं रखती।
 
न उपकार, न अधिकार,
न प्रतिकार, न प्रतिफल।
 
मीरा जानती है—
जहाँ अपेक्षाएँ जीवित रहती हैं,
वहाँ प्रेम धीरे-धीरे संबंध बन जाता है।
और जहाँ अपेक्षाएँ मर जाती हैं,
वहाँ संबंध प्रेम बन जाता है।
 
मीरा का कृष्ण मंदिर में नहीं है,
मूर्ति में नहीं, शास्त्र में नहीं—
वह तो उसकी श्वासों की लय में है।
 
इसलिए
मीरा कभी अकेली नहीं हुई।
संसार ने उसे त्यागा, किंतु उसने
विरह को भी उत्सव बना लिया।
 
प्रेम का सर्वोच्च रूप
साथ पा लेना नहीं है।
प्रेम का सर्वोच्च रूप—
उस अनुपस्थिति में भी
उपस्थिति का अनुभव करना है।
 
मीरा का प्रेम दीपक की लौ नहीं,
सूर्य का प्रकाश है।
किसी एक क्षण पर निर्भर नहीं,
किसी एक व्यक्ति पर आश्रित नहीं।
वह भीतर से फूटती अनंत ज्योति है।
 
विश्व के अधिकांश प्रेम
किसी न किसी कारण से जन्म लेते हैं—
रूप से, गुण से, संबंध से, सहारे से।
 
मीरा का प्रेम कारणों से परे है—
इसलिए उसका अंत भी नहीं है।
 
प्रेम जब स्वयं को भुला देता है,
तभी वह ईश्वर को पा लेता है।
और शायद इसी कारण मीरा ने
कृष्ण को नहीं खोजा,
अपने भीतर से
मीरा को हटा दिया।
 
शेष रह गए केवल कृष्ण—
और वही प्रेम की अंतिम व्याख्या है।
 

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