अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

विश्वशान्ति का महायुद्ध

 

आज का युग अत्यंत प्रगतिशील है। 

इतना प्रगतिशील कि अब युद्ध भी शान्ति स्थापना के नाम पर लड़े जाते हैं। पहले लोग युद्ध जीतने के लिए लड़ते थे, अब वे शान्ति जीतने के लिए लड़ते हैं अंतर केवल शब्दों का है, परिणाम लगभग वही रहता है। 

ईरान और अमेरिका के बीच चल रही तनातनी को देखिए। दोनों ही पक्ष अत्यंत गंभीर, ज़िम्मेदार और विश्वशान्ति के कट्टर समर्थक हैं। दोनों के बयान सुनिए तो लगेगा कि वे युद्ध नहीं, कोई आध्यात्मिक सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। फ़र्क़ इतना है कि सम्मेलन के निमंत्रण-पत्र की जगह मिसाइलें भेजी जा रही हैं। 

अमेरिका का तर्क बड़ा सरल और पवित्र है “हम शान्ति चाहते हैं, इसलिए युद्ध आवश्यक है।” यह वही तर्क है जैसे कोई कहे कि “मैं स्वास्थ्य के लिए रोज़ ज़हर की थोड़ी-थोड़ी मात्रा लेता हूँ।” दूसरी ओर ईरान है, जो अपने स्वाभिमान को थामे खड़ा है। वह कहता है “हम झुकेंगे नहीं।” यह झुकने और न झुकने की लड़ाई कब टकराने में बदल जाती है, यह शायद दोनों ही नहीं समझ पाते। 

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक सक्रिय यदि कोई है तो वह है समाचार चैनल। उनके लिए यह युद्ध नहीं, एक भव्य इवेंट है। स्क्रीन पर लाल-नीले नक़्शे, तीरों की आवाजाही, और एंकर की उत्तेजित वाणी मानो कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो। 

“देखिए, यह मिसाइल यहाँ से चलेगी, और सीधा यहाँ जाकर गिरेगी!” बस फ़र्क़ इतना है कि यहाँ विकेट नहीं गिरते, इंसान गिरते हैं। 

संयुक्त राष्ट्र भी इस कथा का एक महत्त्वपूर्ण पात्र है। वह हर बार मंच पर आता है, गंभीर स्वर में अपील करता है “कृपया शान्ति बनाए रखें।” 
यह अपील कुछ वैसी ही होती है जैसे दो लड़ते बच्चों के बीच खड़ा कोई तीसरा बच्चा कहे “अरे मत लड़ो!” 

और दोनों बच्चे उसे धक्का देकर फिर से लड़ने लगें। 

दुनिया के अन्य देश भी कम दिलचस्प नहीं हैं। वे सब दर्शक बने बैठे हैं। कुछ देश भीतर-ही-भीतर प्रसन्न हैं कि तेल के दाम बढ़ेंगे, कुछ सोच रहे हैं कि हथियारों की बिक्री बढ़ेगी। कुल मिलाकर, युद्ध अब केवल दो देशों के बीच नहीं होता यह एक वैश्विक व्यापारिक अवसर भी बन चुका है। 

और आम जनता? वह अपने मोबाइल स्क्रीन पर युद्ध का लाइव अपडेट देख रही है। चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा चल रही है

“लगता है इस बार बड़ा कुछ होगा!” उसे यह नहीं बताया जाता कि हर बड़ा कुछ किसी छोटे घर की तबाही होता है, किसी माँ की सूनी गोद, किसी बच्चे का टूटा भविष्य होता है। 

विडंबना देखिए दोनों पक्ष शान्ति शब्द का प्रयोग सबसे अधिक करते हैं, और उसी अनुपात में हथियारों का भंडारण भी बढ़ाते हैं। मानो शान्ति अब एक ऐसा शब्द हो गया है, जिसे केवल भाषणों में जिया जाता है और वास्तविकता में मारा जाता है। 

अंततः यह पूरा घटनाक्रम हमें यही सिखाता है कि आज का युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता यह शब्दों में, अर्थों में, और सबसे अधिक, हमारी संवेदनाओं में लड़ा जाता है। 

और इस महायुद्ध में सबसे बड़ी हार किसी देश की नहीं, बल्कि मानवता की होती है—जो हर बार मारी जाती है, और हर बार अगली शान्ति वार्ता तक जीवित घोषित कर दी जाती है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

कविता-मुक्तक

कविता

दोहे

गीत-नवगीत

सांस्कृतिक आलेख

बाल साहित्य कविता

लघुकथा

साहित्यिक आलेख

स्मृति लेख

कहानी

काम की बात

सामाजिक आलेख

कविता - हाइकु

ऐतिहासिक

कविता - क्षणिका

चिन्तन

व्यक्ति चित्र

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

ललित निबन्ध

स्वास्थ्य

खण्डकाव्य

नाटक

रेखाचित्र

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

ग़ज़ल

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं