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धूप के उस पार की सुबह

 

रात के ग्यारह बजे थे। शहर की ऊँची इमारतों के बीच काँच की दीवारों से चमकता वह कॉर्पोरेट कार्यालय अभी भी जगमगा रहा था। अधिकतर केबिन ख़ाली हो चुके थे, पर तीसरी मंज़िल के कोने वाले डेस्क पर एक लड़की अब भी झुकी बैठी थी लैपटॉप की नीली रोशनी उसके चेहरे की थकान को और उजागर कर रही थी। 

उसका नाम अन्विता था। 

वह उन लड़कियों में से थी जो सुविधाओं की गोद में नहीं, संघर्ष की भट्ठी में पककर बनती हैं। जिनके बचपन में खिलौनों से अधिक किताबें होती हैं, और इच्छाओं से अधिक उत्तरदायित्व। उसके पिता रमेश त्रिपाठी सरकारी विद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षक थे ईमानदार इतने कि सेवा के अंत तक ईमानदारी के अतिरिक्त कुछ न जोड़ पाए। माँ स्थानीय कॉलेज में अस्थायी व्याख्याता थीं वेतन इतना कि घर चल जाए, भविष्य न बने। बड़ी बहन स्वरा एक अच्छे पद पर कार्यरत थी, पर उसकी भी शादी नहीं हुई थी। दो बेटियों के पिता होने का सामाजिक भार रमेश जी की पीठ पर ऐसा रखा था।

अन्विता बचपन से मेधावी थी। वह पढ़ती नहीं थी, पढ़ाई से जूझती थी। उसे पता था कि उसकी डिग्री केवल काग़ज़ नहीं, परिवार की आशाओं की गठरी है। उसने छात्रवृत्तियों के सहारे पढ़ाई पूरी की, रात-रात जागकर परीक्षाएँ दीं, और अंततः शहर की एक प्रतिष्ठित निजी कंपनी में नौकरी पा ली। 

जिस दिन नियुक्ति-पत्र आया था, पिता की आँखें भीग गई थीं।

उन्होंने पत्र को माथे से लगाया और कहा “बेटी, आज लगा कि मेरी चालीस साल की नौकरी का असली वेतन मिला है।”

अन्विता ने भी उस दिन सोचा था अब संघर्ष समाप्त हुआ। पर उसे क्या पता था कि कई बार जीवन संघर्ष समाप्त नहीं करता, केवल उसका रूप बदल देता है। कंपनी का नाम बड़ा था, वेतन छोटा। काम का बोझ पहाड़ था, अधिकार राई के बराबर। 

सुबह नौ बजे की ड्यूटी, रात दस बजे की वापसी। काग़ज़ों में आठ घंटे, वास्तविकता में चौदह घंटे।

वेतन इतना कि किराया, यात्रा और भोजन के बाद बचत शब्द भी अपमानित लगे। 

उसका वरिष्ठ अधिकारी अक्सर कहता, “कॉर्पोरेट में ग्रोथ चाहिए तो कम्फ़र्ट ज़ोन भूल जाओ।”

अन्विता मन ही मन सोचती ‘ग्रोथ तुम्हारी हो रही है, मेरा तो रक्तचाप बढ़ रहा है।’ पर कहती कुछ नहीं। 

हर दिन घर लौटते-लौटते उसका शरीर नहीं, आत्मा थक जाती। 
वह बिस्तर पर गिरती और छत देखते-देखते सोचती “क्या यही है वह जीवन जिसके लिए मैंने वर्षों तक अपनी युवावस्था किताबों में गँवायी? क्या यही पुरस्कार है परिश्रम का कि तुम योग्य हो, इसलिए तुम्हारा अधिक शोषण होगा? 
क्या सपनों का बाज़ार भी ऐसा ही होता है जहाँ मेहनत सस्ती और उम्मीद महँगी बिकती है?” 

एक रात वह घर लौटी तो पिता बैठक में बैठे ख़र्चों की डायरी देख रहे थे। उनकी उँगलियाँ पेंशन की संख्याओं और आवश्यकताओं के बीच पुल बनाने का निष्फल प्रयास कर रही थीं। 

उन्होंने मुस्कुराकर पूछा “आ गई बिटिया? खाना गरम कर दूँ?” 

अन्विता उस दिन टूट गई।

“खाना?” वह हँसी एक कड़वी हँसी। “पापा, कभी यह भी पूछिए कि मैं जी रही हूँ या बस काम कर रही हूँ!”

घर में सन्नाटा उतर आया। 

वह पहली बार फटी, “मैंने क्या नहीं किया? दूसरों की छुट्टियों में पढ़ी, त्योहारों में पढ़ी, रातों में पढ़ी, सपनों को रोका, इच्छाओं को मारा क्यों? ताकि आज कोई मुझसे बैल की तरह काम ले और मूँगफली के दाम दे? भगवान भी अजीब व्यापारी है मेहनत पूरी लेता है, प्रतिफल आधा देता है!” 

माँ ने धीरे से कहा, “बेटी, धैर्य रख। समय बदलता है।”

अन्विता की आँखें जल उठीं।

“समय बदलता है? या हम लोग ख़ुद को यही कहकर बहलाते रहते हैं? जिसके पास पैसे हैं, अवसर उसी के पास जाते हैं। जिसके पास पहुँच है, पद उसी के पास जाते हैं। मेहनत बस भाषणों में महान लगती है, माँ वास्तविकता में उसका शोषण होता है!”

पिता ने बहुत शांत स्वर में कहा

“क्रोध समझ में आता है, कटुता नहीं। संघर्ष को शाप मत दे, यही तुझे गढ़ रहा है।”

अन्विता फट पड़ी, “कब तक गढ़ेगा? मूर्ति बनाऊँ या राख?”

