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ढाई दशक का अनुराग: आत्मीय सह-अस्तित्व के पच्चीस बरस

 

(विशेष आलेख-सुशील शर्मा)

 

समय की नदी कितनी सहजता से बहती है कि देखते-देखते ढाई दशक बीत गए। आने वाली पच्चीस मई को कला जगत की दो उद्भट विभूतियों आशुतोष राना और रेणुका शहाने के दांपत्य जीवन की पच्चीसवीं वर्षगाँठ है। पच्चीस मई केवल एक तिथि नहीं, दो संवेदनशील आत्माओं के उस साथ की रजत-रेखा है जिसने समय की धूल, संघर्षों की आँधी, प्रसिद्धि की चकाचौंध और जीवन की विषमताओं के बीच भी अपने सम्बन्धों की ऊष्मा को अक्षुण्ण बनाए रखा। आशुतोष राना और रेणुका शहाणे का दाम्पत्य केवल दो कलाकारों का मिलन नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों, दो संवेदनाओं और दो आत्मीय जीवन-दृष्टियों का संगम है। यह केवल दो कला-साधकों के साथ रहने की रजत जयंती नहीं है, बल्कि यह दो भिन्न संस्कृतियों, दो नितांत अलग मिज़ाज के भूगोल और दो संवेदनशील मनों के एकत्व की ऐसी अनूठी दास्तान है, जिसकी जड़ें हमारी माटी की सौंधी गंध से जीवन रस पाती हैं।

गाडरवारा की माटी आशु भाई की संस्कार भूमि 

जब भी आशुतोष राना का नाम आता है, मन सबसे पहले उनकी अभिनय प्रतिभा से पहले उनकी मिट्टी तक पहुँचता है। वह मिट्टी है गाडरवारा की नर्मदा अंचल की वह सौंधी धरती जहाँ शब्दों में संस्कार घुलते हैं, जहाँ लोग केवल बोलते नहीं, आत्मा से संवाद करते हैं। इस अनुराग पर्व को समझने के लिए हमें उस नर्मदांचल की माटी को टटोलना होगा, जिसने आशुतोष को गढ़ा है। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले का वह क़स्बा गाडरवारा, जहाँ शक्कर नदी के कंकड़-पत्थर भी अपनी कहानी कहते हैं, आशु भाई के समूचे अस्तित्व का मूल है। गाडरवारा की यह तासीर है कि यहाँ का आदमी चाहे मुंबई के मख़मली मंचों पर बैठ जाए या वैश्विक क्षितिज पर चमकने लगे, उसके भीतर की सादगी, यहाँ की ठेठ बोली का भोलापन और पूज्य दद्दाजी (देवप्रभाकर शास्त्री जी) के चरणों से मिली अध्यात्म की घुट्टी कभी कम नहीं होती। रेणुका जी, जो मुंबई की आधुनिक और सुशिक्षित महानगरीय चेतना का प्रतिनिधित्व करती थीं, जब इस माटी के सस्पर्श में आईं, तो उन्होंने आशु भाई के भीतर छिपे इसी गाडरवारा को सबसे पहले पहचाना। यह इस माटी का ही प्रताप था कि एक चकाचौंध भरी दुनिया का अभिनेता अपनी जड़ों से जुड़कर! शक्करी-मिठास के साथ अपनी जीवनसंगिनी के मन में पैठ बना सका।

इन दोनों की जीवन गाथा किसी फ़िल्मी पटकथा जैसी चटकीली नहीं, बल्कि एक गंभीर कविता जैसी ठहरकर पढ़ी जाने वाली है। हँसमुख, सौम्य और ‘सुरभि’ जैसे धारावाहिकों से देश भर के दिलों पर राज करने वाली रेणुका शहाने और अपनी पहली ही फ़िल्म ‘संघर्ष’ व ‘दुश्मन’ से अभिनय का लोहा मनवाने वाले आशुतोष राना दो छोर थे। आशु भाई का उस रात के सन्नाटे में आंसरिंग मशीन पर एक कविता के रूप में अपना संदेश छोड़ना इस दाम्पत्य का बीज था। वह कविता केवल शब्दों का ताना-बाना नहीं थी, वह गाडरवारा की उस शुद्ध सात्विक चेतना की गूँज थी, जिसने रेणुका जी के हृदय के तारों को झंकृत कर दिया।

रेणुका जी अक्सर याद करती हैं कि आशुतोष का वह ठेठ देसी अंदाज़, बड़ों के प्रति अगाध आदर और अपनी माटी के प्रति अटूट निष्ठा ही थी, जिसने उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया। दो अलग भाषाएँ (मराठी और हिंदी), दो अलग परिवेश, पर मन की भाषा एक थी सहानुभूति और आत्मीयता।

आशुतोष राना की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने सफलता को कभी अपने भीतर अहंकार बनने नहीं दिया। मुंबई की चमक-दमक के बीच भी उनके भीतर गाडरवारा की धूल बची रही। उनके शब्दों में गाँव की चौपाल का अपनापन है, उनके व्यवहार में भारतीय परिवार व्यवस्था की विनम्रता। कहा जाता है कि मनुष्य जितना बड़ा होता जाता है, उतना अकेला होता जाता है। किन्तु आशुतोष राना और रेणुका शहाणे के सम्बन्धों में यह अकेलापन कभी दिखाई नहीं देता। दोनों के बीच संवाद का वह सहज पुल दिखाई देता है जो आधुनिक दाम्पत्य में धीरे-धीरे दुर्लभ होता जा रहा है।

