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और प्रेम मरता गया

 

जिस प्रेम के लिए उन्होंने पूरा संसार छोड़ दिया था, उसी प्रेम को बचाने के लिए बाद में उनके पास समय नहीं बचा। कॉलेज के दिनों में अमित और रागिनी की प्रेम कहानी पूरे परिसर में चर्चा का विषय थी। दोनों एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे। बारिश की दोपहरें, पुस्तकालय की सीढ़ियाँ, कैंटीन की अधूरी चाय और भविष्य के अनगिनत सपने सब कुछ इस विश्वास पर टिका था कि प्रेम साथ हो तो जीवन की हर कठिनाई छोटी पड़ जाती है। विरोध के बीच विवाह हुआ। दोनों ने सोचा था कि अब संघर्ष बाहर से होगा, भीतर से नहीं। 

विवाह के कुछ वर्षों तक सब ठीक रहा। छोटा-सा किराए का मकान भी उन्हें महल लगता था। एक प्लेट में खाना, महीने के अंत में जेब ख़ाली हो जाना और फिर भी देर रात तक बाते करते रहना यही उनका वैभव था। अमित अक़्सर कहा करता था, “रागिनी, मेरे पास धन भले न हो, पर तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।” रागिनी उस पर विश्वास करती थी, क्योंकि प्रेम में दिए गए वचन उस समय ईश्वर की तरह पवित्र लगते हैं। 

लेकिन जीवन प्रेम से अधिक ज़िम्मेदारियों की भाषा जानता है। अमित के पिता का देहांत हो गया। घर की पूरी ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई। वृद्ध माँ थी, छोटा भाई था और सबसे बड़ी चिंता थी अविवाहित बहन सविता की। एक-एक करके रिश्ते आते, दहेज़ की सूची छोड़कर चले जाते। हर असफल रिश्ते के बाद माँ की आँखों में चिंता और गहरी हो जाती। अमित ने अपने मन में एक निर्णय लिया—पहले बहन का विवाह, फिर बाक़ी सब। 

यहीं से प्रेम ने पीछे हटना शुरू किया। 

रागिनी ने कभी इस निर्णय का विरोध नहीं किया। उसे लगा, परिवार पहले है। उसने अपने छोटे-छोटे सपनों को स्वयं ही समेट लिया। नई साड़ी अगले वर्ष ले लेंगे। घूमना फिर कभी हो जाएगा। मायके कुछ दिन बाद चली जाऊँगी। लेकिन यह ‘कुछ दिन’ धीरे-धीरे वर्षों में बदल गया। 

अमित की नौकरी निजी कंपनी में थी। हर महीने नौकरी बची रहे, यही सबसे बड़ी उपलब्धि थी। घर लौटते ही उसके सामने ख़र्चों की फ़ेहरिस्त खुल जाती माँ की दवा, भाई की फ़ीस, बहन की शादी, बच्चों की स्कूल फ़ीस, मकान का किराया, बिजली का बिल। उसके पास अब प्रेम करने का समय नहीं था। वह बुरा आदमी नहीं बना था, बस ज़िम्मेदारियों का क़ैदी बन गया था। 

रागिनी कई बार कुछ कहना चाहती। एक शाम उसने धीमे से कहा, “अमित, इस बार माँ के घर चलें? पिताजी बार-बार याद कर रहे हैं।”

अमित ने फ़ाइल से नज़र उठाए बिना कहा, “अभी कैसे जाएँ? अगले सप्ताह लड़के वाले सविता को देखने आ रहे हैं। तुम्हारे बिना घर कैसे चलेगा?” 

रागिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसे पहली बार लगा कि वह इस घर में पत्नी कम, व्यवस्था का एक आवश्यक हिस्सा अधिक है। 

धीरे-धीरे उसने अपनी इच्छाओं की सूची बनानी ही बंद कर दी। इच्छाएँ जब बार-बार टलती हैं तो एक दिन मर जाती हैं। उसने देखा कि उसकी अलमारी में वर्षों से कोई नई साड़ी नहीं आई। उसके जन्मदिन पर अब केक नहीं आता था। विवाह की वर्षगाँठ कभी बच्चों की परीक्षा में खो जाती, कभी किसी किश्त की तारीख़ में। उसे शिकायत नहीं थी; शिकायत करने की आदत भी समाप्त हो चुकी थी। 

एक दिन माँ का फोन आया। “बेटी, कब आएगी? तेरे पिताजी की तबीयत ठीक नहीं रहती।”

रागिनी ने वही उत्तर दिया जो वह कई वर्षों से देती आ रही थी, “बस माँ, जल्दी आऊँगी।”