उस रात उसने वर्षों बाद रोकर भगवान की मूर्ति हटाई और अलमारी में रख दी। “जिसे सुनना ही नहीं, उसे सजाकर रखने का क्या अर्थ?” वह बुदबुदायी। 

दिन बीतते गए। आक्रोश भीतर जमा होता गया। कभी उसे लगता सब छोड़ दे। कभी लगता भाग जाए। कभी लगता जीवन किसी और के लिए सरल क्यों है और उसके हिस्से ही काँटे क्यों? पर अगली सुबह वह फिर उठती, फिर जाती। क्योंकि संघर्षरत मनुष्य के पास विकल्प कम और दायित्व अधिक होते हैं। 

एक दिन कंपनी में एक बड़ा प्रोजेक्ट आया। पूरी टीम असफल हो रही थी। समय-सीमा निकट थी। वरिष्ठ अधिकारी घबराए हुए थे।

अन्विता ने लगातार तीन रातें जागकर प्रोजेक्ट सँभाला।

रणनीति बदली, डेटा सुधारा, प्रस्तुति बनाई, क्लाइंट को सँभाला और प्रोजेक्ट सफल हो गया।

सारी टीम की मीटिंग बुलाई गई।

बॉस ने सबके सामने घोषणा की

“इस सफलता का श्रेय पूरी टीम को जाता है।” 

अन्विता मुस्कुराई नहीं। उसने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा, “सर, पूरी टीम को श्रेय दीजिए, अवश्य दीजिए। पर यह भी बता दीजिए कि पूरी टीम में कौन तीन रातें जागा, किसने अपनी छुट्टियाँ छोड़ीं, किसने आपकी ग़लतियाँ सुधारीं, और किसे अब तक उसके काम के अनुपात में वेतन नहीं मिला।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। 

बॉस तमतमा गया, “तुम्हें अपने टोन का ध्यान रखना चाहिए।” 

अन्विता ने स्थिर स्वर में उत्तर दिया, “और आपको अपने संगठन की नैतिकता का।” 

यह उसके जीवन का निर्णायक क्षण था। पहली बार उसने केवल मेहनत नहीं, अपने मूल्य की भी रक्षा की थी। कुछ सप्ताह बाद उसे दूसरी कंपनी से साक्षात्कार का कॉल आया। उस प्रोजेक्ट की चर्चा उद्योग में फैल चुकी थी। इंटरव्यू में उससे पूछा गया, “आप इतनी कठिन परिस्थितियों में भी काम कैसे करती रहीं?” 

अन्विता ने उत्तर दिया, “क्योंकि विकल्प नहीं था। और जब विकल्प नहीं होता, तब मनुष्य अपनी क्षमता से परिचित होता है।” उसे चयनित कर लिया गया।

पिछले वेतन से लगभग तीन गुना अधिक पैकेज पर। कार्य-संस्कृति बेहतर, सम्मान बेहतर, अवसर बेहतर। 

ऑफ़र लेटर हाथ में लेकर वह घर लौटी। पिता बरामदे में तुलसी को पानी दे रहे थे। उसने काग़ज़ उनके हाथ में रख दिया। पढ़ते-पढ़ते उनकी आँखें भर आईं।

“सच?” 

अन्विता पहली बार बच्चे की तरह रो पड़ी। “पापा . . . शायद आप ठीक थे। संघर्ष व्यर्थ नहीं जाता . . . बस देर से फल देता है।” 

पिता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा “बेटी, ईश्वर कभी-कभी देर इसलिए करता है कि तुझे छोटी उपलब्धि पर रोकना नहीं चाहता। जिसे बड़ा बनाना होता है, उसे देर तक तपाना पड़ता है।”

अन्विता चुप रही। फिर धीरे से भीतर गई, अलमारी खोली, और भगवान की वही मूर्ति निकालकर पुनः मंदिर में रख दी। 

माँ मुस्कुराईं, “फिर से मित्रता हो गई?”

अन्विता ने नम आँखों से कहा, “नहीं माँ . . . शिकायत अभी भी है। पर अब समझ में आया है भगवान हमें छोड़ता नहीं, बस जल्दी उत्तर नहीं देता।” 

कुछ महीनों बाद बड़ी बहन स्वरा का विवाह तय हुआ। घर में वर्षों बाद खुलकर हँसी लौटी। रमेश जी की पीठ का झुकाव कुछ कम हुआ। माँ की आँखों में स्थायी चिंता की जगह चमक आने लगी। 

एक शाम छत पर बैठी अन्विता डूबते सूरज को देख रही थी।

उसने सोचा, ‘सच ही तो है। सूरज भी डूबे बिना अगली सुबह नहीं लौटता। बीज भी मिट्टी में दबे बिना वृक्ष नहीं बनता। और मनुष्य भी संघर्ष सहे बिना स्वयं को नहीं पहचानता।’

उसने भीतर से पहली बार शान्ति महसूस की। अब वह जान चुकी थी जीवन अन्यायपूर्ण हो सकता है, पर निष्फल नहीं। हर परिश्रम तत्काल फल नहीं देता, कुछ परिश्रम पहले मनुष्य को मज़बूत बनाते हैं, फिर सफल। 

उस रात उसने पिता से कहा, “पापा, अब समझ गई हूँ सफलता केवल अच्छा वेतन नहीं होती।” 

पिता मुस्कुराए “फिर?” 

अन्विता ने उत्तर दिया, “सफलता वह क्षण है जब संघर्ष तुम्हें तोड़ने के बजाय तुम्हारा आकार बड़ा कर दे।” और सच यही है धूप जब सबसे अधिक चुभती है, तभी कहीं क्षितिज के उस पार सुबह जन्म ले रही होती है।

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