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विष और शिव के मध्य

 

जिसके हिस्से में विष आया है
उसके हिस्से में शिव भी आएँगे
यह केवल सांत्वना नहीं
जीवन का वह गूढ़ विधान है
जिसे समय
धीरे-धीरे उद्घाटित करता है
विष
केवल कंठ में नहीं उतरता
वह उतरता है
विश्वास के टूटने में
अपनों की उपेक्षा में
और उन संबंधों में
जहाँ स्नेह की जगह
स्वार्थ की कठोरता पनपती है
कभी यह विष
मित्रता के मधुर पात्र में
अचानक घुल जाता है
जहाँ साथ चलने वाले
अचानक राह बदल लेते हैं
कभी यह
रिश्तों की उस भीतरी दरार में
जम जाता है
जहाँ अपेक्षाएँ
अपना आकार खो देती हैं
और मौन
सबसे भारी संवाद बन जाता है। 
 
कभी समाज
अपनी ही भीड़ में
एक व्यक्ति को
अकेलेपन का दंश दे देता है
जहाँ उसकी सच्चाई
उसकी कमज़ोरी समझ ली जाती है, 
पर यही विष
जब भीतर उतरता है
तो वह केवल पीड़ा नहीं देता
वह जागृति का भी आरंभ होता है। 
 
क्योंकि हर विष के साथ
एक सम्भावना छिपी होती है
शिवत्व की
शिव
वह नहीं
जो केवल कैलाश पर विराजमान हैं
शिव वह चेतना है
जो विष को
विनाश नहीं बनने देती
जो उसे
अपने कंठ में रोककर
सृष्टि को बचा लेती है
जब जीवन
तुम्हें विष देता है
तब वह
तुम्हारी सहनशक्ति नहीं
तुम्हारी अंतःशक्ति को परखता है
क्या तुम टूट जाओगे
या उस पीड़ा को
एक नई दृष्टि में बदल सकोगे
व्यक्तिगत जीवन में
जब अपने ही
अनजाने में
तुम्हारे लिए कठिनाई बन जाते हैं
तब शिवत्व
क्षमा के रूप में प्रकट होता है। 
 
जब समाज
तुम्हारी सरलता का उपहास करता है
तब शिवत्व
तुम्हारे धैर्य में आकार लेता है
और जब भीतर
अंधकार गहराता है
तब वही शिवत्व
एक मौन दीप बनकर
तुम्हें स्वयं से मिलाता है। 
 
विष
जीवन का अंत नहीं
एक आरंभ है
जहाँ मनुष्य
अपने सीमित अस्तित्व से उठकर
असीम चेतना को स्पर्श करता है
इसलिए
जिसके हिस्से में विष आया है
उसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। 
क्योंकि उसी मार्ग पर
कहीं न कहीं
शिव खड़े हैं
तुम्हारे भीतर
तुम्हारे धैर्य में
तुम्हारी करुणा में
तुम्हारे मौन में
वे प्रतीक्षा कर रहे हैं
कि तुम
अपने विष को
विनाश नहीं
विकास बना सको। 
 
और जब यह हो जाएगा
तब तुम समझोगे
कि पीड़ा
दंड नहीं थी
वह तो
तुम्हें शिव तक पहुँचाने का
एक पवित्र सेतु थी। 

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