फोन रखते ही उसकी आँखें भर आईं। उसने अमित से कुछ नहीं कहा। उसे मालूम था कि उत्तर वही मिलेगा—“अभी समय ठीक नहीं है।”
समय कभी ठीक नहीं हुआ। 

बच्चे बड़े होते गए। बेटा इंजीनियरिंग की तैयारी में लग गया। बेटी को कॉलेज भेजना था। घर में बातचीत का विषय केवल ख़र्च रह गया। कभी माँ की दवा, कभी भाई की नौकरी, कभी बहन की शादी, कभी बच्चों का भविष्य। इस पूरे घर में यदि कोई विषय सबसे कम था तो वह स्वयं रागिनी थी। 

एक दिन उसने हिम्मत जुटाकर पूछा, “अमित, तुम्हें कभी यह जानने की इच्छा नहीं होती कि मैं कैसी हूँ?” 

अमित ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा—“तुम ठीक ही तो हो।”

रागिनी हल्का-सा मुस्कुराई, “यही तो बात है। तुमने वर्षों से यह मान लिया कि मैं ठीक हूँ।”

यह सुनकर अमित चुप रह गया। उसे लगा, यह कोई शिकायत नहीं, एक लंबी चुप्पी का निष्कर्ष है। 

कुछ महीनों बाद रागिनी के पिता का निधन हो गया। जब तक वह पहुँच सकी, अंतिम संस्कार हो चुका था। उसकी माँ ने उसे गले लगाकर केवल इतना कहा, “तेरे बाबूजी आख़िरी साँस तक दरवाज़े की ओर देखते रहे। कहते थे, मेरी बेटी आएगी।”

उस दिन लौटते समय रागिनी रास्ते भर खिड़की से बाहर देखती रही। उसके भीतर कुछ स्थायी रूप से मर चुका था। 

समय ने अपना काम जारी रखा। बहन का विवाह हो गया। भाई अलग रहने लगा। बच्चे नौकरी पर चले गए। माँ वृद्ध हो गईं। घर की अधिकांश ज़िम्मेदारियाँ समाप्त हो चुकी थीं। अब पहली बार अमित के पास समय था। उसने एक दिन कहा, “रागिनी, चलो कहीं घूम आते हैं। बहुत वर्षों से कहीं नहीं गए।”

रागिनी ने सिलाई करते-करते सिर उठाया। उसके चेहरे पर न शिकायत थी, न उत्साह। 

“अब जाने का मन नहीं करता।”

“क्यों?” 

“क्योंकि जिन इच्छाओं को समय पर पानी नहीं मिलता, वे बाद में हरी नहीं होतीं।”

अमित पहली बार भीतर तक काँप गया। 

उसने उसी रात पुरानी अलमारी खोली। एक डिब्बे में कॉलेज के दिनों के पत्र रखे थे। एक पत्र में रागिनी ने लिखा था, “जब हम बूढ़े होंगे, तब हर शाम साथ बैठकर चाय पिएँगे और अपने बच्चों की शरारतों पर हँसेंगे।”

पत्र पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं। उसे लगा, उसने कभी रागिनी को अपमानित नहीं किया, कभी उस पर हाथ नहीं उठाया, कभी कठोर शब्द भी नहीं कहे। फिर भी वह उससे इतना दूर कैसे हो गया? 

उत्तर उसे स्वयं मिल गया। 

रिश्ते केवल क्रोध से नहीं टूटते, उपेक्षा भी उन्हें धीरे-धीरे मार देती है। प्रेम की मृत्यु किसी एक घटना से नहीं होती; वह प्रतिदिन कुछ मिनटों की कमी, कुछ अधूरी बातों, कुछ टलती मुलाक़ातों और कुछ अनसुने प्रश्नों में बिखरता रहता है। 

अगली सुबह अमित ने दो कप चाय बनाई। बरामदे में बैठी रागिनी के पास जाकर बोला, “क्या हम फिर से शुरू कर सकते हैं?” 

रागिनी ने चाय का कप हाथ में लिया। कुछ क्षण तक उसकी भाँप को देखती रही, फिर बहुत शांत स्वर में बोली, “जीवन में सब कुछ लौट आता हैं अमित पैसा, नौकरी, सुविधा, यहाँ तक कि ख़ाली समय भी। लेकिन जो प्रेम समय पर साथ माँगता है और उसे इंतज़ार मिलता है, वह लौटकर कभी वैसा नहीं आता।”

बरामदे में दोनों साथ बैठे थे। सूरज उग रहा था। चाय भी वही थी, दोनों भी वही थे, घर भी वही था। केवल एक चीज़ बदल चुकी थी: प्रेम अब जीवन नहीं था, स्मृति बन चुका था। और स्मृतियाँ कभी घर नहीं बसातीं, वे केवल मन के किसी कोने में चुपचाप निवास करती हैं। 

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