सादगी का मंडप और सह-अस्तित्व का पाठ

पच्चीस साल पहले जब इनका विवाह हुआ, तो उसमें कोई आधुनिक तामझाम नहीं था। आशु भाई ने अपनी जन्मभूमि और अपनी संस्कृति के अनुरूप अत्यंत सादगी से विवाह की रस्में निभाईं। दद्दाजी के सानिध्य में संपन्न हुए इस विवाह ने यह सिद्ध किया कि दांपत्य की नींव वैभव पर नहीं, बल्कि विचारों के सामंजस्य पर टिकी होती है। इन पच्चीस वर्षों में दोनों ने एक-दूसरे को बदलने का प्रयास कभी नहीं किया। रेणुका जी ने आशुतोष के भीतर के उस सनातनी, साहित्यिक और फक्कड़ मानस को पूरा मान दिया, जो कभी मौन में चला जाता है तो कभी शिल्पकला या अध्यात्म में डूब जाता है। वहीं आशु भाई ने रेणुका जी की स्वतंत्र चेतना, उनकी प्रखर बुद्धिमत्ता और उनकी कलात्मक स्वतंत्रता को सदैव सराहा। दोनों बेटों शौर्यमान और सत्येंद्र की परवरिश में भी गाडरवारा के पारंपरिक मूल्य और मुंबई की आधुनिक दृष्टि का एक सुंदर समन्वय दिखाई देता है। रेणुका शहाणे ने भी इस सम्बन्ध को केवल प्रसिद्धि का उत्सव नहीं बनने दिया। उन्होंने जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक सहचरी की तरह साथ निभाया। आधुनिकता के बीच भारतीय स्त्री की गरिमा और आत्मीयता को उन्होंने अपने व्यवहार में जिया है। पच्चीस वर्षों का यह साथ हमें यह भी सिखाता है कि विवाह केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि साथ को निरंतर बचाए रखने की साधना है। सम्बन्धों में प्रेम जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है सम्मान, धैर्य और संवाद। आज जब रिश्ते छोटी-छोटी असहमतियों में टूटने लगे हैं, तब आशुतोष राना और रेणुका शहाणे का दाम्पत्य यह विश्वास जगाता है कि यदि दो लोग भीतर से संवेदनशील हों तो समय भी उनके सम्बन्धों को थका नहीं सकता।

शब्द और साधना का अनूठा संगम आज जब आशुतोष राना मंचों पर गरजते हैं, ‘मौन मुस्कान की मार’ या ‘रामराज्य’ जैसी कालजयी पुस्तकें लिखते हैं, तो उनके हर शब्द के पीछे एक सुदृढ़ पारिवारिक संबल होता है, जिसकी धुरी रेणुका जी हैं। एक श्रेष्ठ पाठक और निष्पक्ष समीक्षक के रूप में रेणुका जी हमेशा उनके साथ खड़ी रहती हैं। यह पच्चीसवीं वर्षगाँठ कला जगत के लिए एक उत्सव है, और गाडरवारा के हम सभी लोगों के लिए गौरव का क्षण। यह दांपत्य हमें सिखाता है कि जब दो आत्माएँ परस्पर सम्मान और निष्कपट प्रेम के धागे से बँधती हैं, तो समय का कोई भी थपेड़ा उन्हें डिगा नहीं सकता। पच्चीस बरस का यह सफ़र गवाह है कि मुंबई की चकाचौंध के बीच भी गाडरवारा की सौंधी माटी की ख़ुश्बू अक्षुण्ण बनी हुई है।

गाडरवारा की मिट्टी शायद आज भी गर्व से कहती होगी कि उसने केवल एक अभिनेता नहीं, एक संस्कारित मनुष्य को जन्म दिया। वह मनुष्य जिसने अभिनय के मंच पर खलनायक के अनेक चेहरे निभाए, किन्तु निजी जीवन में प्रेम, विनम्रता और परिवार की गरिमा को सबसे बड़ा सत्य माना।

पच्चीसवीं वैवाहिक वर्षगाँठ पर यह दोनों विभूतियाँ केवल शुभकामनाओं के नहीं, सम्मान के अधिकारी हैं। क्योंकि इन्होंने यह सिद्ध किया है कि प्रसिद्धि के इस शोरगुल भरे समय में भी आत्मीयता बची रह सकती है, सम्बन्धों में ऊष्मा बची रह सकती है और जीवन की दौड़ के बीच भी कोई मनुष्य अपनी मिट्टी की सुगंध को अपने भीतर जीवित रख सकता है। नर्मदा के तटों से उठती हवा, गाडरवारा की साँझ, गाँव की पगडंडियाँ और स्मृतियों के पुराने दीप सब मिलकर आज शायद यही कह रहे हैं:

“कुछ रिश्ते समय से नहीं चलते
वे संस्कारों से चलते हैं।”

और यही संस्कार इन पच्चीस वर्षों को केवल वैवाहिक यात्रा नहीं, एक सुंदर जीवन-गाथा बना देते हैं। आशु भाई और रेणुका जी को दांपत्य के इस रजत महोत्सव पर अनंत मंगलकामनाएँ! यह अनुराग यात्रा अविरल चलती रहे।

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