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योनि का चुनाव

 

एक जीव ईश्वर के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा था।ईश्वर मुस्कुराएँ, “वत्स! पिछले जन्म में तुमने कुछ पुण्य किए हैं। इसलिए इस बार तुम्हें एक विशेष अधिकार देता हूँ। मृत्यु लोक में तो जाना ही होगा, पर किस योनि में जन्म लेना चाहते हो, यह निर्णय तुम स्वयं कर सकते हो।”

जीव कुछ क्षण मौन रहा। फिर बोला, “प्रभु! बस दो योनियों से मुझे बचा लीजिए।”

“कौन-सी?”

“गाय का बछड़ा . . . और स्त्री।”

ईश्वर चौंक पड़े।

“गाय का बछड़ा क्यों नहीं बनना चाहते?”

जीव ने सिर झुका लिया।

“प्रभु! जन्म लेते ही यदि मैं बछड़ा हुआ तो दूध पीने तक का अधिकार छीन लिया जाएगा। बड़ा हुआ तो आवारा घोषित कर दिया जाऊँगा। खेतों में घुसा तो डंडे खाऊँगा, सड़कों पर भटकूँगा, कूड़ा खाऊँगा और अंत में किसी ट्रक में ठूँसकर कसाईखाने पहुँचा दिया जाऊँगा। जिसे लोग गौमाता कहते हैं, उसके बेटे का भाग्य मैंने पृथ्वी पर देख लिया है।”

ईश्वर की आँखें गंभीर हो गईं।उन्होंने दूसरा प्रश्न किया, “और स्त्री?”

जीव की आवाज़ काँप गई।

“प्रभु! वहाँ जन्म से पहले ही मारे जाने का भय है। जन्म लिया तो भेदभाव है। बड़ी हुई तो हर क़दम पर निगाहों का पीछा है। घर से निकली तो असुरक्षा है। कहीं दहेज़ के नाम पर जलाई जाती है, कहीं तेज़ाब से, कहीं हवस की शिकार बनती है। न्याय मिलने से पहले उसकी अस्मिता को सैंकड़ों बार कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। मैं इतना साहस अपने भीतर नहीं पाता।”

ईश्वर कुछ देर तक मौन रहे।फिर उन्होंने पृथ्वी की ओर देखा।उनकी आँखों से एक बूँद टपकी।चित्रगुप्त ने आश्चर्य से पूछा, “प्रभु! क्या निर्णय बदल दिया?”

ईश्वर ने गहरी साँस ली और बोले,“निर्णय नहीं चिंता बदल गई है। आज पहली बार किसी जीव ने मनुष्य बनने से पहले यह नहीं पूछा कि उसे कितना सुख मिलेगा; उसने केवल इतना पूछा कि उसे किस पीड़ा से बचा लिया जाए।”

स्वर्ग में सन्नाटा छा गया।

और पृथ्वी पर . . .मनुष्य अपनी सभ्यता पर गर्व कर रहा था।

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